आचार्यकुलप्रकाशनम्
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त्रिनयनाख्येन संस्कृतभाष्येण चित्तामणिनाम्ना हिन्दीभाषान्तरेण च विभूषिता _ अवतरणिकया परिशिष्टपञज्वकेनोपसंहारेण च समच्विता
भाष्यकत
अवस्थी बच्चूलालो ज्ञानोपाह्ः
भाष्य-भाषान्तरकार३ सम्पादकश्च
बालकृष्ण8 शर्मा
सहसम्पादकः5 हे सन्तोष£ पण्डू्या
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श्रीनिवासर थ$
उज्जयिनीस्थ-कालिदास-अकादेमी-निदेशकः$
विक्रमसंवत् २०९०
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आचार्यकुलप्रकाशनम्
पाणिनीयशिक्षा
त्रिनयनाख्येन संस्कृतभाष्येण चिन्तामणिनाम्ना हिन्दीभाषान्तरेण च विभूषिता
अवतरणिकया परिशिष्टपञ्वकेनोपसंहारेण च समन्विता
भाष्यकृत् अवस्थी बच्चूलालो ज्ञानोपाह्ृनः
भाष्य-भाषान्तरकार8 सम्पादकश्च
बालकृष्ण8 शर्मा
सहसम्पादक8 सन्तोष४ पण्ड्या
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प्रकाशक8
श्रीनिवासरथः उज्जयिनीस्थ-कालिदास-अकादेमी-निदेशकः8
विक्रमसंवत् २०५९०
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समर्पणम
अनेन पाणिनीयशिक्षायाश्रिनयनभाष्येण
श्रीवेदना थमि श्र यो मां पुत्रीकृत्य स्वयं छात्रवृत्तिदानेन लघुकौमुदीमपीपठत्
श्रीमहावीरझाः यो मां दुर्ललित इति पदव्या विभूष्य सिद्धान्तकौमुदीमारभ्य शेखरपर्यन्तं नव्यव्याकरणमध्यापिपत्
श्रीनूसिहोपाद्दो नारायणदत्तस्रिपाठी
येन पाणिनीयशिक्षाविषये कश्चन प्रकाश8 प्रादायि ते5मी मयि भावेन वर्तमाना अमुत्र सत्त्वशुद्धि तृप्ति च लभन्तां न मम ।
- अवस्थी बच्चूलालो ज्ञानोपाह्
ड़ मकर... ३० - 4 म-मइ-पाक- कक की--- 2 ल मर वरायो2#०साका "सतना
समर्पण
पाणिनीयशिक्षा के त्रिनयनभाष्य का चिन्तामणि हिन्दी भाषान्तर
मेरे दीक्षागुरु
बदरीनाथ धाम के पूर्व प्रधान रावल अनन्तश्रीविभूषित ब्रह्मलीन
आचार्य विष्णु केशवन् नम्बूदिरि
की पुण्यस्मृति को सविनय समर्पित है।
- बालकृष्ण शर्मा
एक््रोग्महरं /क्रिज्वित॒ बुह्ग्रन्यक्षरों नर! / भाकिप्र! शैज्षिकेगेह 9पाशिति आग्यति / / छुन्छुन्नि क्रो शृत्ता तिक्षं चेशकवियच्छाति / न ग्णति स्भायों त्र शैज्षिकरय सम्रीपतः / / ब्रह्मणेज़ समेरेज़ गित्छु व ुष्पपि अद्येबे समग्रककते ॥ शैक्षिक? श्र रिरापते / /
( ऋग्वेदप्रातिशाख्यस्य १४ पटलभाष्यान्त उबट३ )
जुछप्टनानैर न्रैत ग्रोकं अप्रेहिरे / तत्यात् सर्वाशगनेन 9छफग्ाटी भ्रवेत् वि? / /
(पाराशरी-शिक्षा, ११३ )
एवं ज्ञात्ता पठेह् बत्छु स्र॒ कच्छेह वैष्णव पद्म / न मे क्षेये दिफ/ कश्किचुद्रणगी त्वनिप्रियः / / (तत्रैव, १५६ ) स्थान व करण ग्रत्रा सम्बूदुद्मारणं तक्ष / गे न बेह श्र तिर्लत्रः प्रगग्रीनि कर्क्ष कढेत / /
( वर्णरलप्रदीपिका-शिक्षा, € )
बला |! एन ९ क७०+४+ -. “ग्यॉडिः हू... १.ह/«. +«_ -
पुरस्क्रिया
वह समय सन् १६३३ ई में वसन््तपञज्चमी का था जब १४% वर्षदेशीय हो कर मैंने अभिजित् मुहूर्त में उर्दू शिक्षा को तिलाज्जलि दे कर अमरकोश से संस्कृत विद्या का ' ऊँ नम£ सिद्धम् ' किया। उसी दिन से लगने लगा कि संस्कृत भाषा के उच्चारण की पद्धति सामान्य से पृथक्, अनेक अर्थों में विशेष है। प्रथमा उत्तीर्ण करने के पश्चात् जब अनुस्वार का परम्परागत उच्चारण सहसा प्राप्त हुआ तो मेरे पैर पृथ्वी से ऊपर उठ गये थे। फिर तो उच्चारण-सम्बन्धी भ्रान्तियाँ दूर होने लगीं और मैंने अपने गुरुवर आचार्य महावीर झा के उच्चारण को अपने लिये आदर्श माना क्योंकि उनमें मिथिला और काशी की अभिजात उच्चारण-परम्परा अमर हो कर जीवित थी। वे समय-समय पर अवसर निकालकर बताया भी करते थे। सन् १६४१-४२ में कुछ मास के लिए में काशी में रहने लगा, तब पूज्य पण्डित नारायणदत्त त्रिपाठी ' नूसिंह ' के चरणों में बैठकर प्रौढमनोरमा पढ़ने का सुयोग मिला। सन् १६४२ के फरवरी-मार्च में शास्त्री प्रथणमखण्ड की परीक्षा समीप थी। मैंने गुरुवर नृसिंहजी से पाणिनीयशिक्षा के विषय में, कहीं मार्ग में चलते-चलते पूछा, तो उन्होंने भी मेरे प्रश्नों का समर्थन करते हुए उच्चारण की समस्या और वर्णमाला की सड्घटना को दुरूह बताते हुए अपने अध्ययनकाल के संस्मरण सुनाये और कहा कि मैंने तभी पाणिनीयशिक्षा की ' प्रकाश ' टीका लिखी थी। तुम उसका क्रय कर लो तो काम चल जायगा। उन की वह पुस्तिका मुझे कठिनाई से मिल सकी, जिसे पढ़ कर कुछ संशयों का निराकरण अवश्य हुआ ।
शिक्षा-वेदाड़ के उच्चारण सम्बन्धी विषय पर कुछ भी समझने का अधिक अवसर नहीं मिला, क्योंकि आचार्य आदि के करने के पश्चात् मैं सन् १६४६ से समूचे कार्यकाल में हिन्दी का शिक्षक रहा | सन् १६७० के आसपास सागर विश्वविद्यालय के ग्रन्थागार से ले कर मैंने ऋग्वेद-प्रातिशाख्य तथा शुक््लयजुर्वेद-प्रातिशाख्य पढ़े। मुझे विस्मय हुआ कि हमारे पूर्वज ऋषियों ने उच्चारण को बड़ा महत्त्व दिया था। तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य तथा अथर्व-प्रातिशाख्य पर ' र्हिटने ' का अंग्रेजी भाष्य प्राप्त कर के मैं न केवल चकित रहा अपितु मेरा मन धिक्कार से भर गया कि मेरी अपेक्षा एक अमेरिकन विद्यार्थी अच्छा विद्यार्थी सिद्ध हो रहा था ।
उन्हीं दिनों मेरे सखा डॉ.गड्जाराम पाण्डेय सागर में मेरे साथ रह कर पीएच.डी. कार्य के लिए संस्कृत वर्णमाला पर अनुसन्धान करने आ पहुँचे | उनके साथ कुल मिला कर प्राय8 एक वर्ष रहने और विचार करने का अवसर मिला | शिक्षा-वेदाड़ का विद्यार्थी होने की दृष्टि से डॉ.पाण्डेय के साथ बिताया हुआ समय मेरे लिए स्वर्णयुग था | हम दोनों ने मिलकर बहुत कुछ सीखा और सिखाया |
कहना न होगा कि प्राय& दो वर्ष पूर्व अपने प्रस्तुत ग्रन्थ के लिए जब कुछ सामग्री लेना हुआ तो मैं लखनऊ जाकर कई दिन डॉ. पाण्डेय के साथ रहा। उन्होंने अपना ग्रन्थ तथा अन्य सामग्री का समवधान कर दिया जिस का मैंने उपयोग कर के इस ग्रन्थ के परिशिष्ट लिखे ।
आज जब पाणिनीयशिक्षा का त्रिनयन-भाष्य प्रकाश में आ रहा है तब मैं अपने भीतर एक प्रकार की स्रिग्धता या आर्द्रता का अनुभव करता हूँ। श्री बालकृष्ण शर्मा ने बड़े श्रम से भाष्य का हिन्दी रूपान्तर किया जो दुरूह कार्य था क्योंकि शास्रीय संस्कृत को हिन्दी में लाना बड़े
ऊहापोह को निमन्त्रण देता है। न जाने कितना आवापोद्दाप कर के उन्होंने यह रूपान्तर तैयार किया है। पाण्डुलिपि करना ही दुष्कर था क्योंकि मैं जराग्रस्त हाथों से कम्पमान लेखनी ले कर जो कुछ लिखता हूँ वह मुद्रणालयों के विधाताओं को विधाता की मस्तकरेखा बाँचने जैसा लगता है। उलझन यह थी कि यह कार्य किसे सौंपा जाय ? श्री बालकृष्ण शर्मा के अतिरिक्त श्री सन््तोष पण्ड्या ने यह भार अपने ऊपर लिया। इन दोनों ने हमारा भ्रूभड्र सहते हुए अन्ततः पाण्डुलिपि तैयार कर ली। श्री पण्ड्या प्राय/ एक वर्ष तक बीच-बीच में मेरे द्वारा बताये हुए जोड़-घटाव करते रहे, तब कहीं जाकर पाण्डुलिपि को पूर्णता मिली। मैं इन दोनों को शुभाशीर्वचनों से अभिषिक्त करने में गौरव अनुभव करता हूँ। दोनों ही इसके सम्पादक हैं, अत यह कहा जा सकता है कि वह सब भी उनका कर्तव्य ही था।
आज से ६ वर्ष पूर्व उज्जैन रहने आने पर पण्डित केसरिलाल शर्मा से परिचय हुआ। वे मुझसे बराबर सम्पर्क बनाये रहे हैं। उच्चारण की समस्याओं को मेरे सामने लाने में उनका जैसा कोई सहायक नहीं मिलेगा। वर्णमाला विषय पर आर्यसमाजियों द्वारा लिखी हुई अनेक लघु पुस्तिकाएँ इन मित्र ने सामने रखीं और लगातार प्रेरणा देते रहे |
यहाँ मैं कालिदास-अकादेमी के सञ्चालक आचार्य श्रीनिवास रथ को अपने हृदय में उपस्थित पाता हूँ , बाहर तो वे सदा निकट हैं। उन्होंने इसके प्रकाशन की चिन्ता बराबर रखी और आज उसे प्रकाशित पा कर मुझसे अधिक पुलकित हैं , इसके लिये पुण्य मान कर ही नाम लिया है, कृतज्ञता जताना उनके और मेरे स्वरूप-सम्बन्ध से बाहर है।
' ऋषि ऑफसेट ' अत्यन्त नया और अत्याधुनिक प्रतिष्ठान है। इस के प्रतिष्ठापक एवं सञज्चालक श्री पुष्कर बाहेती मेरी मड्गरलाशंसाओं के पात्र हैं कि अधिक समय लग जाने पर भी इस ग्रन्थ के मुद्रण को उन्होंने प्राथमिकता दी और अपनी आराधना का विषय बना लिया। कहना न होगा कि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ के नाम पर यह उनका प्रथम मुद्रणप्रयास है।
जिन आचार्यो के बचनों से इस ग्रन्थ के सडूलन में सहायता मिली है वे सब मेरे आराध्य हैं। इस ग्रन्थ के उपोद्घात में उच्चारण की उन समस्याओं को सामने लाया गया है जो विजातीय भाषाओं के सम्पर्क से संस्कृत में घुस आई हैं। यह ग्रन्थ यदि एक भी जिज्ञासु के मन से वैसी विकृतियों को दूर कर संस्कृत उच्चारण को यथावत्ता दे सका तो यही इसकी कृतार्थता होगी। बहुत सी कमियाँ रह गई होंगी, इसे मेरी अल्पज्ञता मान कर विद्वज्जन क्षमा कर देंगे।
पन््था दिगन्तमपि नेतुमलं तथापि
पान्थ8 स्वगम्यमिह किज्चन निश्चिनोति । शक्तेविलासविविधत्वमिदं समीक्ष्य यावच्चरामि खलु तत्र बुधा8 प्रमाणम् | ।
दीपावली २०५० वि. विद्वानों का वशंवद
बच्चूलाल अवस्थी ' ज्ञान ! कालिदास अकादेमी, उज्जैन
अवतरणिका
य्स्पै अररदौ साक्षादीशानः शब्दशीननी िद्याग / तें शहुग्कक्ातारं ग्क्षीफ्रों नमत्कृर्का' / /
(१) शिक्षा का व्युत्पत्तिपरक अर्थ
व्याकरण सम्बन्धी व्युत्पत्ति से आने वाले अर्थ पर ही मुख्यार्थ की प्रतिष्ठा होती है क्योंकि ' शिक्षा ' शब्द योगरूढ है। इसे तीन प्रकार से देखा जा सकता है--
१ ' शिक्ष अभ्यासे ' धातु से 'गुरोश्व हल (पासू ३. ३. १०२) से 'अ प्रत्यय करने पर ' शिक्षा ' की ख्लीलिड्र भाववाचक संज्ञा की निष्पत्ति होती है और अकर्तीरि च कारके संज्ञायामू (पासू ३.३.१६) से करणवाचक संज्ञा मानने पर उस शास्त्र का अर्थ बनता है जिससे शिक्षणीय पदार्थ का अभ्यास (पुन पुन अनुसन्धान) किया जाता हो। भाववाचक संज्ञा के रूप में पुन& पुन&8 अनुसन्धान का ही अर्थ आता है।
२ सत्प्रत्ययान्त शक्लृ शक्तौ धातु से अं प्रत्यय अ प्रत्ययात्ु (पासू ३. ३. १०२) करने पर निष्पन्न ' शिक्षा ' का अर्थ शक्ति की इच्छा ' अथवा सकने की इच्छा होता है- शक्तुमिच्छा शिक्षा ( पासू ७. ४. ५४) |
३ ' शक मर्षणे ' धातु एवं सन् प्रत्यय से निष्पन्न ' शिक्षा ' का अर्थ ' सहने की इच्छा ' होता है। यह भी प्राय8 द्वितीय व्युत्पत्ति वाला ही अर्थ देता है। शकितुमिच्छा शिक्षां (पासू ७. ४. ५४) |
शिक्षाशाख्र में उक्त तीनों अर्थों का समावेश होने पर भी प्रथम की प्रधानता है और यौगिक अर्थ के साथ रूढ अर्थ लेने पर ही वेदाड्रविशेष का मुख्यार्थ बन पाता है। ऐसा ही अर्थ उपनिषद् में सुलभ है--
ओशम शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्ण: स्वर । मात्रा बलम्। साम सन्तान। इत्युक्तश शीक्षाध्याय३ |
(तैत्तिरीय 9). २)
अर्थात् शिक्षा (शीक्षा) की व्याख्या कहेंगे। वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम और सन््तान यही शीक्षाध्याय कहा गया है।
यहाँ ' वर्ण ' से स्वर एवं व्यज्जन, स्वर से उदात्तादि, मात्रा से हस्व-दीर्घ-प्लुत, बल से प्रयल, साम से पूर्वोत्तर मात्राओं के अन्तराल में सन्धिसूचक मात्रा का अर्थ आता है (याउइसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तदू भवति ऐतरेयारण्यक ३. १. ५. ६) और सनन््तान से उच्चारण या पाठ्यक्रम का प्रवाह अभिप्रेत है। यही शिक्षावेदाड़ है जिसे अपरा विद्या के दस स्थानों (वेद ४ तथा वेदाड़ ६) में लिया गया है जो स्वाध्याय की अनादि परम्परा है । (मुण्डकोपनिषद् 9.१. ५ )।
पाणिनीयशिक्षा / २ (२) शिक्षक
' शिक्षा ' की उक्त व्युत्पत्तियों के अनुसार कृदन्त ' शिक्षक ' का अर्थ अभ्यास करने वाला (शिक्षते इति शिक्षकः), अभ्यास कराने वाला (शिक्षयतीति शिक्षक४), शक्ति चाहने वाला (शिक्षतीति शिक्षकः), शक्ति की इच्छा दूसरे में उत्पन्न करने वाला (शिक्षयतीति शिक्षकः) होगा। परन्तु शिक्षाशास्र का जानने वाला या उसका अध्ययन करने वाला विशेष रूप से ' शिक्षक कहा गया है-- शिक्षामधीते वेद वा शिक्षकः ( क्रमादिभ्यो वुन-पासू ४. ३. ६१ ) | इस से इस वेदाड़ की पुरातन अध्ययन परम्परा पर प्रकाश पड़ता है। आगे इसी वेदाड़ पर विशेष विचार अपेक्षित है।
(३) शिक्षा-वेदाड़ू
शिक्षाशाश्र छह वेदाड़ों में अन्यतम है। वस्तुत$ स्वाध्याय में पडड़ सहित वेद के अध्ययन की विधि है-- ब्राह्मणेन निष्कारणं षडड़ो वेदो5ध्येयो ज्ञेयश्च |
इस प्रकार उपनिषदों को लेकर एकादश विद्याएँ व्यवस्थित हैं
विद्या
परा"ःउपनिषद् (वेदान्त)
वेद द् | कण |
ऋक्ू यजुश४ साम अथर्व
छन्दश्शास्न कल्प ज्योतिष निरुक्त शिक्षा व्याकरण
श्््व्यय्नक कर
गृह्यय श्रीत शुल्ब
एकादश (या अर्वाचीन परिगणन के अनुसार अष्टादश) विद्याएँ शब्दों में ही निबद्ध हैं और शब्दों की रचना वर्णसमाम्नाय (वर्णमाला )के अधीन है। विचारपूर्वक देखा जाय तो विश्व का समस्त पदार्थजाल शब्दाधीन हो कर ही बोध में यथावत् आ पाता है, अत एवं भगवान् भर्तृहरि ने कहा है-- न सो5स्ति प्रत्ययो लोके य शब्दानुगमादूते | अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन भासते। ।
पाणिनीयशिक्षा / ३
सभी शब्द वर्णालक हैं और वर्ण उच्चारण से स्वरूप लेते हैं। उच्चारण की विद्या शिक्षाशास्र है जिसके बिना किसी विद्या या ज्ञान का व्यवहारत४ स्वरूपलाभ असम्भव है। यही शिक्षा का मौलिक महत्त्व है। (४) शिक्षा शब्द के ब्युत्पत्तिपरक अर्थ पर पुनर्विचार
सामान्यतः ' शिक्ष अभ्यासे ' धातु से ' शिक्षण शिक्षा ' की व्युत्पत्ति से कुछ भी सीखना तथा अभ्यास करना शिक्षा है। दूसरी दृष्टि से शक्लू शक्तौ धातु के सन्नन्त शिक्ष रूप से इस की निष्पत्ति है। तदनुसार ' शक्तुमिच्छा शिक्षा ' है -- अर्थात् सकने या शक्ति प्राप्त करने की इच्छा को शिक्षां कहा जायगा। 'शक मर्षणे' धातु का सन्नन्त रूप भी ' शिक्ष' बनता है। तदनुसार शकितुमिच्छा शिक्षा ' है-- सहन करने या तितिक्षा की इच्छा को ' शिक्षा ' मानना चाहिए । प्रथम व्युत्त्ति में साक्षात् शिक्ष ' धातु है परेन्तु शेष दो में शक् धातु से सन् प्रत्यय के साथ ' शिक्ष धातुरूप बनता है जिसके लिए पाणिनीय सूत्र है-- ' सनि मीमाघुरभलभशकपतपदामच इसू और अ प्रत्ययात् ' सूत्र से ' अ' प्रत्यय होता है । अत£ ख्रीलिड्र भाववाचक संज्ञा ' शिक्षा बनती है। प्रथम व्युत्पत्ति में ' गुरोश्व हल ' सूत्र से ' अ' प्रत्यय होता है।
बेदाड़ विद्या के अर्थ में ' शिक्षा ' शब्द करणसाधन है, अत£ शिक्ष्यते यया सा शिक्षा व्युत्पत्ति होगी जिस के द्वारा अभ्यास अपनाया जाए, शक्ति प्राप्त करने की इच्छा की जाए और उच्चारण के गुणों की सहिष्णुता की इच्छा की जाए वह विद्या ' शिक्षा है । शुद्ध उच्चारण की शक्ति अर्जित करने से पाठ्यगुणों की तितिक्षा चाही जाती है और तभी अभ्यास सार्थक बनता है । सर्वथा उच्चारण के दोषों को निरस्त कर गुणों का सन्निवेश ही शिक्षाशाश्र का परम प्रयोजन है। इस सन्दर्भ में अभ्यासादि करने वाले को तो ' शिक्षक ' कहा ही जायगा, साथ ही ' शिक्षा ' शाश्र के अध्येता एवं ज्ञाता को भी शिक्षक कहा जाता है शिक्षामधीते वेद वा शिक्षक३- क्रमादिभ्यो बुन् | (५) पाणिनीयशिक्षा
' पाणिनीय मतं यथा
इस उक्ति पर ही प्रथमत४ अधुनातन मनीषी चौंकते और स्थापित करते हैं कि यह किसी अन्य की कृति है, अन्यथा स्वयं पाणिनि अपना नाम न देते। आधुनिक रचयिता अपने नाम से ग्रन्थ प्रकाशित करवाते हैं परन्तु अपने नाम को ग्रन्थघटक नहीं करते। इस के विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि नाम को ग्रन्थ में लाना आचार्य की शैली है। आचार्य अपने मत को ' पाणिनीय ' इसलिए बताता है कि शडूर से इस विद्या का अन्तर्दर्शन पाने के अनन्तर वही उसका प्रथम वक्ता है। ' मदीय ' या ' अस्मदीय ' कहने से कोई ज्ञान नहीं हो सकता कि यह किस का मत है, ऐसे शब्द सर्वनामात्मक हैं। अत एवं यहाँ नामोल्लेख के पश्चात् पुनर्वक्तीकरिष्यामि_ कह कर मुनि ने उत्तम पुरुष में अपना सड्डेत दिया है। अन्यत्र भी आचार्यों ने अपना नाम ग्रन्थधटक बनाया है।
१- अर्थशास्त्र में-- नेति कौटल्य४ ।
२- कामशाख्र में-- वात्स्यायन३ ।
३- महाभाष्य में-- गोनर्दीयस्त्वाह । इनके अतिरिक्त भी दृध्धन््त खोजे जा सकते हैं|
पाणिनीयशिक्षा / ४
' दाक्षीपुत्रपाणिनिना
उल्लेख भी तदनुरूप ही है। इस व्याज से आचार्य ने अपनी जननी दाक्षी और पिता पाणिन का स्मरण किया है। अन्त के तीन श्लोकों में व्याकरण-प्रवर्तक के रूप में उन्होंने अपने को मानों अपने द्वारा ही प्रणम्य बताते हुए कहा है--' तस्मै पाणिनये नमः'। यह और भी खटकने की बात मानी जाने लगीं हैं। कोई अपना ही प्रणाम स्वयं कैसे कर सकता है? परन्तु यह निबन्धन शिष्यशिक्षार्थ होने से परम्परा के अनुरूप ही माना जाना चाहिए, अत एवं कहा गया है--
शड्टूर४ शाइूरीं प्रादाद् दाक्षीपुत्राय धीमते । वाइमये भ्य४ समाहत्य देवीं वाचमिति स्थितिः । |
जब शडुर से यह विद्या पाणिनि को साक्षात् प्राप्त हुई तब निश्चय ही वह प्रणम्य हो जाता है और अपने लिये अपनी ही प्रणम्यता की व्याख्या स्वत युक्त प्रतीत होती है। यद्यपि नमध्पदार्थ परिभाषित किया गया है-- ' स्वनिष्ठापकर्षनिरूपितपरनिष्ठोत्कर्षस्वीकारों नमश्पदार्थः | अर्थात् अपने अपकर्ष की अपेक्षा अन्य के उत्कर्ष का स्वीकार ही नमस्कार है । यहाँ पाणिनि ने अपने अपकर्ष की अपेक्षा में अपना ही उत्कर्ष मान्य किया है जो असड्डत लगता है। तथापि यह विचारणीय है कि विद्या के अवतरण से पूर्व तथा पश्चात् का पाणिनि नमस्कर्ता व्यक्तिरूप है और नमस्य पाणिनि केवल वह है जिसमें शड्डूर से व्याकरण-विद्या का अबतार हुआ है। दोनों अंशों को पृथक् लेने पर कोई अनुपपत्ति नहीं रह जाती । मान भी लिया जाय कि किसी शिष्य ने प्रणामांश को प्रक्षिप्त कर दिया है अथवा सम्पूर्ण शिक्षाग्रन्थ ही शिष्यनिर्मित है तो भी अनादि- परम्परावादी के लिए कोई अन्तर नहीं आता । * पाणिनीयशिक्षासूत्र और आपिशलकशिक्षासूत्र प्राय/ शब्दश8 एकरूप हैं, अत वहाँ ' पाणिनीय मत ' का प्थक् पता नहीं चल पाता परन्तु पाणिनीयशिक्षा में हकार, अनुस्वार, रड्डू एवं कम्प के उच्चारण पर सविशेष प्रकाश डाला गया है। उदात्तादि स्वरों के सड़केतार्थ अड्गुलिचालन एवं हस्तचालन की व्यवस्था दी गयी है। इस प्रकार के अनेक तथ्य शिक्षावेदाड़ू की महत्त्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं, जिन में प्रातिशाख्यानुगत उच्चारणदोष भी सरल रीति से देखे जाते हैं।
(६) आधुनिक उच्चारणदोष
पहले तुर्कों के तत्वश्चात् अँगरेज़ों के प्रभाव से फ़ारसी तथा अँगरेज़ी के वर्णों का उच्चारण भारतीय वर्णमाला पर आक्रामक रूप ले बैठा है। इस का संक्षिप्त विवरण अपेक्षित है--
(१) अनुस्वार - अनुस्वार नासिक्य वर्ण है जो स्वर के अनन्तर और व्यज्जन से पूर्व उच्चरित होता है। इस के उच्चारण में कण्ठ से चला हुआ वायु केवल नासिका से निकलता है। फ़ारसी तथा अँगरेजी की वर्णमाला में तदर्थ नकार या मकार लिखे जाते हैं जिसका परिणाम हुआ है कि उत्तर भारत में नकार और दक्षिण भारत में मकार ने अनुस्वार का स्थान ले लिया है | उदाहरणार्थ - ' अंश ' को कहीं अन्श और कहीं अम्श कहा जाने लगा है । यहाँ शिक्षाशात्र के अनुसार सावधान हो कर भारतीय निधि की रक्षा में दत्तचित्त रहना चाहिए |
(२) फ - फ़ - भारतेतर देशों की भाषाओं में ' फ ' आदि वर्गीय महाप्राण ध्वनियों का अभाव है । वहाँ ' फ' ध्वनि अवश्य है जिस का उच्चारण व ' के समान दन्त्योष्ठय होता है | इसके
अलन+--+मनत++- 34 <अमय फमन-.. -+++ किन नकन--.. 2.3... अनझन-काममक. -फका---का फ+.. 3ककक
ज् ५ 4-43 43% सम. /साानक पैशस्ामानक-नकन+नी फइमनन-कयाा-क फलनन--नत सन फी-जन-+-... कै आय
पाणिनीयशिक्षा / ५
विपरीत भारत का ' फ ' ओष्ठय वर्ण है, अत$ ' प ' के समान बोला जाता है जिसमें पकार अल्पप्राण तथा फकार महाप्राण है । ' फ़ ' ध्वनि अपनी नहीं है । कुछ लोग फिर को फ़िर या फूल को फूल कहने लगे हैं जो शिक्षा-शास्र की दृष्टि से असड्भत हैं ।
(३) हकारघटित संयुक्ताक्षर - ण-न-म-य-र-ल-व वर्णों के साथ संयुक्ताक्षर में ह आता है और वह सदैव पूर्वधटक ही रहता है -- हृ-ह-ह्य-ह्य-ह-ह-ह | इन में रेफघटित संयोग अपवाद हैं जिस में कहीं-कहीं रेफ पूर्वधटक होकर आता है जैसे -- अर्हण, कहीं-कहीं रेफ को परघटक देखा जाता है- जैसे -- छृद। परन्तु शेष छह में हकार ही पूर्वधटक रहता है-- जैसे अपराह्न, मध्याह्न, ब्रह्म, बाह्य, आह्नाद और आह्वान आदि । ऐसे स्थलों में हकार का ही पूर्वाच्चारण विहित है | विपरीत उच्चारण एवं लेखन असंस्कृत है ।
(४) हकार एवं विसर्ग - अवधेय है कि पद के अन्त में कभी हकार का प्रयोग नहीं होता परन्तु विसर्ग का प्रयोग पदान्त में ही होता है। इस के अतिरिक्त हकार सघोष व्यज्जन है किन्तु विसर्ग अघोष है | हकार का अनुप्रदान नाद है और विसर्ग का श्वास ।
(५) शकार - आजञ्चलिक प्रभावों से ' श् ' का उच्चारण ' स् ' से भिन्न न रह जाए तो असाधु है | जिह्मा की नोक दाँतों का कुछ-कुछ स्पर्श करे तो सकार का उच्चारण होता है परन्तु तालु का स्पर्श होने पर शकार का उच्चारण किया जाता है, तदर्थ जिह्ना को उठाकर तालु की ओर ले जाना होता है। विदेशी प्रभाव से ' पश्चात् ' तथा ' पश्चिम आदि मे ' शच ' का उच्चारण दन्तमूल से होने लगा है जो अनुचित है ।
(६) षकार - इस का उच्चारण करने में जिह्ा को उलटकर तालु के पीछे मूर्धा के साथ लगाना पड़ता है, अन्यथा उच्चारण असम्भव रहता है । ' कष्ट ' आदि के ' ४ ' का उच्चारण विजातीय प्रभाववश दन्तमूलीय हो जाता है जिस से सावधान रहना चाहिए ।
(७) हस्व अकार - उच्चारणदोष ने हस्व अकार को सर्वाधिक प्रभावित किया है | राम, जनता, बोधकता, कमल, कमला, चपल, चपला, चपलता, लोक आदि में असंयुक्त व्यञज्जन का परवर्ती ' अ' लुप्त करके राम्, जनता, बोधक्ता, कमल, कम्ला, चपलू, चप्ला, चपल्ता, लोकु आदि बोला जाने लगा है । वर्णच्चार को निर्दोष रखने के लिए धैर्य की अपेक्षा रहती है कि सभी वर्णों के साथ न्याय हो सके । यह धैर्य अभ्यासाधीन है और अभ्यास तभी होगा जब गुरुमुख से श्रवण कर दुहराया जाए । गुरु किसे माना या बनाया जाए यह प्रश्न विद्यार्थी को स्वयं सुलझाना होगा ।
(८) क्ष - यह ' कु और ष् ' से घटित संयुक्ताक्षर है जिसका ककारांश स्पष्ट सुना जाता है, परन्तु षकारांश तालव्य जैसा हो जाता है । शुद्ध तालव्यांश होता तो छकार का श्रवण होता । शुद्ध मूर्धन्यांश_ ष रहना चाहिये । प्राकृत में क्ष परिवर्तन कहीं छ ' में होता है -- मक्षिका>मच्छिआ, वक्षः>वच्छं आदि और कहीं ' ख ' रूप में परिवर्तन मिलता है क्षण>खण, पक्ष>पक्ख, रुक्ष> रुक्ख, तीक्ष्ण>तिक्ख आदि । इस से प्रमाणित होता है कि इसका उच्चारण कठिन रहा है | सावधान होकर मूर्धन्य उच्चारण करना चाहिये ।
(६) ज्ञ के उच्चारण की समस्या - चवर्ग के तृतीय-पञ्चम (जकार एवं जकार )के संयोग से ज्ञ की निष्पत्ति है जिसे ' जज ' मानना चाहिए । जिस प्रकार ' याच्ञा ' में संयोग है वैसा ही मानने पर लिपि का विशिष्ट स्वरूप क्यों है? जिस प्रकार ' क्ष ' का विशिष्ट लिप्याकार तथा उच्चारण है उसी प्रकार ' ज्ञ' के विषय में जानना चाहिए | इस के चार उच्चारण प्रचलन में हैं --
पाणिनीयशिक्षा / ६
9 उत्तरभारतीयों का उच्चारण ' ग्यँ ' जैसा है और यही प्रचलन में रहा आया है । यहाँ दो अनुपपत्तियाँ हैं । एक तो यह कि जकार को गकार कर लिया गया है और दूसरे 'ज को <ेँ' बनाया गया है जो स्पृष्ट चवर्गीय उच्चारण के विपरीत ईषस्पृष्ट अन्तश्स्थीय उच्चारण है । समर्थन में कहा जा सकता है -- वर्गीय तृतीय एवं पज्चम के मध्य में वर्गीय तृतीय के सदृश ' यम जुड़ता है (यमों पर ग्रन्थ में द्रष्टच्य है)। यह यम ' गूँ ' जैसा होगा जो नासिक्य है । इस प्रकार ज्गँज जैसा स्वरूप बनता है ।*
उच्चारण की सरलता के कारण जकार का लोप होता है जिस से ' गूँज ' जैसा उच्चारण हो चला है। इस में जकार वस्तुत४ तालव्य नकार ही है जिसको ' यँ ' के समान उच्चारित किया. जाने लगा है। गकारघटित उच्चारण अतीव प्राचीन रहा है अतः ग्रीक में ज्ञानपर्याय ' ग्रोसिस् (५7०७4.8 ) चलता है और अँगरेज़ी में इसके अतिरिक्त जो ' नालेज् ' चलता है वह वर्तनी में क्नालेज् (१:7709] ७00५७ ) है । इस प्रकार गकारसदृश उच्चारण की पुरातन परम्परा रही है । ' ग्र' जैसा उच्चारण सम्मत है । जकार की ईषस्पृष्ता चिन्त्य है परन्तु अब ' ग्यँ ' जैसा उच्चारण अभ्यास में आ गया है ।
२ शुक्लयजुर्वेदपाठी ' ज्युँन ' या ' दगन ' जैसा पाठ करते हैं | यहाँ जकार ही नकारसदृश उच्चरित है क्योंकि तालव्य ज़कार के संयोग में दन्त्य नकार असड्डत है, अत४ जकार का वही मूल उच्चारण मानना चाहिए । परन्तु वेदपाठ से बाहर प्राय ' गूयँ ' जैसा उच्चारण ही प्रचलन में रहा आया है । ' जानाति ' इत्यादि में व्यवधान आने पर नकार ही रहता है अत8 स्पष्ट है कि चकार (धधाच्ञा ) और जकार के पूर्वसंयोगी होने पर ही ' ज ' मूलत४ उपलब्ध रहा है । सज्वय॒ तथा ' सज्जानीते ' इत्यादि में विकल्प से परसवर्ण की अवस्था आती है और तब चकार एवं जकार का परसंयोग रहता है । अत जकार ऐसा व्यज्जन है जो चवर्ग के संयोग में ही मिलता है । स्पष्ट ही उस अवस्था में तालव्य उच्चारण सम्भाव्य है । वाञ्छा, वज्चना आदि में नित्य 'ञज है ।
३ महाराष्ट्र के लोग ' ज्ञ' को ' दून ' जैसा बोलते हैं । यह उच्चारण भी प्राचीन रहा है , अत एव फ़ारसी में ज्ञानार्थक धातु ' दानिश्तन् ' है , ज्ञातपर्याय ' दानिस्त ', ज्ञानपर्याय ' दानिश् ' है तथा ज्ञानवान् के लिए ' दानिश्मन्द ' तथा ' दाना ' कहा जाता है ।
४ इधर आर्यसमाज के प्रभाववश शुद्धीकरण हेतु ' ज्यँ ' उच्चारण किया जाने लगा है परन्तु यहाँ भी जकार का ईषस्पृष्टता दोष यथापूर्व है ।
कुछ लोगों ने एक आन्दोलन चलाकर जकार के स्पृष्ट उच्चारण का प्रस्ताव रखा है । यह ' ज्ञ ' जैसा ही है जिस में अनुनासिक वर्ण की दन्त्यता न हो कर तालव्यता है ।
' गूँयँ ' वाला उच्चारण अपनी परम्परा रखता है अत एब नागोजी भट्ट ने कुछ ऐसा कहा है कि जकार - जकार का संयोग है परन्तु उच्चारण में भिन्नता पायी जाती है | इसके अतिरिक्त गोस्वामी तुलसीदास ' मानस ' में ' जग्य ', ' ग्यान ' आदि प्रयुक्त करते हैं जिस से भी परम्परा पुष्ट होती है ।
(१०) ऋ - ल - इन में ऋकार मूर्धन्य है अत४ जीभ पीछे की ओर मोड़कर किज्वित् स्पर्श-सा करते हुए उच्चारण किया जाता है । लकार दन्त्य है, अत£ जिह॒वाग्र को दन्तस्पर्श-सा कराते हुए प्रयोग में लाया जाता है । ये दोनों वर्ण यद्यपि समानस्वर हैं तथापि स्वरांश के मध्य में क्रमश£ न
9 अत एवं (यमयोगादेव) यज्ञादौ गकारश्रुति३ | - सोद्योत महाभाष्य १.१.८ पर दाधिमथ टिप्पणी |
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पाणिनीयशिक्षा ! <
रेफ एवं लकार संश्लिष्ट रहते हैं, आसपास स्वरभक्तियाँ रहती हैं, फलत# व्यज्जनांश का पृथक श्रवण या उच्चारण नहीं होता - ऋ-लवर्ण रेफलकारी संश्लिष्टावश्रुतिधरावेकवर्णो | (शुक्लयजुर्वेदप्रातिशाख्य ४ . १४६)
अर्थात् ऋकार में रेफ तथा छकार में लकार का इस प्रकार संश्लेष रहता है कि वे (रेफ- लकार) पृथक् श्रुतिधर नहीं होते, अत8 समग्र वर्णस्वरूप में वे एकवर्णता प्राप्त करते हैं ।
विधिवत् स्थान एवं करण से उच्चारण करने पर आसपास की स्वरभक्तियाँ ( स्वरांश ) अपने आप उच्चारण एवं श्रवण में आती हैं परन्तु वर्णस्वरूप में द्ृयता नहीं रहती । इन्हे रु तथा ब्रू जैसे उच्चारण में लाना सदोष है जिस पर कऋग्वेदप्रातिशाख्य में प्रकाश डाला गया है ।
(११) ड - यह कण्ठनासिक्य वर्ण है जिस के उच्चारण में दोनों स्थानों का एक साथ उपयोग किया जाता है । यह ' गँ ' नहीं है । शुद्ध उच्चारणार्थ गुरु की प्रतिपत्ति भी आवश्यक है ।
(१२) ञज - यह तालुनासिक्य है जिस के उच्चारणार्थ तालुस्पर्श आवश्यक है अन्यथा ' यँ ' हो जायगा । अज्चल, उज्छ, अज्जन, झज्झा आदि में संयुक्तपरवर्ती वर्ण के साथ जकार का तालव्य उच्चारण हो ही जाता है, अत$ तदर्थ पृथक प्रयल अनपेक्षित है । 'ज्ञ' तथा ' याच्जा ' में यह परावयव हो कर आता है । ज्ञ के विषय में विचार किया जा चुका है । ' याच्ञा ' में सावधान रह कर उच्चारण करना चाहिए । उच्चारण ठीक न हो पाने से ही ' याचना ' हो गया है ।
(१३) ण - कण्टक, कण्ठ, काण्ड इत्यादि में णकार का श्रवण नकारसदृश प्रतीत्त होता है, परन्तु परघटक टवर्गीय व्यज्जन की मूर्धन्यता यथावत् रखी जाए तो पूर्वधटक भी मूर्धन्य ही रहता है | कुछ लोग ऐसे स्थलों में सायास उच्चारण कर मूर्धन्यता लाते हैं ।
(१४) पदान्त अनुस्वार - इस के पर यदि वर्गीय वर्ण होता है तो परसवर्ण उच्चारण हो सकता है - ग्राम॑ गच्छति > ग्रामड्रच्छति, धर्म चरति 5 धर्मज्चरति, ग्रन्थं टीकते 5 ग्रन्थण्टीकते, पाप॑ तरति > पापन्तरति, राम॑ भजति 5 रामम्भजति इत्यादि । ऐसे स्थलों में परसवर्ण घटित उच्चारण के लिए अत्यन्त सावधान रहना पड़ता है, अत£ अनुस्वार का ही उच्चारण श्रेयस्कर है ।
(१५) यँ-वें-लें - संयम, संवत्, संलाप के उच्चारण सर्यूयम, सवूवत एवं सलूलाप ही सरल हैं | प्रथम प्रकार ही लेखन में प्रायः आता है । उभयथा उच्चारण किया जा सकता है ।
(१६) स्क इत्यादि - शब्द के आरम्भ में संयुक्ताक्षघटक श-ष-स का दुरुच्चारण आबालवृद्ध व्याप्त है । इस उच्चारण में संयुक्ताक्षर के पूर्व प्राय/ अकार या इकार को जोड़ लिया जाता है
फलत$ दो मात्राएँ बढ़ जाती हैं | हिन्दी में मात्राछन्द लिखने वाले लोगों में यह रोग बढ़ा-चढ़ा देखा जाता है जहाँ स्मृति-इस्मृति, स्मरण-अस्मरण आदि हो जाते हैं । लिखने में शुद्धता होने पर भी उच्चारण की अशुद्धता बड़ी भारी समस्या है। स्कन्द-अस्कन्द, स्कन्ध-अस्कन्ध, श्रोतन-अश्लोतन या इश्ोतन, स्तम्भ-अस्तम्भ, स्तुति-इस्तुति, स्तोत्र-अस्तोत्र या इस्तोत्र, स्थान-अस्थान, स्थिति-इस्थिति, स्पन्द-इस्पन्द या अस्पन्द, श्मशान-अश्मशान या शमशान आदि हो जाते हैं ।
उक्त अशुद्ध उच्चारण के कारण पर विचार किया जाय तो स्पष्ट होगा कि उच्चारयिता स्थान एवं प्रयल का तालमेल बिगाड़ लेता है । श-ष-स के उच्चारण में ईषद्विवृत या विबृत प्रयतल होता है और स्थान तालु, मूर्धा तथा दन्त रहते हैं । जिह्माग्र को स्थान के पास उच्चारण से पूर्व इस प्रकार सटा लिया जाय कि जब वर्ण का उच्चारण हो तभी आभ्यन्तर-यल कार्यकारी हो। यदि ऐसा न किया जाय और विवृत प्रयल को पहले ही दाग दिया जाय तो स्वर का अनावश्यक उच्चारण अवश्यम्भावी हो जाता है । इस से सावधान रहना चाहिए ।
पाणिनीयशिक्षा / ८ (७) करणविचार
वर्णों का उच्चारण जिन अवयवों पर वायु के आघात से होता है उन्हें वर्णों का ' स्थान ' कहा जाता है जिन का विवेचन शिक्षाग्रन्थ में किया गया है । स्थानों से पृथक्क उन अबयबों की करण ' संज्ञा है जो वाताघात में अनिवार्य सहायक रहते हैं । प्रातिशाख्यों तथा शिक्षाग्रन्थों में पुष्कल विवरण पाया जाता है --
१ दन्त्या जिद्माग्रकरणा8। (शुक््लयजुर्वेदप्रातिशाख्य १ .७६ )
अर्थात् जो वर्ण दन्तस्थान से उच्चारित होते हैं उन का करण जिह्ना का अग्रभाग रहता है ।
२ रश्च । (वही १.७७ )
अर्थात् रेफ का भी करण जिह्बाग्र है ।
३ मूर्धन्या$ प्रतिवेष्टरयाग्रम् । (वही १.७८ )
अर्थात् (रेफ को छोड़कर सभी ) मूर्धन्यों का उच्चारण जिह्नाग्र को पीछे की ओर लपेट कर किया जाता है, अत8 उन का करण प्रतिवेध्टित जिह्ाग्र है ।
४ तालुस्थाना मध्येन । (वही १ .७६ )
अर्थात् जिन का स्थान तालु है उन के उच्चारण में जिह्नामध्य करण है ।
५ समानस्थानकरणा नासिक्यौछूया४ । धही १.८०)
अर्थात् नासिक्य हुँ ' तथा ओष्ठस्थानीय वर्णों का स्थान एवं करण एक ही रहता है ।
६ वो दन्ताग्रः | (वही १.८१)
अर्थात् वकार के करण दन्ताग्र होते हैं ।
७ नासिकामूलेन यमा४ | (ही १ . ८२)
अर्थात् यमों का करण नासिकामूल है ।
८ जिह्नामूलीयानुस्वारा हनुमूलेन | (वही 9 .८३)
अर्थात् जिह्ामूलीय तथा अनुस्वार का करण हनुमूल है जिसे पाणिनीयशिक्षा में दन्तमूल ' मानते हुए अनुस्वार को दन्तमूल्य कहा गया है ।
€ कण्ठ्या मध्येन | (वही १.८४)
अर्थात् कण्ठस्थानीयों का करण हनुमध्य है -- दन्तमूल तथा दन्ताग्र के मध्यभाग से उन का उच्चारण होता है ।
सामान्यतः हनु चिबुक या ठुट्टी का अर्थ देता है परन्तु यहाँ मुख के अन्तर्वर्ती भाग को लेना चाहिए । निचली दन्तपड्क्ति का अधोभाग ' हनु ' कहा गया है । (८) संयुक्ताक्षरविवेचन
स्वर से परवर्ती संयुक्ताक्षर के उच्चारण की प्रक्रिया बहुल है । उस के सूत्र इस प्रकार हैं -
१ स्वरात् संयोगादिर्दिरुच्यते सर्वत्र | (वही ४.१००) क्
अर्थात् स्वर से परे संयुक्ताक्ष के आदिम घटक का सर्वत्र द्वित्व होता है, यह सामान्य विधि है | जैसे , शक्य 5 शक्कय, चक्र 5 चकृक्र, वाक्य - वाक्य, वज्र 5 वजज , पाठ्य 5 पाट्ठय, जाडूय 5 जाइड्य, सत्य 5 सत्त्य, रथ्या 5 र॒त्थ्या, पथ्य 5 पत्थ्य, भद्र 5 भद्द्र, विद्या 5 विद्द्या, साध्य सादुध्य, गण्य 5 गण्ण्य, कन्या 5 कन्या, क्षिप्र क्षिप्र, सभ्य 5 सब्भ्य, नग्न ८ नम्प्र, काम्य 5 काम्म्य इत्यादि | इस नियम के कुछ अपवाद हैं - ।
२ परं तु रेफ - हकाराभ्याम् | ( वही ४ .१०१)
बा 5 मन ह नमन नम
पाणिनीयशिक्षा / ६
अर्थात् यदि संयोग में पूर्ववर्ती रेफ या हकार हो तो उन का द्वित्व नहीं होता प्रत्युत परवर्ती व्यज्जन का द्वित्व होता है । जैसे कर्म > कर्म्म, कार्य कार्य्य, अर्क > अकरर्क, सह्य + सहय्य, ब्रहम - ब्रहम्म इत्यादि | रेफ तथा हकार का किसी अवस्था में द्वित्व नहीं होता क्योंकि दो रेफ एक साथ ( संस्कृत में ) नहीं रहते-- एक का ' रोरि ' सूत्र से लोप हो जाता है और यर् प्रत्याहार के वर्ण ही द्वित्वभागी हैं, अतः हकार का द्वित्व नहीं होता -- अर्ह, गर्हा इत्यादि उदाहरण हैं । ३ ऊष्मान्तस्थाभ्यश्च स्पर्शश | (वही ४.१०२) अर्थात् ऊष्म (श॒षस )और अन्तश्स्थ (यर ल ब) से परे स्पर्श का द्वित्व नहीं होता, इन में य-व संयोग में पूर्वस्थ नहीं होते और रेफ का द्वित्व नहीं होता (जैसा कि देखा जा चुका है ) अत४ लकार को ही उदाहरण में लिया गया है -- कल्प, शाल्मली इत्यादि उदाहरण हैं । ऊष्मों के उदाहरण द्रष्टव्य हैं -- अश्व, शुष्क, वस्तु इत्यादि । ४ जिह्नामूलीयोपध्मानीयाभ्यां च | (वही ४.१०३) अर्थात् जिह्मामूलीय तथा उपध्मानीय से परे स्पर्शव्यज्जन का द्वित्व होता है -- क£करोति, क;क्खनति, वृक्ष:प्पतति, वृक्ष<प्फलति इत्यादि । ९ यैस्तु परं तैर्न पूर्ममू | ( वही ४ .१०४) अर्थात् जिनके साथ परवर्ती का द्वित्व होता है उन के साथ पूर्व का नहीं होता -- दो में एक की ही द्विरुक्ति विहित है । ६ नास्वर्पूर्वा ऊष्मान्तस्थाः | (वही ४.१०४) अर्थात् जिन के पूर्व में स्वर न हो ऐसे ऊष्म तथा अन्तस्थ द्वित्वभागी नहीं होते -- व्रत, श्री ै खुब आदि में पूर्व वर्ण का द्वित्व नहीं हुआ है । श्चोतन, स्तुति आदि में परवर्ती का द्वित्व नहीं होता । भगवान् पाणिनि ने दो सूत्रों द्वारा द्वित्व की वैकल्पिक व्यवस्था दी है -- अचो रहाभ्यां दे और अनचि च । परन्तु प्रायोगिक दृष्टि से प्रातिशाख्य की व्यवस्था ही योग्य है । ७ प्रथमैर्दितीयास्तृतीयैश्चतुर्धाश | (वही ४. १०८) अर्थात् वर्गीय व्यज्जनों के द्विर्वचन में दो तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए -- द्वितीय व्यज्जनों का द्विर्वचन वर्गीय प्रथम व्यज्जनों (के अनुसरण ) से होता है । उदाहरणार्थ -- सक्ख्य (सख्य ) व्याग््र (व्याप्र ) अर्ग्ध (अर्घ) शाट्ठ्य ( शाठ॒य ) /आड्ढूय (आढद्य ) , अर्त्थ ( अर्थ) रत्थ्या ( रथ्या) मद्ध्य (मध्य) अर्द्ध (अर्ध) सब्भ्य ( सभ्य) गर्ब्भ ( गर्भ) इत्यादि । पाणिनि ने एतदर्थ दो सूत्र बनाए हैं -- खरि च , झलां जश् झशि । ध्यान रहे कि पूर्ववर्ती पद के अन्त वाले स्वर के पश्चात् पदादि संयुक्ताक्षर में द्वित्व होता है - काव्यप्रकाश, घनश्श्याम | संयोगे गुरु पाणिनिसूत्र ऐसी ही व्यवस्था देता है । (६) विशेष लौकिक उच्चारण की दृष्टि से यहाँ ज्ञातव्य है कि भगवान् पाणिनि ने उक्त सूत्रों द्वारा द्वित्व को वैकल्पिक माना है परन्तु सर्वत्र विकल्प मानने पर सड्डत उच्चारण नहीं हो सकता -- द्वित्व न कर के दध्यानय ' लिखा जा सकता है परन्तु उच्चारण में ' दद्ध्यानय ' ही रहेगा । ' विप्र ' लिख कर भी ' विप्न ' ही बोला जाता है । ' कुरुक्षेत्र ' का उच्चारण ' कुरुकक्षेत्र ' ही होगा | कतिपय स्थलों में ही विकल्प देखा जाता है -- १ स्पर्श व्यज्जनों के परस्पर संयोग में द्विरुक्त उच्चारण प्राय४ नहीं पाया जाता-- उत्कट, शुक्ति, मग्न, तप्त, घट्कोण, उद्धव इत्यादि ।
पाणिनीयशिक्षा / १०
२ रेफ तथा हकार के पश्चात् द्वित्व का विकल्प ही रहता है -- कर्म>कर्म्म, कार्य < कार्य्य, कर्षण > कर्ष्षण इत्यादि । हकार के पश्चात् कदाचित् ही लोक में द्वित्वामकता ब्रह्म, चिह्न, पूर्वाह्न, सह्य, आह्वाद, आह्वान आदि में म, न, ण, य, ल, व को उच्चारित कर सकते हैं परन्तु प्राय8 वैसा पाया नहीं जाता । ३ दो पदों को एक साथ लेने पर यदि पहला पद हलन्त तथा परवर्ती नहीं पायी जाती है --- ग्रामाद्
उच्चारित करते हैं | इस दृष्टि से शुकूल भी बोला जा सकता है |
£ यदि तीन वर्णों का संयोग होता है तो द्वित्वामक उच्चारण लोक में नहीं पाया जाता क्योंकि उस दशा में व्यर्थ आयास करना पड़ता है -- ओष्टय, दन्त्य, कैल्त्न इत्यादि । परन्तु ' सामग्रय ' इत्यादि का ' सामग्ग़य्य ' ही उच्चारित
प्रस्तुत हैं, जिस से समग्र शिक्षा-वेदाडु
'गिक्षा प्रथ्या यथा नेष्यन्ती शाकग्रयजग्रय्थ्ि / एतत्वा अजभ्ग्रद वर्षा 4न्ात्उच्छेक्ति// 9 / /
अगिवर्ष कन्रत्व॑ श्रनिज्षब्दं क्रद्मरतं दढात्येत / व शुक्षे कक्तज्ज्ः बन किकुक्षत्रं प्यर्धदीय> स्यात् //२//
कबद्ूलानोः कर्क करेगहो १9वदो ब्रफय / अश्यय्षते कऋज्जनि (कक रेत खह्य //३//
रामनवमी बच्चूलाल अवस्थी ज्ञान विक्रमाब्द २०४०
अथ पाणिनीयशिक्षा
या प्ादेन लयोदयव्यसनिनी व्याप्य त्रिलोकी सविता नि/स्पन्दा व्यगतिषते सविभवा मूला#ये आापिन/ / सस्पन्दा हृदय गलास्यविवरं व व्यश्वुते नादिनी
या श्रेतीमयते ववो5वकलनों तो देवतामाश्ये / /
आवचार्य- सम्प्रदाय परम्परीणं श्रणम्य /शिक्षाया। / त्रिनगन#ाष्यं तबुते क्लूलालो मुदे झुधियाम् //
पाणिनीयशिक्षा ऋक्प्रातिशाख्यमनुसरति । तैस्वर्यविषयकं हस्तप्रयोग - मधिकृत्य सामगानरीतिमपि विनियुड्क्ते | तस्या आदिम8 श्लोक8 -- -
पाणिनीयशिक्षा ऋग्वेदप्रातिशाख्य का अनुगामी ग्रन्थ है । वर्णों के त्रैस्वर्य से सम्बन्धित हस्तप्रयोगों को ले कर सामगान की रीति का विनियोग भी इस में मिलता है | पाणिनीयशिक्षा का यह प्रथम श्लोक है --
१ | अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि पाणिनीयं मतं यथा । शास्त्रानुपूर्व तद् विद्याद् यथोक्तं लोकवेदयो8 |। १। ।
अथेत्यानन्तर्य माडूल्ये च | शिष्यजिज्ञासानन्तरं यथा पाणिनीयं मत
( तथा ) शिक्षां नाम वेदाडुशास्रं प्रवक्ष्यामि प्रवचनेन विशदीकरिष्यामि । तच्च पाणिनीयं मतं यथा लोके वेदे चोक्त तथा शासत्नानुपूर्व पूर्वाचार्य - परम्परागतानुशासनपूर्वक॑ विद्याद् विजानीयातू | नहि लोके5पि साधु - शब्दोच्चारणमपशब्दनिरसनं च परम्परानुगतशास्त्रादृते सम्भवतीत्याशय३ ।
अत्र साधुशब्दोच्चारणजिज्ञासुधिकारी _। शब्दज्ञानमुच्चारणमुखेन प्रयोजनम् । तत्प्रतिपादनं शासत्रेणानेन क्रियत इति साधुशब्दो विषय३ ।
पाणिनीयशिक्षा / १२
। - आदत बह उशाजिशि प्रशिपाशप्रतिधादकशय वाला ५ तथा ञ ] । ' $ चेद॑ शासत्रमिति प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव३ सम्बन्ध३। तथा च प्रातिशाख्यम् - - - पदक्रमविआगज़ो व्णक्रमविच#_ण: / स्वरमाऋतविशेषज्ञे गच्छेदावायसम्पदम्/ / (ऋग्वेदप्रातिशख्यम 7-८५ न
शिक्षाविदामेवाचार्यत्वसम्पत्तिरिति तात्पर्यम् । ।१। |
इस श्लोक में ' अथ ' शब्द दो अर्थों -- अनन्तरता तथा मडूलाचरण में प्रयुक्त है । शब्दार्थ के विषय में जानने की इच्छा रखने वाले शिष्य की जिज्ञासा के अनन्तर ग्रन्थकार शिक्षा नामक वेदाड्डशास्र की पाणिनीय मत के अनुसार व्याख्या देंगे | उस पाणिनीय सिद्धान्त को, जैसा लोक और वेद में कहा गया है, पूर्वाचार्यों की परम्परा के अनुशासन के साथ जानना चाहिए । आशय यह है कि लोक में भी परम्परा से प्राप्त शाख्र का आधार लिये बिना साधु शब्दों का उच्चारण तथा अपशब्दों का निराकरण सम्भव नहीं है ।
साधु शब्द (व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध शब्द ) के उच्चारण का जिज्ञासु इस शास्त्र को पढ़ने का अधिकारी है । उच्चारण के द्वारा शब्द का ज्ञान प्रयोजन है । इस प्रयोजन का प्रतिपादन शिक्षाशास्र करता है इसलिए साधु शब्द विषय है । शिक्षाशाख्र और शब्दज्ञान में प्रतिपाद्य - प्रतिपादक -भाव सम्बन्ध है । जैसा कि ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (१.८) में कहा गया है - - -
पदों के क्रम और विभाग को जानने वाला, वर्णों के क्रम तथा स्वर की मात्रा का विवेक करने वाला पुरुष (शिक्षाशास्र का ज्ञाता )ही आचार्य - सम्पदा को प्राप्त कर सकता है । ।।१। |
ननु लोके लौकिकैवेंदे च वैदिकैराप्तैर्यथा शब्द उच्चार्यते तथा शिष्या अप्पयुच्चारयेयु8। शिक्षाप्रवचनस्य॒ प्रयोजनं नैव लक्ष्यत इति प्रश्नं मनसिकृत्याह -
प्रश्न उपस्थित होता है कि लोक में लौकिक तथा वेद में वैदिक आघ्त (विश्वस्त) लोग... «»
| जैसा उच्चारण करते हों, वैसा ही शिष्यों द्वारा भी कर लिया जाए, शिक्षा के प्रवचन का तो कोई प्रयोजन नहीं दिखाई देता, इसी शडूग को ध्यान में रख कर कहते हैं -
। प्रसिद्धमपि शब्दार्थमविज्ञातमबुद्धिभि 5 | क् पुनर्व्यक्तीकरिष्यामि वाच उच्चारणे विधिम्। |२। ।
शब्द8 (अपशब्दं विहाय ) साधु३ शब्दो3र्थ३ प्रयोजनं यस्य स शब्दार्थस्तं
द शब्दार्थ शब्दप्रयोजनकम्, प्रसिद्धमपि लोकप्रमाणसिद्धमपि अबुद्धिभि - क् रनुशासनं विना साधूचारणबोधरहितैरविज्ञातं _ शब्दापशब्दविवेक - क्
छः गम फलक रू 7 ७ ्उलमर-क चब-बत। 5
पाणिनीयशिक्षा / १३
पूर्वकज्ञानागोचरम् , वाच$ साधुशब्दस्योच्चारणे समुच्चारणविषयक विधि शास्त्र पुनः, अव्यक्त व्यक्त करिष्यामीति व्यक्तीकरिष्यामि। सिद्धस्यापि पुनर्व्यक्तीकरणे हेतुश्च बोधरहितैरविज्ञातत्वम् | |२। |
अपशब्द को छोड़ कर साधु शब्द जिस का प्रयोजन है, जो प्रसिद्ध (लोकप्रमाण से सिद्ध ) है, परन्तु मन्दबुद्धि लोगों द्वारा जो नहीं जाना गया है, ऐसे साधु शब्द के उच्चारण को बतलाने वाले शिक्षाशासत्र को मैं (पाणिनि ) प्रुन व्यक्त करूँगा ।
साधु शब्द के उच्चारण को न जानने वाले जन अबुद्धि कहे गये हैं। वे शब्द और अपशब्द का विवेक करने में असमर्थ हैं। वस्तुत४ शिक्षाशाखत्र तो सिद्ध है, किन्तु बोधहीन जन उसे नहीं जानते, अत एव वह शास्त्र उन के लिए.अव्यक्त ही है। इसीलिए यह कहा गया है कि. मैं विधि (शाखत्र) को पुन8 व्यक्त करूँगा | |२।।
त्रिषष्टिश्चतुष्षष्टिर्वा वर्णा8 शम्भुमते मता$। प्राकृते संस्कृते चापि स्वयं प्रोक्ता8 स्वयंभुवा | |३। |
कतिसंख्या वर्णा? सनन््तीत्याह त्रिषष्टिश्चतु१षष्टिवीति | तेषां वर्णानां परम्पराया अनादित्वं ब्रुवाण आह - ते वर्णाः शम्भुमते मता इति । कुत्र ते वर्णा$ प्रयुज्यन्त इत्याह - प्राकृते संस्कृते चापीति | प्राकृतमिह खलु वैदिक वच8, तत्र हि व्याकरणशाश्रीया8 संस्कारा न प्रभवन्तीति कृत्वा प्रकृत्यैव निष्पन्नम् । यमा$ संस्कृते न प्रयुज्यन्त इति मनसिकृत्य चापीत्युक्तम् । कल्पादौ स्वयम्भुवा ब्रह्मणा स्वयमेव प्रोक्ता इमे वर्णा इत्याचार्य-परम्परा सूचिता । चतुअषष्टि३ संख्या प्लुतम्लूकारमपि गृहीत्वा भवति । ननु दीर्घमपि लृकारं नाट्यशास्त्रीया8 पठ॑न्ति, तत् पज्चषष्ट्या वर्णैर्भाव्यमिति चेदू, भगवान् पाणिनिरप्याह -
गद्वच्छाशब्देडशक्तिनाबुकरणे दवा यदा दीपा? स्ट॒स्तदाषदशप्रभेदं द्वगते क्लूपक ड्ति/ ( फणिनीयाशिकसत्रमू, उल्धपाठ# 4. 4)
क्वचित् स्वैरं॑ नाम कुर्वान्ति, क्वचिच्च शास्रोक्तोच्चारणशक्तिरहिता असाधूच्चार॒यन्ति, तत्र दीर्घो5पि लुकार३ सम्भवति किन्तु वेदे संस्कृते च नेव तदुपयोगण इति।
अन्र दुध्स्पृष्ट एक एव गणित४। स च स्वरयोर्मध्ये डकारस्थाने छ इति, ठकारस्थाने च छूह इति | यथा ईडे - ईले, मीदुषे- मीलहुषे इति | तथा च प्रातिशाख्यम् -
के ् ब्द्ड््क्स्कच्तः के आ _क डा 3... न से हि
पाणिनीयशिक्षा / १४
द्रयोश्वास्य स्वस्योमध्यिमेत्य सम्पद्यने स॒ डकारो ब्ठकार/ / ब्उल्कारतामोति स॒ एव वास्य ढकार/ स्रष्मणा सम्प्रयृुक्त/ / / (ऋग्वेदप्रातिशाख्यमू 7. ६२)
अत्र छकार एवोष्मणा हकारेण संयुक्त ४ सन् छूहकारो भवतीति न वर्णद्वयं गणण्यते | |३। |
वर्णों की संख्या के विषय में कहा गया है- ६३ अथवा ६७४ वर्ण हैं। उन वर्णों को परम्परा अनादि मानती है, यह बतलाते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- वे वर्ण शिव-मत में माने गये हैं। उन वर्णों का प्रयोग कहाँ होता है ?प्राकृत में और संस्कृत में भी । यहाँ प्राकृत से अभिप्राय वैदिक भाषा से है । वैदिक शब्दों में व्याकरणशाखत्र के संस्कारों अथवा नियमों का अधिकार
प्राप्त नहीं होता, अतः वे प्रकृति-निष्पन्न माने गये हैं । यम (कुँ, खुँ, गुँ, घुँ) लौकिक संस्कृत
में प्रयुक्त नहीं होते, इसीलिए ' चापि ' का ग्रहण किया गया है । यृष्टि के प्रारम्भ में स्वयम्भू ब्रह्मा ने स्वयं इन वर्णों का उच्चारण किया था, इस से आचार्यपरम्परा सूचित होती है । प्लुत लूकार का भी ग्रहण करने पर ६४ संख्या हो जाती है । यदि यह कहा जाए कि नाट्यशासत्र के अध्येता तो दीर्घ लुकार का भी उच्चारण करते हैं, तब क्या ६५ वर्ण होने चाहिएँ ? भगवान् पाणिनि ने भी कहा है- कभी कुछ लोग स्वेच्छा से स्वच्छन्दतापूर्वक लृकार का दीर्घ उच्चारण करते हैं और कभी शाख्रोक्त रीति से उच्चारण करने में असमर्थ लोग अशुद्ध उच्चारण करते हुए दीर्घ लुकार का प्रयोग कर देते हैं | वैसे अशुद्ध उच्चारणों का अनुकरण किया जाए तो दीर्घ लुकार भी हो सकता है किन्तु वेद या संस्कृत में उस (दीर्घ लूकार ) का भाषाणगत उपयोग नहीं है । यहाँ दुःस्पृष्ट एक ही गिना गया है। वह हैं - दो स्वरों के बीच आने वाले डकार के स्थान पर छ और ढकार के स्थान पर छह। उदाहरणार्थ, ईडे- ईल्छे, मीढुषे - मीव्ठहुषे । प्रातिशाख्य में इसी बात को इस प्रकार कहा गया है-
दो स्वरों के मध्य आ कर डकार, छकार तथा ऊष्म वर्णों के साथ दो स्वरों के मध्य आने वाला ढकार छूहकार हो जाता है।' (ऋग्वेदप्रातिशाख्य १ .५२ )
यहाँ कार ही ऊष्म वर्ण हकार के साथ जुड़ कर बहकार हो जाता है, अत४ दो वर्णों
क् की गणना नहीं की गयी है ।।३।।
तत्र वर्णानां गणना -
स्वरा विंशतिरेकश्च स्पर्शानां पञ्चविंशति३ | यादयश्च स्मृता ह्ाष्टी चत्वारश्च यमा8 स्मृता8 | ।४। ।
अनुस्वारो विसर्गश्च ४क४पौ चापि पराश्रितौ। दुः्स्पृष्टश्चेति विज्ञेयो लुकार8 प्लुत एव च ।५। |
थ बम मम मम कस 2 पी
3... 33333» ++» आम
'अरममकानन..-..+>4-+>--न#»»-+++>वाक-+ ५».
पाणिनीयशिक्षा / १५ लकिनिननिननलजजल अल न... नभु॒नुनभ॒ 2 आआआआआआआशआआशणशशशणशणशणेआछशशआशशशशभभभ/शाशणशणशणशणशशशथशथशथशथशनथनशशशआनानभभााा आर आ कक अल लुु-ु॒॑ (क) एकविंशति३१ स्वरा यथा - द (१9) 3 ड़ उ, ऋ इ्येते हस्वदीघप्छुतओेदेन द्वादश / (२/ लुकारो हस्त एवेक/ / (2) 2 टऐे ओ ओ छ्त्येते दीघपप्छुतभदेनाएं / -- २१ . (ऋगवेदप्रातिशाख्यम् 9- € अबुसन्धेयमू) (ख) पज्चविंशति३ स्पर्शा यथा - करवों गघो 5 / बछ्छों जले आ / टरगोे डब्ों थ / तदो दधों न ? पफोे बने म / ( ऋग्वेदप्रातिशख्यम 97- 9०) (गण) अष्टी यादयो यथा - यरलगा# / लशपसा//. (तत्रेव) न्ः १6 (घ) चत्वारों यमा३ - अत्र यमोपदेश# / ( ऋग्वेदप्रातिशाख्यम् 9. ६०) नासिक्येषु यमानामुपदेश इत्यर्थ;। अपि चात्रैवाहोवट8 - (9) पलिकृकूनी/ इत्यत्र ककारसरूपो यम/ / (२) वसृरसॉनत्/ इत्यत्र खक्रारसरूपो यमः/ (९) नमगृगूँगदु/ इत्यत्र गकारसरुपो यम/ / (४) नपघृएँनदु/ इत्यत्र धरक्कारसरूपरो यम// डति/ अतश्च प्रातिशाख्यम् - यम? श्रक्वत्येव सट्टकत/ /ऋग्वेदप्रातिशख्यम 4. 2२० तथा च सिद्धान्तकौमुदी - संज्ञाप्रकरणे - वर्गष्वाद्मनों चदुर्णा पज्चमे परे मो नाम प्रूवसद्ठशे व०४ श्रातिशख्ये प्रसिद्ध डति / न्ज कद (डः) अनुस्वारो विसर्गश्च ४क इति जिह्नवामूलीय४४ प इत्युपध्मानीय8 । ४क ४पौ च पराश्रितौ भवत४। परवर्तिकवर्णगाश्रितो जिह्ला - . मूलीय8। परवर्तिपवर्गाश्रितश्चोपध्मानीय इति । अश#क्रांप अँ / ( ऋग्वेदफ्रातिशख्यम 9. 9०) न्ः 4२ (च)उक्तरूपो दु४स्पृष्टश्च छकार३ | 42 (छ) लृकार४ प्लुत एव चेति चतुशषष्टिरपि वर्णा गण्यन्ते | झति वणशाशि/ क्रमश्व/ ( ऋग्वेदग्रातिशाख्यम 9 9०) (ज) अनुकरणे दीर्घस्य लृकारस्य ग्रहणात् तु पज्चर्षष्टि8 | | ४-५ | |
॥ श
पाणिनीयशिक्षा / १६
कक ज ाकी कक ०: पद लीक पक) की गणना :- |
( क ) २१ स्वर - | ()अ इ उ ऋ के हस्व, दीर्घ तथा प्लुत भेद - १२ (२)लू (केवल हस्व ) -
(२)ए ऐ ओ औ के दीर्घ तथा प्लुत भेद -
(द्रष्टल्य, ऋग्वेदप्रातिशाख्य १.६)
| ( ख )२७५ स्पर्श -
क ख गघडः।| चछजझज ।
टठडढण।| तथदधन।
पफबभम | -- ७६ | (ऋणग्वेदप्रातिशाख्य १ .१०) |
| (ग ) ८ यादि- यरलव | हशषस। -- ५४ द (ऋण्वेदप्रातिशाख्य १.१०)
द (घ )४ यम -
ऋणग्वेदप्रातिख्य (१.५०) तथा उस पर उबट के भाष्य से यमों का स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट होता है -
(9) पलिक्कनी - यहाँ ककार का सरूप यम ।
(२ ) चख्खेंनतु४ - यहाँ खकार का सरूप यम ।
(३ ) जग्गैमतु8 - यहाँ गकार का सरूप यम ।
(४) जघ्घँनतु४ - यहाँ घकार का सरूप यम ।
ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (६.३२) के अनुसार यम स्वभावतः सदृश वर्ण है।
सिद्धान्तकौमुदी के संज्ञाप्रकरण में भी कहा गया है कि - ' वर्गों के प्रथम चार वर्णों के बाद यदि पॉाँचवाँ वर्ण हो तो वहाँ यम नामक पूर्वसदृश वर्ण प्रातिशाख्य में प्रसिद्ध है ।'
न्न्प८ ।
५... कक न्नक «८... सनक +----सा७
+ पस्प> 5: पान अफकीकान---+नन--क-अलल८--:फन किन" 3-.----
( डः) ४ अनुस्वार आदि -
अनुस्वार , विसर्ग , क जजिह्ाामूलीय तथा पल उपध्मानीय। कतथा प पराश्रित होते हैं। परवर्ती कवर्गाश्रित जिह्लामूलीय तथा परवर्ती पवर्गाश्रित उपध्मानीय कहलाता है। ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (१.१०) में इनका स्वरूप दिया गया है । अ$ क पअं क्रमश8 विसर्ग, जिह्लामूलीय, उपध्मानीय तथा अनुस्वार )
बताता उगाा--- के ॥ 8 लमहता-म 0 कफील-क-.- कर जनता -+क-+-->क-बकक. कक कक
(च) दुध्स्पृष्ट ठकार -- ६३ (छ ) प्लुत लूकार को मिला देने पर वर्णों की संख्या ६४ हो जाती है। 5-६४
* 4 ब।। ० न #_ दि क
पाणिनीयशिक्षा / १७
(ज )अनुकरण की दशा में दीर्घ लूृकार का भी ग्रहण करने की स्थिति में ६५ वर्ण जिने जा सकते हैं। | ४-५। |
अथ वर्णच्चारण - प्रक्रियामाह - (२ ) आत्मा बुद्ध्या समेत्यर्थान् मनो युडनक्ते विवक्षया | मन कायाम्लिमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् । |६। | मारुतस्तूरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् | प्रातश्सवनयोगं तं॑ छनन््दो गायत्रमाश्रितम् | 4७। । कण्ठे माध्यन्दिनयुगं मध्यमं त्रैष्टभानुगम् | तार तार्तीयसवनं शीर्षण्यं जागतानुगम् । ।८। ।* सोदीर्णो मूध्न्यभिहतो वक्त्रमापद्य मारुत३ | वर्णज्जनयते --------------- ।६। | आत्मा कर्ता बुद्ध्या करणेन वाच्यानर्थान् समेत्य समूहरूपेणैक्यं नीत्वा विवक्षया वक्तुमिच्छया बुद्धिस्थानर्थञ्छब्दवाच्यतां नेतुं कामनया मनोवृत्ति युडक्ते नियुनक्ति। नियुक्त सन्मन$ कायाग्रि जाठरानलमाहन्ति। स कायाम्लिम्मरुतं प्राणवायुं प्रेरयति। प्रेरितो वायु; पुनरुरसि विचरन् प्रातःसवनयोगं गायत्र॑ छन््द आश्रितं तं मन्द्रं मन्द्रनादोपेतं स्वर॑ं जनयति |
हृदयान्मूर्धपर्यन्तं यद् विवरं तत् त्रिधा विभज्यते | उर8 कण्ठ३ शिरश्चेति | उरोभागेन मन्द्रस्वरनिष्पत्तिः। उरसि विचरन् वायुर्य मन्द्रं स््वर॑ं जनयति स
प्रातश्सवनयोगो भवति----------++- प्रातः काले यत् सवनकर्म तस्मिन् युज्यत इति प्रातः सवनयोगस्तं तादृशम्। स च स्वर१ पुनर्णायत्र॑ छन््द आश्रितं स्यात्ू---००५०-०-०-०८०५---- यथा प्रभाते गायत्री छन््द३ पठ्यते तथा तदुच्चारणमिति भाव४।| स॒ एव मारुत8 कण्ठे चरन् मध्यमं ( मन्द्रतारयोम॑ध्यवर्तिनं ) स्वरं जनयति, यो माध्यन्दिनयुगू भवति-------- मध्याहूनकालिकसवनकर्मीणि
युज्यते, अपि चासौ स्वरस्रैष्ठ भानुगं स्यातृ--------- यथा तिष्टुप् छन््दो गीयते तथानुगीयत इति। पुन४ स वायु मूर्धविवरमनुप्रविष्ट ४ शीर्षण्यं शिरोजन्यं 9 शरीर मन्द्रसक्षूतं छन््दो गयत्रसॉनितमृ / कणप्ठे मरध्यन्दिन प्रोक्त ओहुओं परिकीत्यति/ /
ठृलीयसबरनं कापि शीपण्यं जागतें (लि यत्/ / / नाट्यछराम् १६ 9०7२-३०»
न ज्द्काछ्ह्हइर हू
पाणिनीयशिक्षा / १८
जागतानुगं॑ तार्तीयसवनं तारं स्वरं जनयति------०---- -जगती छन््दो यथा गीयते तथानुगीयते, जगत्या इदं जागतम् | स त्रिधा विभक्त उदीर्ण ऊर्ध्व॑ प्रेरितो वायुर्मूध्नि शिरस्यभिहतो 5भिघातं प्रात/ सन् वर्णज्जनयति। वर्णानां जननात् पूर्व त्रिधा मन्द्रमध्यतारस्वरविभाग8 | भरतमुनिरप्याह - | सर्वेष्रमप्येषां मन्द्रमध्यतारक्ृत/ श्रयोगशिस्कानगत// तत्र दृरस्थाउमपपणे तार॑ ह शिरसा. नातिदूरे मध्यं कण्ठेन, प्राश्वतो मन्द्रगुरसा श्रयोजयेत् पाठ्यमिति/ .. ( नाट्यशारसम् 9७ 92०) नारदीयशिक्षा जगौ - उर# कण्ठ/ /शशिरश्वेव स्थानकानि तऔ्रीणि गाड़्मये/ सवनान्याहरंतानि._ --+--०----०-------८ // ज्ति // तत्रोर8स्थानं प्रातश्सवनम्, कण्ठस्थानं मध्याह्मसवनम्, शिर8स्थानं च तृतीयं ( तार्तीयं ) सायंसवनमिति। वर्णविषये शिक्षासूत्रमपि - नाभिप्रदेशत् प्रवत्नप्रेरित? श्राणो नाम वगद्ररूध्वमाक्रामब्र/प्रक्षतीनां
स्थानानामन्यतमशस्मिन् स्थाने श्रवत्नेन /विधायते / स/विध्षायमाषो दादग# स्थानमभिहनन्ति/ तस्मात् स्थानाभिष्राताद् ध्वनिरुत्पद्चत आकाशे / सा वर्णड्ति/
सर वर्णस्यात्मला॥अ# / / आपिशलशिक्षासत्रम ८. ?) अथ चेम॑ प्राणमुदानवायुरूपमाहु४, नाभितलादूर्धमुख -गमनात् । अत उज्जहारोवट8 -
उपरिषछटन्युस्ादग ऊर्प्व यो वतते5/निल/ / ऊदष्वक्रमीक्रिया# सवा? श्राणिनां सम्प्रवतयिन् / /
ना/भ्दूरो5ग शिरोआग्गं गब्छन् करणसगव्रत/ /
कणप्ठताल्वोछदन्तानों सप्रयत्न/ समीरित/ /
हस्वदीघप्लुताबु वणान् /सजिग्ध/नब् रु॥#श्व नेकथा /
उद्तत्तानबुद्ात्माश्वि स्वरितान् कम्पितानापि / /
समान् /विकीणाश्व तथा सद्रताब्ु विद्वलानपि /
दोलिनामकग्रोधार्य तेनोदान/ स उच्यते // ( ऋग्वेदप्रातिशख्य उकदक्षाष्यम 992. 9)
त्रिधा सवनमित्येतस्मिन् विषये पाणिनीयशिक्षाया? ३६-३७ श्लोकयो ३8 पुनर्विचार8 करिष्यते || ६-६ । |
आत्मा, बुद्धि के साथ वाच्य अर्थों को समूह रूप में एकत्र कर विवक्षा (बुद्धिस्थ वर्णो को शब्दों द्वारा व्यक्त करने की इच्छा )से मनोवृत्ति को नियुक्त करता है | मन नियुक्त हो कर जठराग्रि को उद्वेलित करता है और जठराम्रि प्राणवायु को प्रेरित करता है । प्रेरित वायु
न जाम
पाणिनीयशिक्षा / १६ न्श्ध््श््न्ल्ध्न्न्नल्ग््ब्ड्््क्ि्््््ू््््््यन्न््च्स्न्््ल्ल्डल्_-_-स-स ्ड्ड््डिडडिडिडि
पुन उर४स्थल में विचरण करता हुआ, प्रातश्कालीन यज्ञ से संबद्ध गायत्री छन््द का आश्रय ले कर मन्द्र नाद से युक्त स्वर को जन्म देता है ।
हृदय से ले कर मूर्धा तक के विवर को तीन भागों में बाँठा गया है -- - उरस्, कण्ठ और शिर । मन्द्र स्वर की निष्पत्ति उरोभाग से होती है । उरशप्रदेश में विचरण करता हुआ वायु जिस मन्द्र स्वर को जन्म देता है, वह प्रात2काल के सवन-कर्म के उपयुक्त होता है । जिस प्रकार प्रात४काल में गायत्री छन््द का पाठ किया जाता है, वैसा ही उच्चारण मन्द्र स्वर का भी है ।
वही वायु कण्ठप्रदेश में विचरण करता हुआ, मन्द्र और तार के मध्यवर्ती मध्यम स्वर को जन्म देता है । यह मध्यम स्वर मध्याह्वकालीन सवन -कर्म के उपयुक्त होता है और इस का उच्चारण तिप्ठुप् छन््द के गान जैसा होता है ।
पुन8 वही वायु मूर्धा -विवर में प्रविष्ट हो कर शिरोभाग से जन्म लेने वाले तार स्वर को जन्म देता है | यह तार स्वर सायंकालीन सवन-कर्म के उपयुक्त तथा जणती छन््द के समान उच्चारण वाला होता है ।
इस प्रकार तीन भागों में विभक्त हो कर, ऊपर की ओर प्रेरित वायु मूर्धा से अभिघात प्राप्त कर वर्णों को जन्म देता है । वर्णों की उत्पत्ति से पूर्व ही मन्द्र, मध्यम और तार स्वरों का विभाग किया जाता है ।
भरतमुनि ने नाट्यशास्र (१७. १३०) में दूर स्थित व्यक्ति से सम्भाषण करने में शिर द्वारा तार स्वर, निकटस्थ से कण्ठ द्वारा मध्य स्वर और पार्श्वस्थ से उरस् द्वारा मन्द्र स्वर से पाद्य के उच्चारण का निर्देश किया है ।
नारदीयशिक्षा के अनुसार वाइमय के तीन स्थान हैं -- उरस्ू, कण्ठ और शिर । इन्हें ही क्रमश४ प्रातःसवन, मध्याह्ॉसवन तथा सायंसवन कहा गया है ।
आपिशलकशिक्षायूत्र (८ . १) में वर्णश्रुति की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि प्राण नामक वायु प्रयत्नपूर्वक प्रेरित हो कर नाभिप्रदेश से ऊपर की ओर उठता है और उरस् आदि स्थानों में से किसी एक में ठहरता है | वह वायु स्थान पर अभिघात करता है जिस से आकाश में ध्वनि उत्पन्न होता है । यही वर्णश्रुति या वर्ण का अपना स्वरूप है ।
नाभि से ऊपर की ओर जाने वाला होने के कारण इस प्राण को उदान वायु भी कहा जाता है । इसीलिए ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१३. १) पर अपने भाष्य में आचार्य उवट ने स्पष्ट किया है कि जो वायु प्राणियों के मुख से ऊपर की ओर क्रियाओं को प्रवर्तित करता है , वह उदान कहा जाता है | यह वायु नाभि, उरस् और शिरोभाग की ओर जा कर कण्ठ, तालु, ओष्ठ, दन्त आदि के प्रयत्नवश वर्णों के - - - हस्व, दीर्घ, प्लुत, ख्रिग्ध, रूक्ष, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, कम्पित, सम, विकीर्ण, संबृत और विवृत --- अनेक रूपों का बोध कराता है ।
त्रिधा सवन के विषय में पाणिनीयशिक्षा के श्लोक क्र. ३६-३७ पर पुन8 विचार किया जाएगा || ६-६ । |
““८“८--- तेषां विभाग8 पञज्चधा स्मृत४ | ।६। | स्वरत8 कालत8 स्थानात् प्रयत्नानुप्रदानत३ । इति वर्णविदः प्राहुर्निपु्णं तत्निबोधत | |१०। |
पाणिनीयशिक्षा / २०
उत्तरीत्या मारुतेन जनितानां वर्णानां पजञज्चधा विभाग़8 स््मृत$ शिक्षाशास्रेषूपरर्णित३ | इतीमं वर्णविभागं वर्णविद आचार्या8 प्रातिशाख्यादिषु प्राहुए। त॑ विभागं निपुणं यथा स्यात् तथा समाहितचेतसा निबोधत जानीत,
हे शिष्या इति शेष३ | ।६-१०0। |
उक्त रीति द्वारा वायु से जन्म लेने वाले वर्णों को शिक्षाशाखों में पाँच भागों में विभक्त किया गया है। प्रातिशाख्यादि ग्रन्थों में वर्णों के ज्ञाता आचार्यों ने इस वर्ण विभाग को (१) स्वर (२) काल (३) स्थान ( ४) प्रयत्न ( आभ्यन्तर यत्न ) और (५) अनुप्रदान (्ाह्म यत्न ) के भेद से पजञ्चधा कहा है। (हे शिष्यो ! इस वर्णविभाग को भलीभाँति जानो || ६-१० । | (३ ) उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरास्त्रय8 ।
हस्वो दीर्घः प्लुत इति कालतो नियमा अचि | |११। | अचि अज्विषये5कारादिषु त्रय४ स्वरा ज्ञेयाई। के त इत्याह --- उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्चेति। तथा कालतो ह॒स्वो दीर्घः प्लुत इति नियमा३ | अचामिमे नियमा$ क्रियन्ते हस्वादयो यान् मात्राभेदान् वर्णयन्ति -
वापस्तव॒ वदते मार्त्रां द्विमात्रों गयसोउब्षवीत् / जिरखी त्रिमात्री विज्ेग एप मातऋ्रपरिग्रह/ // ( ऋग्वेदग्रातिशाख्यम १३.५०)
समग्रात् पाठ्यात् पृथगेव तदूगता हस्वादयो मात्राभेदा इति स्पष्टयन्नाह भगवान् _ पाणिनिर्नियमा इति। अकारादिगता एवेमे मात्राभेदा वृत्तिभेदेभ्यो 5तिरिच्यन्ते। समग्रपाठ्यविषया हि वृत्तयः | तथा हि -
तिर उत्तीरपदिश्न्ति गच्े विलन्बितां मध्यमां व दुतां व // (तत्रेव 22४4)
न वृत्तिरेव मात्रा, तयोव्यप्यव्यापकभावात्। तदाहु४ -
मात्राविशेष/ अलतिव्वत्युफैलि / (तत्रेव १३४८) प्रत्येक वृत्तिषु मात्रात्रयं भवति, तेन मात्रा वृत्तिभिव्यप्यन्ते। तत्र
वृत्तिविषये विशेष३ -
अभन्यासार्थे द्वतों ढ्वत्तिं श्रयोगार्दे दर मध्यमामृ्/ शिव्याण्रमुपदेशारे क्॒याद् ठरत्िं /गिलम्बितामु/ / (तत्रेव१३.४6/
पाणिनीयशिक्षा / २१
प्रतिवृत्ति हस्वादयो भवन्तीति दिक् || ११। |
अकारादि अचों (स्वरों ) के विषय में तीन स्वर जानने चाहिएँ। ये हैं- (१)उदात्त (२) अनुदात्त और ( ३)सवरित | कालत# स्वरों के तीन नियम हैं- (१)हस्व (२) दीर्घ तथा (३)प्लुत । स्वरों के ये ही हस्वादि नियम मात्राभेद कहे जाते हैं। ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१३. ५०) में कहा गया है कि नीलकण्ठ पक्षी एक मात्रा, कौआ दो मात्रा तथा मयूर तीन मात्राओं का उच्चारण करता है।
अकारादि सवरों के ये मात्राभेद वृत्तिभेदों से भिन्न हैं। वृत्तियों का विषय समग्र पाठ्य होता है। ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१३ .४६) में स्पष्ट कहा गया है कि वाणी की तीन वृत्तियां हैं- (१)विलम्बित ( २) मध्यम और (३)द्बुत । वृत्ति को ही मात्रा नहीं समझ लेना चाहिए क्योंकि उन में व्याप्यव्यापकभाव सम्बन्ध होता है। ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१३ . ४८) में पुन कहा गया है कि प्रत्येक वृत्ति में तीनों मात्राएँ होती हैं। वृत्तियों के प्रयोग के विषय में वहीं (१३.४६) निर्देश है कि अभ्यास के लिए द्वुत, प्रयोग के लिए मध्यम और शिष्यों को उपदेश देने के लिए विलम्बित वृत्ति का प्रयोग करना चाहिए। इस से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक वृत्ति में हस्वादि मात्राएँ होती हैं। | ।9१। |
उदात्ते निषादगान्धारावनुदात्त ऋषभधैवतोौ | स्वरितप्रभवा होते पड्जमध्यमपञज्चमा8 | ।१२। |
गान्धर्वविद्यायां प्रसिद्धा३ सप्त स्वरा उदात्तादिषु त्रिष्वन्तर्भवन्ति | तथा हि स्वरित१ प्रभवों जनको येषां त एते स्वरितप्रभवात्रय8 स्वरा भवन्ति षड्जमध्यमपज्चमनामान१ | निषादणान्धारावुदात्ते, ऋषभधिवतौ चानुदात्ते 5न्तर्भवन्ति। इत्थं च -
उदात्तौ गान्धार8 निषाद8
स्वरिता$ षड्ज8 '>क ल््ले5रअछ् 8 पजञ्चमः के शक 5 कर ्् 9
अनुदात्तौ ऋषभह९ घैव॑ंत३
पाणिनीयशिक्षा / २२
तथा चोदात्तलक्षणम् -
यदा सर्वाक्ञबुसारी श्रवत्नस्तीत #वति तदा गरात्रस्य निग्रहई, कण्ठबिलस्य वाफुत्वं स्वरस्य व गयोस्ती7गतित्वादू रे#्यं #वति; तमुद्ा_त्तमावक्षते/ ( आपिशलशिकसूत्रमू ८.२०)
अथानुदात्तलक्षणम् -
यदा त् मन्द/ अ्यत्नो अकति तदा गात्रस्य रुसने कण्ठबिलस्य महत्व स्वरस्य व वायोमन्दिगतित्वात् /शिग्धता अगति; तमकुदात्तमाषक्षते/ ( तढ़ेत ८.२१)
अथ स्वरित३ - उद्धत्ताबुद्ात्तस्वरसत्रिपातात् स्वारित डति / ( तढेव ८-२२) त्रैस्वर्यविषये प्रातिशाख्यम् -
उदात्तश्वाबुदात्तश्व स्वश्तिश्व स्वरासय# / आयामविश्रम्भाक्षेपेस्त उच्यन्तेडक्षराश्या# // ( ऋग्वेदप्रातिशख्यम 2.9)
उवटो विववार -
आयामो नाम गग्निमित्तमृध्वगमनं गात्रणामू, तेन य उच्चते सउद्ातत,, आ ये/ 497४) नामाधोगमर्नं ग्रत्राणां गक़निमित्तम् (तेन व उच्यते सोउबुद्ात्त/2 न नौ / आक्षेप्रो नाम (ियश्गिमन ग्रात्र्णो गद्निमित्तम् (तेन य उच्चते स॒ स्वरित:) कर्च न्यक/ / #ष्य॑ तत्रेव)
नाट्यशास्रे कम्पितेन सह चत्वार४ स्वरा उक्ता३ -
उद्ात्तश्वाबुदात्तश्व स्वरित/ कम्पितस्तदया/
वण्णाश्चित्तार एव स्थ्रु/ पाठ्ययोगे तप्रोधना# / / ( नाट्यशरूम् 979.9०८)
उच्चवा;, नीचता;, मध्यमता; उन्चनीच्रेशयडोलालम्बनमिति वत्वार/ स्वरक्षमा / ( अभिनवभारती )
तत्र कम्पस्वरमुपरिष्टाद् वक्ष्यति शिक्षाकार इति | ।१२। ।
पाणिनीयशिक्षा / २३
गान्धर्वविद्या में प्रसिद्ध सात स्वरों का उदात्त, अनुदात्त और स्वरित - इन तीनों में अन्तर्भाव हो जाता है। षडूज, मध्यम और पज्चम - इन तीन स्वरों का जन्म स्वरित से होता है। निषाद और गान्धार का उदात्त में तथा ऋषभ एवं घैवत का अबुदात्त में अन्तर्भाव हो जाता है। इस प्रकार ---
दो उदात्त गान्धार निषाद तीन स्वरित षड्ज रा इरलक न खली. दो अनुदात्त 78. मा 4 द घैवेंत
आपिशलकिक्षासूत्र (.२०-२२) में इन तीनों (उदात्तादि ) के लक्षण इस प्रकार दिए णये हैं -
(9) उदात्त - जब सवज्ञिनुसारी तीव्र प्रयत्न हो, शरीर का निग्रह हो, कण्ठ-विवर थोड़ा खुले और वायु की तीव्र गति के कारण स्वर की रूक्षता हो, तो उदात्त स्वर होता है।
( २ ) अनुदात्त - जब मन्द प्रयत्न हो, शरीर का स्रंसन ( शैथिल्य ) हो, कण्ठ-विवर अधिक खुले और वायु की मन्द गति के कारण स्वर की स़तरिग्धता हो, तब अनुदात्त स्वर कहा णया है।
( ३ ) स्वरित - उदात्त और अबुदात्त ख्वरों के सन्रिपात (मेल ) से स्वरित स्वर होता है।
त्रैस्वर्य के विषय में ऋग्वेदप्रातिशाख्य (३.१) का कथन है कि उदात्त, अनुदात्त और स्वरित - ये तीन स्वर आयाम, विश्रम्भ तथा आक्षेप से अक्षरों के आश्रय कहे जाते हैं।
उवट ने इस पर अपने भाष्य में स्पष्ट किया है कि वायु के कारण होने वाला अड़़ें का ऊर्ध्वस्पन्दन आयाम है। उस से उच्चरित होने वाला उदात्त है - आ ये। वायु के कारण होने वाला अड्ें का अधोगमन विश्रम्भ है। उस से उच्चरित होने वाला अनुदात्त है - न४ नौ। वायु के कारण होने वाला अड्जें का तिर्यक् गमन आक्षेप है। उस से उच्चरित होने वाला स्वरित है - क्व॑ नये |
नाट्यशासत्र (१७ .१०८) में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित के साथ कम्पित को मिला कर चार स्वर कहे गये हैं। अभिनवभारती में इनका स्वरूप क्रमश$ उच्चता, नीचता, मध्यमता और उच्च - नीच - उभयालम्बनता बताया गया है।
कम्प स्वर के विषय में पाणिनीयशिक्षा में आगे कहा जाएगा | |१२। |
अष्टो स्थानानि वर्णानामुर8 कण्ठ३ शिरस्तथा | जिह्नामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठी च तालु च । ।9३। |
आपिशलशिक्षासूत्रमपि (६२४) तयैवामनति। अत्र स्थान- _करणयोर्विवेक8 कार्य४। तथा ह्युक्तम् -
पाणिनीयशिक्षा / २४
यत्र स्थाने वर्णा उपलम्यन्ते तत् स्थानम्/ बेन /निवल्यन्ति तत् करणम्/ ( आपिशलशिक्षासत्रे ७.2-८ जिल्लमूलेन जिह्ययानामृ/ /जिल्लामध्येन_ तालव्यानामृ् / जिल्लेपाग्रेण. कूधचन्यानाम् / जिह्लाग्राध/ करण गा। जिह्लाग्रेष दन्त्यानाम् / शेषा# स्वस्कथानकरणा: / ( पणिनीयशि#सत्राणि २.३-८)
अनुस्वारस्य दन्तमूलं करणम् | तथा वक्ष्यति दनन््तमूल्य४ इति। न हि नासिक्यस्य तत् स्थान भवितुमरहीति | ॥१३। |
वर्णों के उच्चारण स्थान आठ हैं - (१)उरस् (२)कण्ठ (३)शिर (४)जिह्ाामूल (५) | दन्त (६)नासिका ( ७)दोनों ओष्ठ और (८)तालु । । आपिशलशिक्षायूत्र (८-२४) भी इन्हीं स्थानों का निर्देश करता है। यहाँ! स्थान ' क और ' करण ' में अन्तर जान लेना चाहिए। आपिशलशिक्षासूत्र (७.३-४)के अनुसार जिस स्थान में वर्णों की उपलब्धि होती है, वह स्थान है और जिस के द्वारा वर्ण निर्वर्तित होते हैं, वह करण है। पाणिनीयशिक्षासूत्र (२ ३-८) निर्दिष्ट करते हैं कि जिह्लामूल से जिह्ृव्यों का, जिह्ना के मध्यभाग से तालव्यों का, जिह्ना के उपाग्र से मूर्धन्यों का तथा जिह्ाग्र से दन्त्यों का उच्चारण किया जाना चाहिए। शेष वर्णों का करण वही है, जो उन का स्थान हो । अनुस्वार का करण दन्तमूल है। नासिक्य का स्थान दन्तमूल नहीं हो सकता । |१३। |
ओभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च। जिह्ामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मण8 | ।१४। |
ऊष्मण इति विसर्गस्याष्टविधा गतिर्भवति। नवमी च सा विसर्गण एवेति स्वरूपस्थत्वेन न गण्यते। कास्ता गतय8 2 ( १)ओभावो यथा शिवोडर्च्य ३, ह शिवो वन्द्य/ । (२ )विवृत्ति8 स्वरद्दयस्य सहवर्तिता यथा राम आयाति, कृष्ण एति | (३) शकारो यथा रामश्चिनोति । (४) षकारो यथा धनुष्टडूगर 8 । (५ ) सकारो यथा सनन्तस्तरन्ति। (६) रेफो यथा हरिर्गच्छति | ।
(७) जिह्वामूलीयो यथा राम *%करोति। (८) उपध्मानीयो यथा वृक्ष ४ फलतीति | ।१४। | है! ऊष्मा (विसर्ग) की गति आठ प्रकार की होती है। उस की नौवीं गति विसर्ग (: ) ही *्>
है, जो उस की स्वरूपस्थिति होने के कारण गिनी नहीं जाती। वे आठ गतियाँ हैं- (१)
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दरार पाणिनीयशिक्षा / २५ ओभाव। यथा - शिवोछर्च्य३, शिवो वन्द्य३। (२) विवृत्ति 5 दो स्वरों के बीच विसर्ग आने पर उस का लोप। यथा - राम आयाति, कृष्ण एति। (३) शथ॒ हो जाना। यथा - रामश्विनोति। (४)' ष ' हो जाना।- यथा - धबुष्टडूर8। (५) स॑ हो जाना। यथा -
सनन््तस्लरन्ति। (६) र हो जाना। यथा - हरिर्गच्छति | (७) जिह्लामूलीय हो जाना। यथा - राम ;४करोति। (८)उपध्मानीय हो जाना। यथा - वृक्ष & फलति | ।9४। |
ननु गड्लोदकमित्यादिषु विसर्णप्रसड्ूं विनापि सन्धौ सत्योभावो दृश्यते | कं ज्ञायेत यदयमोकारो विसर्गस्येति? तदाह -
यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि ' गड्जेदकम् ' आदि प्रयोगों में विसर्ण का प्रसड्ड न होने पर भी सब्धि की दशा में ओभाव दिखाई देता है। यह कैसे जाना जायगा कि यह ओकार विसर्ग का हैं ? अत$ कहते हैं -
यद्योभावप्रसन्धानमुकारादि पर पदम्। स्वरान्तं तादूशं विद्याद् यदन्यद् व्यक्तमूष्मण8 | |9५ | |
यत्र पदे परं॑ पदमुकारादि भवेत् तत्र यदि ओभावप्रसन्धानं स्यादोकारात्मकसन्धिपरिज्ञानं भवेत् तदा तादृशमोकारं स्वरान्तं स्वरस्थानीयं स्वरान्तपदेन सहैकादेशजन्यं विद्यात् । ततो यदन्यदोभावप्रसन्धानं स्यात् तद्व्यक्तं स्पष्टमेवोष्मण ओभावं विद्यादिति | 9५। |
जहाँ पद में बाद वाला (उत्तरवर्ती ) पद उकारादि हो वहाँ ओकारात्मक सन्धि जानना चाहिए। वहाँ ओकार स्वर के अन्त में, स्वर के स्थान पर, स्वरान्त पद के साथ एकादेश से जन्म लेने वाला समझना चाहिए। इस से भिन्न स्थिति में जो ओभाव-सन्धि है वह स्पष्ट ही विसर्ग का ओभाव है । ।9५। |
(४ ) हकारं पज्चमैर्युक्तमन्त8स्थाभिश्च संयुतम् | उरस्यं त॑ं विजानीयात् कण्ठ्यमाहुरसंयुतम् | |१६। ।
ननु व्यवहारे कण्ठादारभ्यैव स्थानव्यवस्थानं लभ्यते। कथमुरो निवेश्य स्थानानामष्टकं परिगणितम् ? सूत्रमेकदेशीयमतेनैवाम्नातम् -
पाणिनीयशिक्षा / २६
ल्विसजनीयावुरस्कावेकेपाम / (आपिशलाशिछासूतम 9.2)
इत्यत्रापि नैकमत्यम्। एतन्मनसि निधाय विविनक्ति - हकारमिति | संयुक्ताक्षरेषु सर्वत्र हकारस्य पूर्ववर्तितिव संस्कृते समुपलभ्यते -- णनमा '+रलवाश्च तत्र तत्र परघटका एव - हू, ह, हा, हा, ह, हर, हर इति। इत्थं च संयुक्तासंयुक्तत्वेन द्वैधं हकारस्य | असंयुक्तो5सौ कण्ठ्य एव संयुक्तश्चोरस्य एवेति विवेक# पाणिनीयानाम् | पञ्चमैर्णनमैरन्तस्थाभिर्यरलबैश्च संयुतं हकारमुरस्यं विजानीयात् , असंयुतं च तं कण्ठ्यं विजानीयादित्यन्धितार्थ: | तत्र पूर्वाह्न - चिह्न - ब्रह्म - बाह्य - हृद - ह्वाद- प्रह्न- प्रभतिषु हकारस्योर३ - स्थानम् , अन्यत्र विहारादिशब्दस्वरूपेषु कण्ठं स्थानमिति तत्त्वम् | ।१६। ।
प्रश्न उठता है कि व्यवहार में तो कण्ठ से आरम्भ हो कर स्थानों की व्यवस्था मिलती है। तब उरस् से आरम्भ कर आठ स्थानों की गणना क्यों की गयी है ?
आपिशलकशिक्षासूत्र (१.३) में एकदेशीय मत का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि - कुछ लोगों के मत में हकार और विसर्जनीय उरस्य हैं।
यहाँ भी ऐकमत्य नहीं है। इसीलिए हकार की स्थिति स्पष्ट की गयी है। संस्कृत में संयुक्ताक्षरों में हकार की सर्वत्र पूर्ववर्तिता मिलती है। ण, न, म, य, र, ल, व, संयुक्ताक्षरों में परवर्ती घटक होते हैं- हल, ह, है, हा, है, हर, है] इस प्रकार हकार के दो भेद हो जाते हैं - संयुक्त और असंयुक्त। पाणिनीय छात्रों के अनुसार असंयुक्त हकार कण्ठ्य तथा संयुक्त हकार उरस्य है। वर्गों के पञज्चम वर्णों (ण, न, म) और अन्तःस्थों (य, र, ल, व) से युक्त हकार को उरस्य जानना चाहिए और असंयुक्त को कण्ठ्य। निष्कर्ष यह है कि पूर्वाह्न, चिह्न, श्रह्म, बाह्य, हद, ह्वाद, प्रह् आदि में हकार का उर$सथान तथा इस से भिन्न विहार आदि शब्दस्वरुपों में कण्ठ-स्थान है | |१६। |
कण्द्यावहाविचुयशास्तालव्या ओषछ्ठजावुपू। े
स्युर्मूर्धन्या ऋट्ठर॒षा दन्त्या लुतुलसाः स्मृता; | |१७। |
जिह्नामूले तु कु: प्रोक्तो दन्तोष्ठयो व स्मृतो बुघे३। ए ऐ तु कण्ठतालव्यावो औ कण्ठोष्ठजौ स्मृती | 9८। |
अकार& असंयुक्तो हकारश्चेति कण्ठ्यौ वर्णो। इकारश्चवर्गो यकारः शकारश्चेति तालुस्थानीयाघ। उकार$ पवर्गश्चेति ओष्5ठस्थानजन्यौ |
पाणिनीयशिक्षा / २७
ऋकारष्टवर्गो रेफ॥ षकारश्च मूर्धन्या;। लृकारस्तवर्गों लकार४ सकारश्च दन्तोदूभवा8 | कवर्णो जिह्नामूलस्थाने निष्पद्यते। वकारो दन्तोष्ठज8 | एकारैकारै कण्ठतालव्यौ। ओकारौकारी कण्ठोष्ठजाविति |
( क) जिह्नामूलीयोपध्मानीययोरत्र स्थाननिर्देशो न कृत: ' ४क $#पौ चापि पराश्रितौ ' इत्युक्तदिशा तयो8 क्रमेण जिह्नामूलमोष्ठी च स्थाने भवत३8 | कखयो४8 प्राग् जिह्लामूलीयस्य प्रयोग४ , कखौ च जिह्वामूलोदूभवी | पफयो8$ प्रागुपध्मानीय8 प्रयुज्यत इति ओछ्ठजत्वं तस्य स्पष्टम् |
(ख ) कवर्गस्येह जिह्बामूलं स्थानमुपदिष्टम्। अत्र प्रातिशाख्यम् -
ऋकारल्कारावय व ऊष्मा जिल्लामूलीया। श्रधमश्व वग#/ ( ऋग्वेदफ्रातिशाख्यम् 9.69)
इह षष्ठ ऊष्मा विसर्ग३। प्रथमो वर्ग४ कवर्ग४। अनयोक्ऋरकारलूकारयोश्च जिह्बामूलं स्थानमुपदिश्यते। शिक्षायूत्रमन्ययैव ब्रूते -
अक्रलविसजनीया। कण्ठया/ / ढविसनजनीयावुरस्यावेकेफम्/ /जिल्लामूलीय) /जिहव्य/ / कवगाविषबिस्वारनिह्ञामूलीया /जिह॒व्या एकेणमु/ ( फ्र्णिनीयशिकासूताणि 9.२-६)
अथापि नाद्यशाखत्रम् -
अकुहाविसजनीया।/ कण्ठ्या// उच्चयशास्तालव्या/ / ऋद्ुरण मूर्धन्धा/ / लूब॒ुलसा दन्त्या। / उप्रपध्मानीया ओडया# / ---- - विसजनीय ओरस्य उइत्येके/ ( नाट्यशारूम् 7 79)
इत्थं वैमत्ये सति कवर्गस्योभयमपि स्थानम्। कण्ठजिह्वामूलयो8 प्राय एकत्र स्थिते? | जिह्नामूलीयस्य तु जिह्नामूलमेव स्थानम् । तस्य पराश्रितत्वेन ककारस्थानतुल्यतेति | ।१७-१८। |
अकार तथा असंयुक्त हकार कण्ठ्य वर्ण हैं। इकार, चवर्ग (च, छ, ज, झ, ज) , यकार
और शकार तालुस्थानीय हैं। उकार और पवर्ण (प, फ, ब, भ, म ) ओष्ठ -स्थान से जन्म
लेते हैं। ऋकार, टवर्ण (ठट, ठ, ड, ढ, ण)रेफ (रकार ) और षकार मूर्धन्य हैं। लुकार, तवर्ण
(त, थ, द, ध, न) ज़कार और सकार दन्त्य हैं। कवर्ग (क, ख, ग, घ, ड')जिह्लामूल - स्थान
से निष्पन्न होता है। वकार दन्तोष्ठ से जन्म लेता है। एकार और ऐकार कण्ठ-तालव्य हैं। ओकार एवम् औकार कण्ठोष्ठज हैं। रह
(क ) यहाँ जिह्ाामूलीय और उपध्मानीय का स्थाननिर्देश नहीं किया गया है |#क तथा
५प पराश्रित हैं इस आधार पर इन का स्थान क्रमश जिह्लामूल एवं ओष्ठ है। क, ख के पूर्व
जल कक. अ्ख्यद्धहहर २ब०- "7-7
पाणिनीयशिक्षा / २८
जिह्लामूलीय का प्रयोग होता है और क, ख जिह्नामूल से उत्पन्न हैं। प, फ के पहले उपध्मानीय का प्रयोग होने से उस का ओष्ठज होना स्पष्ट है।
(ख ) यहाँ कवर्ण का स्थान जिह्लामूल बताया गया है। ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१.४१) के अनुसार ऋकार, लूकार, विसर्ग तथा प्रथम वर्ग (क, ख, गण, घ, डः) का स्थान जिह्ामूल है। पाणिनीयशिक्षासूत्र ( १.२-५ ) का स्थान-निर्देश भिन्न प्रकार का है। तदनुसार - ' आ, | कवर्ण और विसर्ण कण्द्य हैं। कुछ आचार्यों के मत में ह और विसर्ण उरस्य हैं। जिह्लामूलीय ॒ | का उच्चारण - स्थान जिह्ना है। कुछ आचार्यों के मतानुसार कवर्ण, अनुस्वार और जिह्बामूलीय | का उच्चारण जिह्ढा से होता है। '
द नाद्यशास्र (१४.११) में कहा गया है कि' अ, कवर्ग, ह और विसर्ण कण्ठ्य हैं। इ, चवर्ग, य तथा श तालब्य हैं। ऋ, टवर्ग, र और ष मूर्धन्य हैं। लू, तवर्ग, ल तथा स दन्त्य हैं। उ, पवर्ग और उपध्मानीय ओष्ठय हैं। -- -कुछ आचार्यों का मत है कि विसर्ग औरस्य (उरस् से उत्पन्न ) है। ' इस मतभेद के होने पर भी कवर्ण का स्थान दोनों में है। इस का कारण यह है कि कण्ठ द और जिह्बामूल की स्थिति प्राय& पास-पास ही है। जिह्लामूलीय का स्थान जिह्बामूल ही है। |
चूँकि वह पराश्रित होता है, इसीलिए उस का स्थान ककार के स्थान के तुल्य हो जाता है /+49*-926|] |
अर्धमात्रा तु कण्द्यस्य एकारैकारयोर्भवेत् । .। ओकारीकारयोर्मात्रा त्योर्विवृतसंवृतम् | १६। । द संबृतं मात्रिक ज्ञेयं विवृतं तु द्विमात्रिकम्।
द अन्रेकारोकारयोरैकारौकारयोरिति योजना | इमे चत्वारो वर्णा$ द द सन्ध्यक्षराणीति तेषु प्रथमार्धमात्रा कण्ठयस्य मात्रा वा कण्ठ्यस्य भवति। द परा च सार्धमात्रा मात्रा वा तालव्योष्ठययोरिति विवेक१। परार्धप्राधान्यमादाय कण्ठ्यतालव्ययो 8 कण्द्ययोश्च सह निर्देश ४ कृत इति बोध्यम् | तत्र कण्ठयस्य द (अकारस्य ) अर्धमात्रा ए -ओ इत्यनयो 8, शेषा सार्धमात्रा इ-उ इत्यनयो 8 | ऐ-औ इत्यत्र तु कण्ठयस्य मात्रिका इ-उ इत्यनयोश्च मात्रेति। तत्रापि क् ए-ओ -घटकीभूतयोरकारयो१ संबृताकारस्यार्धमात्रा, ऐ- औ इत्यत्र तु ट विवृतस्याकारस्य ( दीर्घस्यार्धभूता ) मात्रा भवति। मात्रिकमकारस्वरूपं संबृत॑ क् द्विमात्रिकं च॑ विवृतम्। तथा च ऐ- औइत्यत्र विवृतम्, ए-ओ इत्यत्र च संवृत॑ द भवति। अत्न विषये प्रातिशाख्यम् - सन्व्येष्ठक्रो54्षीनिक्रार उत्तर अनरुकर गति छकटदायन// /(ऋग्वेदफ्रातिशास्यमू 9३ ३६)
जयापहरककापन्र: " >्असकानथ--पप्मम- है 9 जा जम न्का कुल | विद एन: ७स्कार<ड ०
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पाणिनीयशिक्षा / २६
ए ऐ ओ औ इति सन्ध्यक्षरक्रम8 प्रातिशाख्ये। तत्र ए-ओ विषमौ किन्तु ऐ - औ युजौ--समौ | तत्राह उवट8 -
सन्व्येष्र सन्ध्यक्षरेप्र सत्सु अकार/ प्रृवमर्ध भवगति, इकार/ परमर्ध श्रगमत्तीययोभविति / थ्ुनणो? -- ब्वितीयचदुवयोरुकार उत्तरमर्ध भवति / ... आ+ड5ए / अ#उल्"-आओ।/ अ+इन्नचचे। ३++ऊः-ओ/। (तत्रैव भाष्यम्)
उवटस्य स्थापना सन्दर्भस्मिन् संशोधनमपेक्षते | शिक्षासन्दृब्धाक्षरमनुसृत्य विचारे कृते' अ' इति संबृत8, तस्यार्धमात्रा ए-ओं' इत्यनयो 8 स्यात्, परिशेषात् सार्धमात्रा ' इ-उ' इत्यनयो8 | 'ऐ-औ इत्यत्र तु 'आ' इति विवृतस्यार्धीकृतस्यैका मात्रा, परा चैका' इ-उ इत्यनयो8 | इत्थं च 'अ ८+ इ ११४७ ए',' अ /+उ ११८5ओ',' आ /१+इन्ऐ',' आ /+उच्औं' इति घटते। इदमेव महाभाष्ये (पाणिनीयसूत्र १.१.४७७, ८.२.१०६) प्रतिपादितम्। अत एव च ' एचो5यवायाव३ ' इति यूत्रेण . ए ओ ' स्थाने संवृत्रघटितौ ' अयू - अव्' आदेशौ विधीयेते, 'ऐ औ' इत्यनयोस्तु विवृतघटितौ ' आयू्-आव् इति। तत्र स्थानप्रयत्नकृतसादृशमादायादेशव्यवस्था। अत एव च 'ऐ- औ' इत्यनयोर्विवृततमत्वं वक्ष्यति। । १६ /३। ।
एकार, ओकार, ऐकार तथा औकार - ये चार वर्ण सब्ध्यक्षर हैं, अत४ इन में पहली आधी मात्रा या एकमात्रा कण्ठय की होती है । परवर्ती डेढ़ मात्रा या एक मात्रा तालव्य और ओषछ्ठय की होती है। परार्ध की प्रधानता का ग्रहण कर कण्ठ-तालव्यों (ए-ऐ) तथा कण्दोष्ट्यों (ओ-औ)का साथ निर्देश किया गया है यह जानना चाहिए। ए-ओ में कण्ठ्य अकार की आधी मात्रा और इ-उ की डेढ़ मात्रा है। ऐ-औ में कण्ठय अकार की एक मात्रा और इ-उ की एक मात्रा है। ए-ओ का घटक जो अकार है वह संवृत है इसलिए उस की आधी मात्रा है। ऐ-औ के घटक विवृत अकार की एक मात्रा है जो दीर्घ की आधी है।
अकार का एक मात्रा वाला स्वरूप संवृत और दो मात्राओं वाला स्वरूप विवृत कहा जाता है। ऐ-औ में विवृत अकार तथा ए-ओ में संवृत अकार है।
ऋणग्वेदंप्रातिशाख्य (१३.३६) में सब्ध्यक्षरों का क्रम-ए ऐ ओ औ- है। इन में ए ओ विषम किन्तु ऐ औ सम हैं। इस पर अपने भाष्य में उवट ने कहा है कि सन्ध्यक्षरों में अकार पूर्ववर्ती आधा भाग है। परवर्ती आधा भाग इकार है जो पहले और तीसरे (ए ऐ) में होता है। दूसरे और चौथे (ओ औ) में उत्तरवर्ती आधा भाग उकार होता है। अ+इ--ए। अ+उच्- ओ। अ+ईनऐ। अ+ऊ”"औ।
पाणिनीयशिक्षा / ३०
इस सन्दर्भ में उदट की स्थापना संशोधन की अपेक्षा रखती है। पाणिनीयशिक्षा में बताये अक्षरों के अनुसार विचार करने पर' अ' संवृत है, उस की आधी मात्रा ए-ओ में होगी और शेष डेढ़ मात्रा इ-उ की । ऐ- औ में' आ' इस दो मात्राओं वाले विवृत अकार को आधा करने पर एक मात्रा, तथा परवर्ती एक मात्रा इ-उ की होगी। इस प्रकार - अ ५६ +इ १ १८ नए, अ /१+ उ १५५८७ ओ, आ %६+ईजऐ, आ १६+उ--औ-यह सिद्ध होता है। महाभाष्य (पाणिनीयसूत्र १.१ .४७, ८.२ .१०६ )में भी यही प्रतिपादित किया गया है। इसीलिए ' एचो5यवायाव8 ' इस सूत्र के द्वारा ए-ओ के स्थान में संवृत-घटित अयू- अबू आदेशों तथा ऐ-औ के स्थान में विवृत-घटित आयू-आव् आदेशों का विधान किया गया है। यह आदेश - व्यवस्था स्थान और प्रयत्नकृत सादृश्य को आधार बना कर दी गयी है। इसीलिए ' ऐ-औ' इन का विवृततमत्व कहा जाएगा । ।१६ १८ । |
घोषा वा संबृता8 सर्वे अघोषा विवृता: स्मृता8 | | २०। ।
अत्र बाह्ययत्नयो8 प्रसड्जेन निर्देशश कृत४। तथा हि घोषा वर्णा हश्- प्रत्याहारभाजो नादवन्त४ सन््त$ संवृताः संवारप्रयत्नका ;
तेषामुच्चारणकाले गलास्यविवरस्य सड्नेच$ क्रियते येन नादविशेषो जन्यते, ततश्च घोष उत्पद्यते। खर्-प्रत्याहारघटकाः सर्वे वर्णा अघोषाः
अतस्तेषामुच्चारणे गलास्यविवरं विवृतं क्रियते (ते विवारप्रयत्नेनोच्चार्यन्ते )येन श्वासविशेषो जन्यते, ततश्चाघोष इति। अत्न प्रातिशाख्यम् -
रवास्प्रेडब्ोफाफामितरेफं व नाद/ सोष्ग्रोष्म्ा धगेषियां सवासनादों/ / / ऋगवेदप्रातिशाख्यम 99.७- ६)
रवासाबुप्रदाना अध्रोषा४/ ठचतुर्का उमयाकुप्रद्ाना। / अगशिष्ा/ सर्वे नादानुप्रदाना। / ( उक्ट/)
अन्नेदं तत्त्वम्। सोष्माणो घोषिणों वर्गचतुर्थाई, तेषां हकारघटितत्वेन सोष्मत्वात्त! तेषां नादः प्रकृतिश। खछठथफा विसर्गघटितत्वेन श्वासप्रकृृतम४। शषसहानां श्वासरों नादश्चानुप्रदानम्। कचटतपा अपि श्वासानुप्रदाना अघोषाः। गजदडबा नादानुप्रदानाघ। ड्ञजणनमा अपि नादानुप्रदाना एवानुनासिकाश्च | अपि च -
की औ 3 - ।0$0$।झऊखझ _ै:5-- - ७ -- ० / |. .. क आर कै >> ॒“॒य]+ फल कक आह ह जल जल मल पक लीन नीली लकी मलिक कम नीलशीरि मिकीनर रमन शक सीट किलीकि न कीरीलिकि कल शशि शिलिनिर लक शि टिक न कटी शनि की टक्कर सफर सन शीट किट जटिल अमन मिलन शशिकिकि शिटिल जनक शीश टिटि शशि सीन कक नली की शक शिशि विफल सीसी शीट कक
पाणिनीयशिक्षा / ३१
वर्गाणां प्रथमद्वितीया/ शषस-/विसजनीय- /जिल्लामुलोपष्मानीया यों व् श्रथम - द्वितीयों /विद्वतकण्ठा। सवासाबुप्रदाना अपोषाह/ व्गयमानां श्रयमा अल्पप्राणा ड्तरे सर्वे महाप्राणा# / वर्गाणों तृतीयवतुर्था अन्त/स्था ठकाराबुस्वारों गमों व ठृलीयचदुर्थों/ नासिक्याश्व स्रतकण्ठा नादाकुप्रदाना क्ोषवन्तश्व/ वर्गयमारनां हृलीया अन्तस्याश्चाल्यप्राणा ड्तरे सर्वे महाप्राणा// यथा तृतीयास्तका पज्चमाह /
आवबुनासिक्यमेषामधिको ग॒ण/ / ( फण्िनीयशिकासआणि 6. २-७) इति यथास्वमवधेयम् | ।२०। |
यहाँ प्रसडुचश बाह्य यत्नों का निर्देश किया गया है। हश् प्रत्याहार में आने वाले घोष वर्ण उच्चरित होने पर संवृत होते हैं, उन का प्रयत्न संवार हैं। इन वर्णो के उच्चारण - काल में गलास्यविवर का संकोच किया जाता है, जिस से नादविशेष जन्म लेता है और तब घोष उत्पन्न होता है। खर प्रत्याहार के घटक सारे वर्ण अघोष हैं, अत8 उन के उच्चारण में गलास्यविवर को विवृत किया जाता है (उन का प्रयत्न विवार है) | इस से श्वासविशेष का जन्म होता है, तब अघोष का।
ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१३. ४-६) के अनुसार वर्गों के चतुर्थ वर्ण (घ, झ, ढ, ध, भ ) घोषी होने के साथ ही सोष्म भी हैं। इन में हकार का योग होने से ये सोष्म हैं। इन वर्णों की प्रकृति नाद है। ख, छ, ठ, थ, फ विसर्ग से युक्त होने के कारण श्वास प्रकृति वाले हैं। श, ष, स, ह का यत्न नाद है। क, च, ट, त, प भी श्वास अनुप्रदान वाले अघोष हैं। ण, ज, ड, द, ब नाद अनुप्रदान वाले हैं। ड', ज, ण, न, म नादानुप्रदान होने के साथ-साथ अनुनासिक भी हैं।
पाणिनीयशिक्षायूत्र (७. २-७) में स्पष्ट किया गया है -
(१)विवृतकण्ठ - श्वासानुप्रदान- अघोष - वर्गों के प्रथम-द्वितीय, श, ष, 'स, विसर्जनीय, जिह्लामूलीय, उपध्मानीय |
(२)अल्पप्राण - वर्णों के यमों के प्रथम, तृतीय ।
(३) महाप्राण - अन्य सभी।
(४) संवृतकण्ठ- नादानुप्रदान- घोष - वर्णों के तृतीय, चतुर्थ, अन्तश्स्थ, हकार, अनुस्वार, वर्गों के तृतीय- चतुर्थ यम, नासिक्य |
(५) वर्णों के पञज्चम वर्ण तृतीय वर्णो के समान ही हैं, इन में आनुनासिक्य अधिक गुण है । ।२०। |
(५ ) स्वराणामूष्मणां चैव विवृतं करणं स्मृतम् | तेभ्यो5पि विवृतावेडी ताभ्यामैचौ तयेव च | ।२१। |
पाणिनीयशिक्षा / ३२ | अथेह स्वराणामकारादीनामूष्मणां शषसहानां च विवृतमेव करणम्> आभ्यन्तरयत्नरूपमनुप्रदानं स्मृतं शिक्षावेदाडगेन व्यवस्थापितम् | तेभ्यो5पि स्वरोष्मभ्य एडो ' ए-ओ ' इत्यक्षरे विवृती सस्तः। एतौ विवृततरौ, ् सार्धमात्रिकविवृतसत्रियोगात्। ताभ्यामेडभ्यामैचौ ' ऐ-औ ' इति तथयैव विवृती। इमौ विवृततमाविति भाव३, उभयोर्घठकयोर्विवृतत्वात्। एते स्वरा ऊष्माणश्च न स्थानेषु स्पर्शेन जन्यन्त इत्यस्पृष्टा अत एव विवृतमाभ्यन्तरं प्रयतनं भवति। तथा च प्रातिशाख्यम् -
| है
स्वराबुस्वारोष्मणामस्प्ूएं (स्वितमु/ ( ऋग्वेदफ्रातिशाख्यम 92. 99) वत्र वग्स्कानमरश्रित्य जिल्लावनिएते तत् (स्वितमित्युच्यते।( उतट/) ह
इपिद्विद्तकरणा ऊष्माष/ / (विव्वतकरणा वा/विद्वतकरणा# स्वरा# / तेश्य ए >) बविव्वततरों/ त्राभ्यामे औ।/ ताभ्यामाकार/ / सग्रतस्त्वक्रार/ /
अथ शिक्षायूत्रम् - ( फ्णिनीयशिकासऋषणि 2. 4- 9२) क्
ऊष्मणां विवृतत्वमर्धमेवेति अष्टात्रिंशत्तमायां कारिकायां द्र॒ष्टव्यम् | |२१। | द
ने इन का विवृत करण - आशभ्यन्तर यत्न-रूप अनुप्रदान व्यवस्थित किया है। इन स्वरों और ऊष्म वर्णों में से भी एड (ए-ओ ) वर्ण विवृत हैं। तात्पर्य यह कि ए-ओ विवृततर हैं क्योंकि इन में डेढ़ मात्रा वाले विवृत का योग है। एडः से ऐच् (ऐ-औ3) विवृत हैं अर्थात् विवृततम हैं, क्योंकि इन के घटक दोनों वर्ण विवृत हैं। ये स्वर और ऊष्म वर्ण स्थानों के स्पर्श से उच्चारित नहीं होते, अत अस्पृष्ट कहलाते हैं। इसीलिए इन का आशभ्यन्तर प्रयत्न विवृत होता है।
ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१३. ११) तथा उस पर उवट का भाष्य प्रतिपादित करता है कि स्वरों, अनुस्वार और ऊष्म वर्णों का स्थित अस्पृष्ट है। जहाँ जिह्ना वर्णस्थान का आश्रय ले कर ठहरती है, वह स्थित कहा जाता है।
पाणिनीयशिक्षासूत्र (३. ६-१२) के अनुसार ऊष्मों का करण ईषद्विवृत अथवा विवृत है। स्वरों का करण विबृत है। स्वरों में ए, ओ विवृततर हैं। उन से ऐ औ विबृत हैं। आकार इन दोनों से विवृत है। अकार संवृत है। ऊष्म वर्णों का विवृतत्व आधा ही है, यह अड़तीसवीं कारिका में देखा जायणा | |२१। |
द अकारादि स्वरों और ऊष्म वर्णों (श, ष, स, ह) का करण विवृत ही है। शिक्षावेदाडूः द
वि ममन-न+-++-++-++- ०० का ७30
पाणिनीयशिक्षा / ३३
अनुस्वारयमानां च नासिका स्थानमुच्यते | अयोगवाहा विज्ञेया आश्रयस्थानभागिन8 | |।२२। |
युज्यन्त इति योगा8 >वर्णसमाम्नाये पाठयोगं प्राप्रुवन्त४। न योगा अयोगा& - वर्णसमाम्नाये स्वाश्रयं विना पाठयोगमनश्नुवाना8 | वाहयन्ति पाठव्यवहारकार्य शब्दोच्चारणेषु निर्वाहयन्तीति वाहाः। अयोगाश्च ते वाहाश्चेत्ययोगवाहा/ -- अनुस्वार- विसर्ग- जिह्नामूलीयोपध्मानीय - यमा४। अयोगवाहा आश्रयभूतस्य स्वरस्य यत् स्थानं तद् भजन्तलि तच्छीला भवन्तीति आश्रयस्थानभागिनो विज्ञेयाः। अनुस्वारो यमाश्च यद्यपि भवन्त्याश्रयस्थानभागिन# किन्तु तेषां स्थानं नासिका च भवतीत्युच्यते वर्णविदृभि३। इत्थ॑ चैतेषां द्विस्थानकत्वं व्यवस्थितम्। तथा च प्रातिशाख्यम् -
आअनन्तस्वा तमबुस्वारमाहु: /
व्याक्िन/सिक्यमबुनासिक्रें वा/ ( ऋग्वेद्फ्रातिशाख्यमू 92... 24-2७)
अन्ते वर्णाभावरूपविरामे न तिष्ठतीत्यनन्तस्थस्तं तादृशमनुस्वारं शिक्षाविद आहु४। व्याडिराचार्यस्तमनुस्वारं नासिक्यमनुनासिकं वा प्राह। तत्रायं विवेक॥ - न ॒स्वरमनश्रित्यानुस्वारस्तिष्ठत, तथा चाश्रय - स्थानभागित्वेन तस्य मुखनासिकावचनत्वादनुनासिकत्वम्, शुद्धस्या - नुस्वारस्य नासिकामात्रस्थानकत्वेन नासिक्यत्वं॑_ व्यवस्थितमिति | शिक्षायूत्राण्यपि -
अबुस्वारयमा नासिक्या// कण्ठयनासिक्यमबुस्वारमेके / दमग्रश्व कासिक्यजिल्मूलीया एकेफमू/ ( फ्णिनीयशिकासूऋरणि 9, 94- 9८)
ननु इहैकीयमतेनानुस्वारस्य कण्ठ्यनासिक्यत्वमाह, त्रयोविंशकारिकायां पुनर्दन्तमूल्यत्वं वक्ष्यति। कथ्थं स्थानविवेक& स्यादिति चेदुच्यते। कण्ठादेव निःसृतों यदि वायुर्मुखमप्रविश्य नासिकामेवाहन्ति तदानुस्वारस्य निष्पत्तिरिति कण्ठ्यनासिकत्वे का नाम विप्रतिपत्ति8। आश्रयस्थानेन क्वचित् त्रिस्थानकत्वमपि भवेद्, न क्षति३। दन्तमूल्यत्वमग्रेनुपदमेव व्याख्यास्यते | ।२२। |
लक हि | हे ऋच्बग़लहाए अक जताण खा > ७.4 प्र ९ * 3 व ह इक * 2 थक कक - पा छल - याओी-7-+ कि
पाणिनीयशिक्षा / ३४
युज्यन्त इति योगा& - इस व्युत्पत्ति के अनुसार वर्णसमाम्नाय में पाठयोग को प्राप्त करने वाले वर्ण ' योग ' कहे जाते हैं। इस के विपरीत वर्णसमाम्नाय में अपने आश्रय के बिना न पढ़े जा सकने वाले ' अयोग ' कहलाएँगे। ' वाह ' का अर्थ है - शब्दों के उच्चारणों में पाठ- व्यवहार का कार्य करने वाले |
अनुस्वार, विसर्ग, जिह्मामूलीय, उपध्मानीय और यम ' अयोगवाह ' हैं। ये अयोगवाह अपने आश्रयभूत वर्ण का स्थान पा लेते हैं। तात्पर्य यह कि जो स्थान इन के आश्रयभूत वर्ण का हो, वही इन का भी हो जाता है। अनुस्वार और यम यद्यपि आश्रयस्थानभागी हैं, तथापि वर्णवेत्ता आचार्यों ने इन का स्थान नासिका भी बंताया है। इस प्रकार इन के दो स्थान हो जाते हैं। ऋग्वेदप्रातिशख्य (१३. ३६-३७) के अनुसार अनुस्वार वह है जो अनन्तस्थ हो अर्थात् वर्णों के अभाव रूप विराम (वर्णों के अन्त) में न आता हो।
आचार्य व्याडि ने उस अनुस्वार को नासिक्य अथवा अनुनासिक कहा है।
इस विषय में तथ्य यह है कि स्वर का आश्रय लिये बिना अनुस्वार नहीं रह सकता और वह आश्रयस्थानभागी है, इसलिए मुख-नासिका-वचन से युक्त होने के कारण उस का अनुनासिक होना सिद्ध है। शुद्ध अनुस्वार का उच्चारण करने पर उस का स्थान नासिका - मात्र है, अत85 शुद्ध अनुस्वार का नासिक्य होना व्यवस्थित होता है।
पाणिनीयशिक्षायूत्र (१. १६-१८) भी इसी बात को प्रतिपादित करते हैं -
अनुस्वार और यम नासिक्य हैं। कुछ आचार्यों के मतानुसार अनुस्वार कण्ठ- नासिक्य है। कुछ के मत में यम नासिक्य होने के साथ ही जिह्बामूलीय भी हैं।
इस पर प्रश्न आता है कि यहाँ कुछ आचार्यों के मत को आधार बना कर अनुस्वार को कण्ठ - नासिक्य कहा गया है और आगे तेईसवीं कारिका में उस का दन्तमूल्य होना कहा जाएगा। तब स्थानविवेक कैसे हो सकता है ? समाधान यह.है कि यदि कण्ठ से ही निकला वायु मुख में प्रविष्ट हो कर नासिका का स्पर्श करे तब अनुस्वार को कण्ठनासिक्य मानने में क्या विप्रतिपत्ति है ? आश्रयस्थान के कारण कहीं अनुस्वार का त्रिस्थानकत्व भी हो सकता है, इस में कोई हानि नहीं। दन्तमूल्यत्व की व्याख्या आगे की जाएगी | |२२। |
अलाबुवीणानिर्घोषो दन्तमूल्य8 स्वराननु | अनुस्वारस्तु कर्त्तव्यो नित्यं हो8 शषसेषु च । ।२३। |
तुल्किन्तु॥ अन्यत्र यत्र परसवर्णस्य व्यवस्था तत्रोत्तरव्यज्जनस्य सवर्णत्वमप्यनुस्वारस्य भंवेत् किन्तु हकार- रेफ-शकार - षकार - सकारेषु परेषु नित्यमनुस्वार१ कर्त्तव्य॥। न तत्र कश्चन विकल्प इति भाव३8। कथंभूतो5नुस्वारस्तत्रोच्चारणीय४ स्यादित्याह - अलाबुवीणानिर्घोष३ | यथालाबुकानिर्मिता वीणा वाद्यते तादृशो निर्घोषो नादो रणनं वा यस्य
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पाणिनीयशिक्षा / ३५
तथाभूत३। पुन४ कथंभूत४ ? दनन््तमूल्य४-दन्तमूले भव३। अयं चानुस्वार$ सर्वत्र स्वराननु सरतीति आश्रयस्थानभागित्व॑ सूच्यते | दन््तमूल्यत्वेन जिह्नाया दन्तमूले स्पर्श8 स्यादिति नाभिप्रेतं किन्तु सा तत्र स्तिमिता भवति। तयैव च प्रातिशाख्यम् -
स्वराबुस्वारोष्मफामस्प्एं स्वितम / ( ऋग्वेदप्रातिशख्यम 72, 99) यत्र वर्णस्कानमाश्रित्य /जिल्लवतिण्ते तत् स्कितमु/ (उक्ट/)
एवं च विवृतत्वमनुस्वारस्योक्तं भवति नासिक्यत्व॑ चेति। संहति३, संरम्भ१, वंश१, धनूंषि, कंस8 इत्युदाहरणानि | |२३। |
अन्य स्थानों पर जहाँ परसवर्ण की व्यवस्था है, वहाँ अनुस्वार के परवर्ती व्यज्जन का सवर्णत्व हो सकता है किन्तु हकार, रेफ, शकार, षकार और सकार के परे रहते अनुस्वार की नित्यता विहित है। वहाँ कोई विकल्प नहीं है। तब ऐसे स्थान पर अनुस्वार का उच्चारण किस प्रकार का होगा ? अत४ कहा गया कि - अलाबु (तुमड़ी ) से निर्मित वीणा के स्वर के समान, दन्तमूल से उत्पन्न होने वाले अनुस्वार का उच्चारण किया जाना चाहिए। यह अनुस्वार सर्वत्र स्व॒रों का अनुसरण करता है अत8 उस का आश्रयस्थानभागी होना सूचित होता है। दन््तमूल्य होने का आशय यह नहीं है कि जिह्ला का दन्तमूल से स्पर्श हो, अपितु यह है कि जिह्ना वहाँ ( दन्तमूल में ) निश्चल हो जाती है। ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (१३. ११) में भी यही कहा जया है।
इस प्रकार अनुस्वार का विवृतत्व और नासिक्यत्व है। संहति8, संरम्भ8, वंश8, धनूंषि, कंस8, आदि उदाहरण हैं। ।।२३। |
अनुस्वारे विवृत्त्यां तु विरामे चाक्षरद्दये | द्विरोष्ठयौ तु विगृल्लीयाद् य्रौकारवकारयो8 | |२४। |
अन्रेदमवधेयम्। ओष्ठयाविति स्वार्थ यप्रत्यय8। ओषछ्ठावित्यर्थ; | ओऐछ्छौ द्वि४्नद्विवारं वियृह्लीयादुःविभजेत् । किंवा ओष्ठ भवी तदवयवावित्यर्थ१8 | तौ च द्विर्विभज्य समुच्चारयेदित्याशय8| कदा? स्थितिविशेषेषु स्वरोच्चारणकाले | केषु स्थितिविशेषेषु ?
(१)यत्र औ ' इत्युचार्यते वकारों वा तत्र तथा विगृह्नन्त्येव,
विनीष्ठयोद्धिर्विभाजनेन तयोरुच्चारणं साधु न स्यादिति। तयैवानुस्वारादिषु परेषु स्वराणामुच्चारणे द्विरोछ्छी विजुल्लीयात् |
ज्वकासए न के इ । ाााक्क <« ४ के + म के ४७ ७य७-दुक ं लक तकन पु
पाणिनीयशिक्षा / ३६
(२) अंह४, सिंह8, हंस8 इत्यादावनुस्वारे परत8 पूर्वस्वरस्य तथ्रोच्चारणं
: कार्य यथौष्ठो द्विः पृथक्वती भवेयु३ |
(३) विवृत्त्यामिति स्वरद्बवस्य सहावस्थितोौ। सा च विवृत्तिश्चतुर्धा नारदेन गीता -
विव्वत्तमश्वतर वे विज्ञेया गति मे मतैमृ/ अक्षराणां नियोगेन तासों नामानि मे एपु/ / हढस्वगादिवत्सावुसता वत्सावबुसारिणी चाग्रे/
पाकवत्युअयोहस्वा दीघ9तचा पिप्रीलिका/ / ( नारदीयाशि#7)
वत्सानुसूता नाम विवृत्तिईस्वादिर्भवाति। यथा राम आगच्छति। हस्वोत्तरा विवृत्तिवत्सानुसारिणी नाम। यथा देवा इह। उभयत्र स्वरौ हस्वी चेत् तदा पाकवती नाम विवृत्ति३। यथा देव इह। उभयत्र दीर्घो चेत् पिपीलिका नाम विवृत्तिस्। यथा देवा आयान्तु। एवंविधासु स्थितिषु द्विरोष्ठी वियृहढ्लीयाद् येन स्वरयोः स्पष्टमुच्चारणं श्रवणं च भवेत् |
(४) विरामे खल्चपि द्विरोछौ विजृहीतव्यौ येन पदान्तवर्तिनों वर्णस्य साधूचारणं श्रवर्ण च स्यात् |
(५) अक्षरद्वयये 5 संयुक्ताक्षरे परे पूर्वस्वरस्योच्चारणप्रसड्णे तथा विगृह्लीयादेति | । २४। ।
' ओष्ठयौ ' पद में स्वार्थिक ' य ' प्रत्यय है, अत8 ' ओष्ठयौ ' का अर्थ ' ओष्ठो ' है। कुछ विशिष्ट स्थितियों में स्वर का उच्चारण करते समय दोनों ओष्ठों को अलगं - अलग रखना चाहिए वे स्थितियाँ कौन-सी हैं?
(१) जहाँ ' औ' अथवा ' व' का उच्चारण करना हो, वहाँ दोनों ओठों को पृथक् करना
आवश्यक है, अन्यथा इन वर्णों का ठीक उच्चारण नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार अनुस्वार आदि
- के परे रहते स्वरों का उच्चारण करते समय भी दोनों ओठों को अलग रखना चाहिए ।
(२ )अंह४, सिंह४8, हंस8 इत्यादि शब्दों में अनुस्वार के परे रहते पूर्ववर्ती स्वर का इस प्रकार उच्चारण किया जाय, जिस से कि ओठ अलग रहें।
(३) दो स्वरों की एक साथ स्थिति ' विवृत्ति ' कहलाती है। विवृत्ति में भी ओठों को पृथक् रखना चाहिए।
नारदीयशिक्षा में यह विवृत्ति चार प्रकार की बतलायी गयी है -
वत्सानुसृता - जिस विवृत्ति में आदि स्वर हस्व हो वह वत्सानुसूृता है। जैसे - राम आगजच्छति।
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पाणिनीयशिक्षा / ३७
वत्सानुसारिणी - जिस विवृत्ति में उत्तरवर्ती स्वर हस्व हो वह वत्सानुसारिणी है। यथा - देवा इह |
पाकवती - जहाँ दोनों ओर हस्व स्वर हो वहाँ पाकवती विवृत्ति होती है। जैसे - देव ड्ह।
पिपीलिका - दोनों ओर दीर्घ स्वर होने पर पिपीलिका नामक विवृत्ति कही जाती है। उदाहरणार्थ - देवा आयान्तु |
इस प्रकार की स्थितियों में दोनों ओठ पृथक् रखना चाहिए जिससे कि दोनों स्वरों का स्पष्ट उच्चारण और श्रवण हो सके।
(४) विराम में भी दोनों ओठ पृथक् रखना चाहिए, जिस से कि पद के अन्त में आने वाले वर्ण का ठीक उच्चारण और श्रवण हो सके |
(५) अक्षरद्वय अर्थात् संयुक्ताक्षर के परे रहते भी पूर्ववर्ती स्वर के उच्चारण -प्रसड्ड में उसी प्रकार ओठ पृथक् रखना चाहिए | |२४। |
व्याप्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्टाभ्यां न च पीडयेत् । भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् | |२५। |
पतनभेदाभ्यां भीता व्याप्री यथा दंष्टाभ्यां पुत्रान् हरेत्ू, न च पीडयेत्, तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेदित्यन्वय 8 ।
व्याप्री (मार्जारी वा) तीक्ष्णाभ्यामपि दंष्टाभ्यां स्वशावकान् हरन्ती तथावहिता भवति यथा शिशो४ पीडा न भवेत्, न च पतेतू, न वा भिद्येत। तयैव वर्णान् प्रयुज्जानो वर्णान् न पीडयेतू, न पातयेत्, न वा भिन्द्यात् वर्णानामस्पष्टतैव पात४, विकृतोच्चारणं च भेद8। ताभ्यां भीतभीतेनोच्चारयित्रा सावधानेन भवितव्यमिति भाव३। पीडन॑ दोष३, स च वक्ष्यते | ।२५। |
जिस प्रकार बाघिन (अथवा बिल्ली ) तीखे दाँतों से पकड़ कर अपने बच्चों को ले जाने में इतनी सावधानी रखती है कि शिशु को कष्ट न हो, न वह गिरे और न ही उसे क्षत लगे, उसी प्रकार वर्णो का प्रयोग (उच्चारण) करते समय उच्चारणकर्ता के लिए भी यह आवश्यक है कि वह न तो वर्णों को पीड़ित करे, न गिराये और न ही तोड़ दे। वर्णों की अस्पष्टता उनका पात है और विकृत उच्चारण ही भेद है। उच्चारणकर्ता को इन पतन और भेद से भयभीत रहते हुए सावधान होना चाहिए। पीडन दोष आगे कहा जाएगा। ।२५। |
(६) यथा सौराष्ट्रिका नारी तक्रेँ इत्यभिभाषते | एवं रडुगञ8 प्रयोक्तव्याः खे अर इव खेदया | |२६॥। ।
ज्न्क्षक्स्ट ः रच्य, व ्मारार्ामताभयशा»क पता #
९ ह।
पाणिनीयशिक्षा / ३८
सौराष्ट्रिका सुराष्ट्रवास्तव्या नारी यथा तक्रमिति वक्तव्ये . तक्रे इत्यभिभाषते, एवं रड्ढा रड्डवर्णा३ प्रयोक्तव्याः स्यु8। तदुदाहरणं च ' खे आर इव खेदया ' इति।|
को5यं रड्ड8 ? तथा हि नारदीयशिक्षायाम् -
नकार४ स्वरसबव्रक्तरबतुयरत्ति विधीयते/ रेफो रड््श्व लोपश्व अबुस्वारो5पि व कववितृ / /
अर्थात् स्वयपूर्वो नकारश्चतुर्धा योगं गच्छति। तत्र नकारस्य रेफो यथा
' अहरहः' इत्यत्र | नकारस्य क्वचिल्लोपो यथा' मति' शब्दे मन्धातोर्नकारस्य
लोप१। क्वचिदनुस्वारो यथा' अमंस्त' इति। चतुर्थ इह रे वेदे प्रयुज्यते यो नाम स्वयुक्तपूर्वस्वरमनुनासिक विधत्ते। यथा लोकाँ अकल्पयन् इत्यत्र र्ड;ः स्वरं रज्जयित्वा रक्त करोति। स॒च द्विधा स्वरपरो व्यज्जनपरश्च
(लोमशशिक्षा ७) | तथा च भगवान् पाणिनि8 -
दीघादिटि समानपादे/ (फाणिनीयाशि#सत्रम ८. ३. 6»
अर्थात् एकपादे दीर्घात् परो नकारो रुत्वमाप्रोति अटि परे | आलोटि नित्यम/ ( फ्राणिनीयशिक्षास्त्रम॒ ८. २.3)
इति पूर्वस्वरस्य नित्यमनुनासिकत्वम्। यथा ' महान्+इन्द्रः/ इत्यस्य वेदे ' महाँ इन्द्रः ' इति प्रयुज्यते। तत्र - रक्तसनो5कुनासिक/ / ( ऋग्वेदप्रातिशख्यम् ? ३4)
इत्यनेन सर्वत्रानुनासिकस्य रक्तसंज्ञा विधीयते। यथा 'मॉस्पचन्या8 (ऋणग्वेदे १.१६२.१३) इत्यत्रापि' आ' इति रक्तो वर्ण:घ। अपि च -
दस्दूँरेको वरॉगमि व/ ( ऋग्वेदप्रातिशाख्यम् 6७9)
इत्यत्र रेफात् पूर्वत्र रक्तः। तत्र रक्तो हस्वश्चेत् तहिं तस्य दीर्घोच्चारणं दोष३8 -
। बाइक | ब्पाईर फ्नकल<८ 8७३०८ + +--2
#म/थारनि कि:
पाणिनीयशिक्षा / ३६
रक्त हसस््वें द्रापयन्त्युयोँ ओक// ( ऋग्वेदप्रातिशाख्यम् 7६१ २१)
रक्त हस्वं दीर्घीकुर्वीन्ति स दोष३। ' उग्र ओक४ ' इति यथा। (ऋःग्वेदे ७.२५.४) अत्र हि अनुनासिक स्वरमेव रक्तसंज्ञगया जगु; | ।२६॥। ।
जिस प्रकार सौराष्ट्र में रहने वाली सत्री ' तक्रम् ' कहे जाने की स्थिति में ' तक्रें ' उच्चारण करती है, उसी प्रकार रड्डवर्णों का प्रयोग किया जाना चाहिए। उस का उदाहरण है - ' खे अराॉ इब खेदया ।'
यह ' रड्डः' क्या है ? नारदीयशिक्षा में कहा गया है -
स्वर के पूर्व में आने वाले नकार की चार स्थितियाँ बनती हैं। (१) नकार का रेफ हो जाता है। जैसे - ' अहरह# ' में अहन् के नकार का। (२) कहीं नकार का लोप हो जाता है। जैसे - ' मति' शब्द में मन् धातु के नकार का लोप हो गया है। ( ३) कहीं नकार का अनुस्वार हो जाता है। जैसे - ' अमंस्त '। (४)नकार की चौथी स्थिति ' रड्ड है। इस का प्रयोग वेद में होता है जो अपने से जुड़े पूर्ववर्ती स्वर को अनुनासिक बना देता है। जैसे - ' लोकाँ अकल्पयन् |' यह ' रड्डः ' स्वर को रज्जित कर रक्त बना देता है। रड्ढ दो प्रकार का होता है - स्वर के बाद आने वाला और व्यज्जन के बाद आने वाला।
भगवान् पाणिनि का सूत्र है - दीर्घादटि समानपादे (पायू ८.३.६)। अर्थात् अट परे रहते एक (समान ) पाद दीर्घ के परवर्ती नकार को रुत्व हो जाता है।
आतोडंटि नित्यम् (पासू ८.३.३)। इस सूत्र के अनुसार पूर्व स्वर का अनुनासिकत्व नित्य है। यथा - ' महान्+इन्द्र8 ' के स्थान पर वेद में ' महाँ इन्द्र ' का प्रयोग किया जाता है।
रक्तसंज्ञो5नुनासिक४ (ऋणग्वेदप्रातिशाख्य १.३६) के अनुसार सर्वत्र अनुनासिक की रक्तसंज्ञा बतायी गयी है। जैसे - ' मॉस्पचन्या8 ' (ऋग्वेद १.१६२ .१३) में भी ' ऑ' रक्त वर्ण है।
दस्यूँरैको बूँरभि च (ऋग्वेदप्रातिशाख्य ४. ७१) | यहाँ रेफ से पूर्व रक्त वर्ण है। यदि रक्त हस्व हो तो उस का दीर्घ उच्चारण दोष है। जैसे - उग्र ओक8' (ऋग्वेद ७.२५ ४) | यहाँ अनुनासिक स्वर को ही रक्तसंज्ञा से कहा गया है | ।२६। ।
रड्ुवर्ण प्रयुञज्जीरन् नो ग्रसेत् पूर्वमक्षरम् | दीर्घस्वरं प्रयुञज्जीयात् पश्च्चाच्नासिक्यमाचरेत् | ।२७। |
रक्तस्वरस्य नासिक्यो भाग एव रइड्ड;४। स चेह दीर्घस्वरात् प्रागेव सन् जुहीत8 यथा चोक्तपूर्वे पाणिनीये सूत्रे | तादृशं रड्डवर्ण प्रयुञजजीरन् > प्रयुज्जानो वक्ता तत्पूर्वमक्षरं स्वररूपं नो ग्रसेत् 5 न ग्रस्तं कुर्यात्, ग्रासदोषं वर्जयेत् | ' देवाँ २ आसादयादिह ' इत्यादौ प्रथम दीर्घस्वरं प्रयुञज्जीयातू, तत्पश्चाच्च
नह.
पाणिनीयशिक्षा / ४०
रइ्डरूपं नासिक्यमाचरेदुच्चारयेत्। स च रछ्जो यथा द्विमात्रिकस्तथा वक्ष्यते
किन्तु पूर्वस्वरात् पृथगेवेयं द्विमात्रिकता। याज्ञवल्क्यशिक्षायामपि (१२८) ईषदन्तरेण पठयते - न
रक्े वेद समुत्पत्रे न ग्राह्टाँ प्वमक्षरम् / स्वरं॑ दीर्ष श्रगृज्जीत पश्चात्रासिक्यमावचरेत्। /
अत्र दीर्घस्वरस्यैवानुनासिकत्वे रह्डत्वव्यवहार8 | |२७। ।
रक्तस्वर का नासिक्य भाग ही रड्ुः है। उसे यहाँ दीर्घ स्वर से पहले ही ग्रहण किया गया है, जैसे कि पूर्वोक्त पाणिनीय सूत्र में। उस प्रकार के रड्डवर्ण का प्रयोग करने वाला वक्ता उस १ रड्डः के पूर्ववर्ती स्वर को ग्रस्त न करे। ' देवॉ२ आसादयादिह ' इत्यादि में पहले दीर्घ स्वर का । प्रयोग करे और तत्पश्चात् रड्डरूप नासिक्य का उच्चारण करे। वह रड्ढ जिस प्रकार द्विमात्रिक हो जाता है यह आगे बताया जाएगा, किन्तु यह द्विमात्रिकता पूर्वस्वर से पृथक् ही होती है। याज्ञवल्क्यशिक्षा (१२८) में भी कुछ भिन्नता से यही बात बतायी गयी है -
रइड के उत्पन्न होने पर पूर्ववर्ती अक्षर का ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। दीर्घ स्वर का प्रयोग करने के अनन्तर नासिक्य का उच्चारण करना चाहिए।
यहाँ दीर्घ स्वर के अनुनासिक उच्चारण को ही रड्ड कहा गया है | |२७। |
हृदये चैकमात्रस्तु अर्धमात्रस्तु मूर्धनि | नासिकायां तथार्ध च रइस्येवं द्विमात्रता | । २८। ।
हृदयात् प्रभृति नासिकामभिव्याप्य समुदच्चार्यमाणस्य रझ्जडस्य द्विमात्रता भवति। सा चैवं यथा हृदये5सावेकमात्र उच्चार्यते, मूर्धनि तु अर्धमात्रस्तथा क् नासिकायां मात्राया अर्धमुच्चार्यत इति। उदाहरणेनानुपदमेव स्पष्टीभविष्यति | | रे८। |
हृदय से ले कर नासिका तक के स्थान को व्याप्त करने वाले रड्ढ की द्विमात्रता होती है। इस रड्डः की एक मात्रा का हृदय - प्रदेश में, आधी मात्रा का मूर्धा में तथा आधी मात्रा का उच्चारण नासिका में होता है। यह तथ्य आगे उदाहरणों द्वारा स्पष्ट हो जाएणा । ।२८। |
हृदयादुत्करे तिष्ठन् कांस्येन समनुस्वरन् | मार्दवं द्विमात्रं च जघन्वाँ उ निदर्शनम् । ।२६।:।
_ .लकब»का “ताप. “पलपताकओआलथ-ल+-+थमानाालाबवसममन् कक स+++++ननन+-+न
पाणिनीयशिक्षा ४१ ५ वाणिमचिशिको कर करन जनक न+न नम नअन__+न_-मननमननमन-नमन मनन सल
हृदयादारभ्योत्करे मूर्धनामन्यूर्ध्वदेशे तिष्ठन् कांस्येन पात्रेण समनुस्वरन् सदृशमनुरणन् रझ्को नासिकाया उच्चार्यते। तत्र मार्दवं॑ सुकुमारत्वं द्विमात्रत्व॑
च रइस्य भवति। ' जघन्वॉर उ' (ऋणग्वेदे १.५२.८) इति निदर्शनमुदाहरणम् | इह ' जघन्वान् ' इत्यस्य ' जघन्वाँ इति रक्ताकारेण वैदिकं रूपम्। एवमेव ' मधुमानस्तु सूर्य४ ' इत्यस्य ' मधुमाँ अस्तु सूर्य8 ' इति द्र॒ष्ट्यम् | २६ । ।
हृदय से आरम्भ हो कर उत्कर अर्थात् मूर्धा नामक ऊर्ध्वदेश में ठहरता हुआ, कॉसे के पात्र के समान अनुरणन करता हुआ रह नासिका द्वारा उच्चारित किया जाता है। वहाँ रह्ड का स्वरूप मृदु, सुकुमार तथा द्विमात्र होता है। ' जघन्वॉर उ (ऋग्वेद, १.५२.८ ) इस का उदाहरण है। यहाँ जघन्वान् का वैदिक रूप रक्ताकार हो कर जघन्वॉ२ ' हो गया है। इसी प्रकार ' मधुमानस्तु सूर्य: ' का रूप ' मधुमॉर अस्तु सूर्य ' द्रष्टव्य है। ।।२६। |
मध्ये तु कम्पयेत् कम्पमुभौ पार्श्वा समौ भवेत् | सर कम्पयेत् कम्पं रथीवेति निदर्शनम् | ।३०। |
स्वरितस्वरं त्रिधा विभज्य मध्ये कम्पं नाम स्वरभक्ति कम्पयेत् कम्पमानमिवोच्चारयेत्, एतदेव कम्पस्य कम्पत्वम्। उभौ पार्श्वो कम्पस्वरस्य
प्राक्पश्चाद्र्तिनी स्ववभागा.. समौ.. निष्कम्पी॑ भवेत् भावयेत [ अन्तर्भावितणिजर्थों भवति३] | [यदि कम्पस्वरो रक्तो भवेत् तदा
] सरडूं कम्पं कम्पयेत्। ' रथीव _ इति निदर्शनम्, यत्रेकार४ स्वरित३$, त॑ त्रिधा विभज्य मध्ये स्वरं कम्पमानमुच्चारयेत्। कम्पविषये प्रातिशाख्यम् -
जात्योडशभिनिलितश्वेव क्षेप्र/ अ्रश्लिए एव व।/ एले स्वारा३ अकम्पन्ते यऋश्चवस्वरितोदया?/ / ( ऋग्वेदग्रातिशाख्यम् ३.३४)
उच्चोदया$85उदात्तपरा? स्वरितोदयाः 'स्वरितपराश्च सन्तश्चत्वार$
स्वारा३८ स्वरा३ प्रकम्पन्ते न कम्पं भजन्ते। के ते चत्वार8 ? जात्य३8, अभिनिषहित,, क्षैप्र, प्रश्लिष्टश्चेति। तथा हि - :
(क) अतो3उन्यत् स्वरित स्वारं नात्यमाचकते पदे/ ( तत्रेव 2.८)
: उदात्तपूर्वात् स्वरितादन्यत् स्वरितं जात्यं वर्दन्ति |
*बदए5 २०० के ड़ कल शा
पाणिनीयशिक्षा / ४२
(खर) अकामिनिल्ित/ सन्पिरेते। प्राक्तवेक्ते।/ एकीअदति फद्ादिरकारस्तेडत् सन्यिजा।/ / (तत्रेर २ ३५७१)
एकारौकारैर्यदा पादादिरकार एकी भवति तदा सन्धिजा१ स्वरिता भवन्ति | है एष सन्धि३ ' अभिनिहित8 ' इत्युच्यते। तत्र क्वचित् प्राकृतावेकारौकारौ, यथा हरे5व विष्णो5व। क्वचिच्च वैकृतौ यत्र कृतेन सन्धिना ' ए-ओ ' निष्यद्येते |
(यथ) समान/#रमनन््तस्वां स्कामकण्ठय स्वरोग्यम्/ न समानाक्षरे स्वे स्ते। ते कैक्रा/ शक्लोदया/ /_ (तत्रेव २२१- २३)
अकारस्वरं विहायेकारादिकमिह समानाक्षरम्। स्वरोदयम् स्वरे परत8। पूर्वपरयो४ समानाक्षरता न स्यात्। अस्यामवस्थायां क्षेप्रा नाम सन्धयो भवन्ति यथा यणसन्धिः |
(4) परदे पद्ान्तादिवदेककर्ण प्रश्लिएमपि / (तत्रेंढ २4)
एक पद पूर्वम् | तत्रैकवर्णतारूप8 सन्धि३ | तत्रापि पदस्यादिवत्त्वमन्तवत्त्वं प्यात्। अस्यामवस्थायां प्रश्लिष्टं पदं निगद्यते। यथा ' आ+इहिरःएहि '। _रथी+इवनरथीव ' इत्यत्रापि प्रश्लेष एव बोध्य8 | |३०। |
स्वरित स्वर को तीन भागों में विभक्त कर मध्य में काँपता हुआ- सा उच्चारित करे। यही कम्प का कम्पत्व है। कम्प स्वर के दोनों पार्श्व अर्थात् पूर्ववर्ती और पश्चादवर्ती स्वरभागण निष्कम्प (सम) होने चाहिएँ। (यदि कम्पस्वर रक्त हो, तो ) रड्डः सहित कम्प को कॉपता हुआ -सा उच्चारित करे। ' रथीव ' इस का उदाहरण है जहाँ इकार स्वरित है। उस इकार को तीन भागों में विभक्त कर मध्य में कॉपते हुए स्वर का उच्चारण करे।
कम्प के विषय में ऋग्वेदप्रातिशाख्य (२.३४) का कथन है कि चार स्वर, उदात्तपर और स्वरितपर हो कर कम्प को प्राप्त करते हैं। वे चार स्वर हैं - जात्य, अभिनिहित, क्षैप्र तथा प्रश्लिष्ट |
(क) जिसके पूर्व में उदात्त हो, उस स्वरित से भिन्न स्वरित' जात्य कहा गया है।
( ख) जब पादादि अकार, एकार और औकार से एकीभूत हो जाय, तब सन्धि से जन्म लेने वाले स्वरित होते हैं। यह सन्धि ' अभिनिहित ' कहलाती है। ये एकार -औकार कहीं प्राकृत होते हैं जैसे - हरे5व, विष्णो5व। कहीं वैकृत होते हैं जहाँ सन्धि करने पर ए-ओ निष्पन्न होते हैं।
पाणिनीयशिक्षा / ४३ (ग) स्वर परे रहते पूर्व -पर स्वरों की समानाक्षरता नहीं होती। यहाँ अकार स्वर को छोड़कर इकारादि समानाक्षर हैं। इस अवस्था में क्षेत्र ' नामक सब्धि होती है। जैसे - यणसब्धि | (घ) जहाँ पूर्व में एक पद हो वहाँ एकवर्णतारूप वाली सब्धि होती है, वहाँ भी पद का आदिवत्त्व अन्तवत्त्व हो जाता है। इस अवस्था में पद प्रश्लिष्ट कहा जाता है। जैसे - आ+इहिज्एहि। रथी+इव-रथीव में भी प्रश्लेष ही जानना चाहिए । ।३०। |
एवं वर्णा$ प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिता३। | सम्यग् वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते | |३१॥। |
यथोक्तरीत्या वर्णा३ प्रयोक्तव्याः। ते चोच्चारणकाले नाव्यक्ता$ स्यु४, तथा सति सम्यकृश्रवणस्यैवाभाव8 प्रसज्यते। न वा ते पीडिता घृष्टा8 स्यु३, तथात्वे वैरस्यापत्ते३। पीडनं चाग्रे वक्ष्यते। इत्थं सम्यग् वर्णानां प्रयोगेण प्रयोक्ता ब्रह्मलोके महीयते पूज्यते। ब्रह्मलोके महीयत इति | कार्यब्रह्मणो लोके पूज्यत इत्यर्थ३ | निर्जुणस्य ब्रह्मणो लोकेन सह तु विरोध इति कार्यब्रह्मणो ग्रहणम् स एव ' ब्रह्मा ' इत्युच्यते। तस्यैव शक्ति$ सरस्वती । यावद् ब्रह्मा$वतिष्ठते तावत्तललोके महीयत इति भाव३। ब्रह्मणो द्विपरार्धावसाने तेनैव सह मुच्यत इति परमार्थ३। क्रममुक्तेरयं पन्था४। सम्यग्वर्णप्रयोग एव शब्दब्रह्मण उपासना | ' शब्दब्रह्मणि निष्णात परं ब्रह्माधिगच्छति' इति श्रुते३ । फलश्रुति8 पुरुषार्थ परमप्रयोजनरूपं व्यनक्ति। याज्ञवल्क्यशिक्षायामप्युक्तम् -
मछुरं कापि नाव्यक्त सुन्यक्त न व प्रीडितमृ / /
इत्थं च सुव्यक्तत्वं पीडनाभावश्च वर्णोच्चारणणुणी | |३१। |
वर्णों का प्रयोग यथोक्त रीति से ही किया जाना चाहिए। वे वर्ण उच्चारणकाल में अव्यक्त न हों, क्योंकि तब उन का श्रवण ही ठीक से न हो सकेगा। न ही वे पीडित हों, क्योंकि तब उन में वैरस्य आ जाएगा। ' पीडन' को आगे स्पष्ट किया जाएगा। इस प्रकार वर्णों के सम्यक् प्रयोग से प्रयोक्ता ब्रह्मलोक में पूजित होता है। ब्रह्मलोक से आशय कार्यत्रह्म के लोक से है। निर्गुण ब्रह्म अर्थ लेने पर लोक की संगति नहीं बनती, अत कार्यत्रह्म का लोक ग्राह्म है। कार्यत्रह्म को ही ' ब्रह्मा ' कहा गया है और उसी की शक्ति का नाम सरस्वती है। तात्पर्य यह है कि वर्ण का सम्यक् प्रयोगकर्ता तब तक ब्रह्मलोक में पूजित होता है जब तक कि एक ब्रह्मा का कार्यकाल रहता है। परमार्थ यह कि ब्रह्मा के दो परार्ध बीत जाने पर वर्णप्रयोक्ता भी ब्रह्मा के साथ ही मुक्त हो जाता है। यही क्रममुक्ति का मार्ग है। वर्णों का सम्यक् प्रयोग ही शब्दब्रह्म
न््बषः . है न्क़ि्- ् बन ह न + आज 3 ' 0. अाकाका॥/ पा नया
उछल:
पाणिनीयशिक्षा / ०७
की उपासना है। श्रुति भी कहती है - शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्त करता है। यह फलबश्रुति परमप्रयोजनरूप पुरुषार्थ (मोक्षप्राप्ति) को अभिव्यक्त करती है। याज्ञवल्क्यशिक्षा में भी कहा गया है कि वर्णों का उच्चारण मधुर और सुंव्यक्त हो, अव्यक्त तथा पीडित न हो। इस प्रकार सुव्यक्त होना तथा पीडन का अभाव वर्णोच्चारण के गुण हैं। । ३१। |
(७) गीती शीघ्री शिर३कम्पी तथा लिखितपाठक॥९ | अनर्थज्ञो5ल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमा8 | ।३२। |
यो गायन् पठति स गीती, यथावत् पाठ्य॑ कर्तुमप्रभवन् गानेन क्षतिं पूरयितुमीहते तादूश३। शीघ्रपाठशील४ शीघ्री, यश्चर्वन्निव वर्णान् पठति त्वरया5नुद्ुत इव। शिर१ कम्पयति तच्छील३ शिर३कम्पी, अथवा शिरस$ कम्प8 शिर१्कम्पो5स्ति यस्य स$, शिरो धुन्चन् पठति। तथा लिखितपाठक१, पठितुं न जानानो5पि लिखितमेव कथज्चित् पठितुं यतते, तावतैव कृतकृत्यम्मन्य8 | अर्थ जानातीति अर्थज्ञ३, नार्थज्ञ इत्यनर्थज्ञ), यो नाम द पठन्नपि नार्थ संक्रामयितुं प्रभवति, अस्थाने विरामं छेद॑ वा करोति। | अल्पकण्ठश्च यस्य वाग्यन्त्रमेव तथा स्वल्पं भवति यथा श्रोतारं क्लिश्नाति कर्णयो३। एते षट् पाठकेषु अधमा भवन्ति। दोषाभावो गुणो भवति, । तदतिरिक्तान् जुणाननुपदं वक्ष्यति माधुयीमित्यादि | |३२। |
जो गाते हुए पढ़ता है वह गीती है। ऐसा व्यक्ति यथावत् पाठ करने में समर्थ न होने द । पर गान से उस क्षति को पूरा करना चाहता है। शीघ्र पाठ करने वाला शीघ्री है, जो जल्दी | में वर्णों को चबाता हुआ-सा पढ़ता है। शिर को हिला कर पाठ करने वाला शिर8कम्पी है। लिखितपाठक वह व्यक्ति है जो पाठ करना न जानने पर भी जो लिखा है, उसी को किसी प्रकार पढ़ने का प्रयत्न कर स्वयं को धन्य मानता है। अर्थ को न जानने वाला अनर्थज्ञ पाठ || करते हुए भी अर्थ की संक्रान्ति नहीं कर पाता या वह अस्थान में विराम या पदच्छेद कर देता | है। अल्पकण्ठ वह है जिस का वाग्यन्त्र ही इतना संकुचित होता है कि उससे निकले हुए वर्ण | सुनने वाले के कानों को कष्ट पहुँचाते हैं। ये छह पाठकों में अधम माने गये हैं। इन दोषों क् का अभाव गुण होता है। अतिरिक्त माधुयादि गुणों को आगे कहा जाएगा | |३२। |
9. यकालिजखितेति प्रठ// आऊपि व् नारदीयमह्यपएराणे - उस्तकप्रत्ययावीत' नाधीते उुरुसनिधों। रानते न समध्ये नारगमेत कामिनी/ / (2 4० २२६)
कक 9.3. कक --3%+%%० नस बज के उन न जन --न-- नया न्र्ण + न्पि कक
पाणिनीयशिक्षा / ४५
माधुर्यमक्षरव्यक्ति३ पदच्छेदस्तु सुस्वर5 | बैर्य लयसमर्थ च षडेते पाठका गुणा४ । | रे३। |
माधुर्य सुश्रवता श्रुतिप्रियता च | अक्षराणां व्यक्ति३ स्पष्टता, या च कर्णसुख एव न लीयेत। पदच्छेद8 पदानां यथार्हयतिरर्थानुसारी विरामश्च, येनार्थस्य विविक्तता स्यात्। सुस्वरो5नुनादसौष्ठवयुक्त ४ शोभन8 कण्ठस्वर१। घैर्य येन त्वरा न प्रतीयेत, येन च वक्तु४ पाठ्ये वस्तुनि स्वाधिकारो ज्ञायेत। लय॒समर्थ च तद् घैर्य स्यात्, चैर्येण लयसामर्थ्य॑ निरूप्यते। द्वुत- मध्य - विलम्बितेषु लयेषु यथायथमधिकार#४ खल्वपेक्ष्यते, तथा च यथापेक्षं लयाल्लयान्तरे गतिर्न
विरुध्येत। इत्येते घट् पाठका४8- पाठकीया गजुणा४ ' | ३३। |
वर्णों का भलीभाँति सुनाई देना और कानों के लिए सुखद होना माधघुर्य है। अक्षरों की
व्यक्ति का अर्थ उन की स्पष्टता है, जो कर्णसुख से पृथक् भी है। तात्पर्य यह कि वर्णों का श्रुतिसुखद होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उन का स्पष्ट श्रवण भी आवश्यक है। पदच्छेद से आशय पदों के उच्चारण में उचित स्थान पर यति और अर्थ के अनुसार विराम से है, जिस से अर्थ स्पष्ट हो सके। सुस्वर वह कण्ठस्वर है जो अबुनाद ( गूँज) के सौष्ठव से सम्पन्न हो।
धैर्य से अभिप्रेत है कि पाठ ऐसा हो, जिस में पाठक की त्वरा प्रतीत न हो और पादूय - वस्तु में वक्ता का अधिकार मालूम हो सके। वह बैर्य लयसमर्थ होना चाहिए। घैर्य से लय - सामर्थ्य निरूपित होता है। द्वुत, मध्य और विलम्बित लयों में अधिकार की अपेक्षा होती है, साथ ही एक लय से दूसरे लय में पहुँच कर उच्चारण करने में गति अवरुद्ध नहीं होना चाहिए। ये छह
पाठक के गुण हैं ।।३३। |
शद्डितं भीतमुदृघुष्टमव्यक्तमनुनासिकम् | काकस्वरं शिरसिगं तथा स्थानविवर्जितम्। | ३४। |
लयसमत्वमिति प्राठ//
पाठके डति साधीयान् पाठ//
मूर्ध्नि गतमिति प्राठन्तरमृ /
शड़ित्तिं भीपर्ण भीवमुद्पुष्टमबुनासिकम् /
काकस्वरं मूर्धगर्त तथा स्थानविवर्जितमृ् / /
विस्वरंविरस बैक विध्लिएं विषमाहतमृ /
व्याकुलें ताललीनज्च गीतिदोषाश्वदुर्दश // ( नारदीयमहाप्राणम् १.4०:8४ - ५५
पी ७ ७ 0
पाणिनीयशिक्षा / ४६
उपांशु दष्टं त्वरितं निरस्तं
विलम्बितं गद्गदितं प्रगीतम् | निष्पीडितं ग्रस्तपदाक्षरं च
वदेनच्न दीनं न तु सानुनास्यम् | ३५। |
पाठस्य विंशतिर्दोषा:। ' न वदेद् ' इत्यस्य प्रत्येकं समन्वय३ | तथा च - (१) शड्ल्तिं न बढेत् - किमिदं शड्वितत्वं नाम ? सन्दिग्धत्वमिति गृहाण। उच्चारयितोच्चारणे शद्धित इव यदा भवति तदोच्चारणमपि शद्डित॑ स्यादिति श्रोतारं शडूगकुलीकरोति, अनेन कथमेवमुच्चारितमिति। यथा -
स्वरों कवन्त्योड्यानिओ सरफ्रो तिरगो मातृरीन् पित॒न् यक्ृमिवृन्/ / ( ऋग्वेदफ्रातिशख्यम् १6३८) ;
_ऋ ऋ इइत्येतौ स्वरौ सरेफौ स्तः। तौ केचिदोष्ठयनिभौ-- उकारसदूशौ कुर्वीन्ति। यथा '/तिमगे गठृरगीज् (पिलृबु ' (ऋ १ १4८७० १०/ इत्युच्चारयितव्ये '/लिस? ग्ग्द््र्रीन् श््त्र्ज् ' इति कुर्वीन्ति। अपि च छभिष्वन्् '( % 4.३५. २) इत्यस्य स्थाने 'क्शिद्वव्् इति पठन्ति। अथ च -
ऐकेरिव्येकारमकारमुवेयश्दोति ऋ्रमयन्तो कक्ारमृ्/ तदेगन्येड्र /विपरीतमाहुस्त रख्या कय्यं व हृढय्यकोति व/ (तत्रेव १6:6१9-७२)
अर्थात् '?ेगे/ ' (#५.२.८) इत्यत्र 'क्वश्वस्थ (ऋ८.२4.११) इत्यत्र च ' ऐ' इत्युच्चारयितव्ये ' अ' ८ दल चारयन्ति - ' अय्ये ', ' वय्यश्वस्य ' इति। तदेव ' अ इत्यक्षरमन्यत्र ऐ इति प्रयुज्जते - _ 'रव्य (ऋ% 9०.9£.७) 'क्य्यम् '((ऋ४.4८.८) ढृद्य्य्या (ऋ 9० 9५०४) इत्यत्र ' रैया, वैयम्, हृंदैयया ' इत्युच्चारयन्ति | एवमन्यदूह्यम् | अशड्वितत्व॑ जुण३ |
(२) भरत न वढ़ेत् - भयाक्रान्तं यथा स्यात् तथा नोच्चारयेत्। एतेन दोषेण सर्वे दोषा; संभवन्तीति। अभीतत्वं खलु गुण३।
पाणिनीयशिक्षा / ४७
मीन किशन कि कक किक ककी कक ककी जल कक जब ३ ......3मललुनु्,॥ह॒ल॒॒ुााइअ नाल
(३) उद्घुषँ न वढ़ेत् - तारस्वरेणानावश्यकेन नोच्चारयेत्। अथवा सघोषव्यज्जनानामुच्चारणे5नुनाद “ उद्घोष॥ स्यादनादश्चाव्यक्तत्वम् | अव्यक्तत्वं वक्ष्यते। तथा च प्रातिशाख्यम् -
घोषवलामबुनाद/ उ्॒रस्तादाविस्थानों क्रियते धारण वा। सोष्मरोष्सणामबुनादोउप्यनादो लोमश्येँ व 4चेननमूष्मणां ठ॒ / / वर्गेप॒ जिह्लाप्रयर्न बद॒र्प/ ( ऋगवेदप्रातिशख्यम् १८ १६-२१)
उवटमनुसृत्य विविच्यते | अनुनादो5$तिरिक्तो ध्वनि8 । धारणमनुपलब्धिः। अनादो3नुच्चारणम्। लोमश्यमसौकुमार्यम् | क्ष्वेकनं नाम वर्णसरूप8 सीत्कारादिध्वनि३ | जिह्नाप्रथनं जिह्नाविस्तार8 | तत्रानुनाद 8 क्षेकनं चेति द्वये खलूद्रिक्तो घोषो भवेच्चेत् तहिं उद्घुष्टमेति। घोषोच्चारणे पदादावतिरिक्तो नाद४ क्रियते, स दोषो यथा - ' द्यावा, द्वादश, श्चोतति, स्तौति ' इत्यादौ केचनाधिकमकारमिकार वोच्चारयन्ति पदादी | अनादो धारणं जिह्ाप्रथनं चेत्येतैरव्यक्तता भवति वर्णस्योच्चारणीयस्य | उताहो लोमश्यरूपं पारुष्यमेवोदृघुष्टम् | (४) अव्यक्तं न बढ़ेत् - अस्पष्ट यथा स्यात् तथा नोच्चारणीयम् | उक्तेनानादेन धारणेन जिह्लाप्रथनेन चाव्यक्तता जायत इव्युक्तम्। तथा चाव्यक्तता दोषो व्यक्तता जुण३8। (4) अबुनासिक न वदेत्- नासिकयोस्त्वबुपक्रेडबुनासिकम् / (ऋगवेदगप्रातिशख्यम् १6- 6) नासिकयोयद्टि वर्णोडबुष्न्यते तदाबुनासिकत्वमुत्पदते/ स दोफरस्त पररिहरेत् /(उक2४) अननुनासिकमनुनासिकीकरणं दोष३। तदभावो गुण इति यावत् | (4) क्राकस्वर॑ न वदेत्- कर्कशं नोच्चारयेत्। लोमश्यं नाम पारुष्यमुक्तमेव। अपि च - अतिस्प्शों बबश्ता व् रेफ़े/ (/ऋग्वेदप्रातिशाख्यम् १६: २६५ बरबश्ताप्यसोक्रमायमेव/ (उठट४/ (७) शिरसिगं न बढ़ेत् - अमूर्धन्यान् मूर्धस्थानेन नोच्चारयेत्। स दोष४ स्यात्। तदभावों गुण४। यथा - इकारस्य स्थान ऋकारमाहु# / (ऋग्वेदप्रातिशख्यम् १८८५५
' निर्णिक् ' इत्युच्चारयितव्य ' ब्रिणिक् ' इति कुर्वीन्ति |
......
पाणिनीयशिक्षा / ७८
(८) स्वानविवर्नितं न वदेत्
- थस्य वर्णस्य य्रदुच्चारणस्थानं तेनैव तमुच्चारयेत्। भाषान्तरप्रभावेन चवर्ण -टवर्ग॑च
दन्तमूलीयमुच्चारययन्ति, श-ष-सानां चायथास्थानमुच्चारणं कुर्वीन्ति। स दोष३। यथास्थानमुच्चारणं | जुण इति। द द (4)2उपाश न वकढ़ेत् - अश्रव्यमुच्चारणमुपांशु। केचिन्मध्ये मध्ये द तथोच्चारयन्ति यथा सम्पूर्ण वाक््यं न श्रूयते। स दोष३। स्पष्ठोच्चारणं जुण३ | क् तदेवाम्बूक़ृतमुच्चारणम् - द अजोकम्कामम्वूक्तमाल नह्ठ दएमु/ ( ऋग्वेब्क्रतिछाख्यमू १८:८७) क् द उोगम्यां नढ्गं बह़्मित्य</ ढाल वक्ता तब् दुष्टमम्बूक्लमित्सुच्यते/ (उकटः) द द (१०/ दर्श न वढ़ेत् - क् सन्दर्श ( तीठनम् आह ठन््वो:/ (-ऋग्वेदफ्रातिछख्यम 9७24) द वीलठन नाम ठन््दोनीवते॥799 / (उक्द३) क् सन्दरशो व्यास# / (ऋग्वेकफ्रातिशाय्यम 96 99) द क् क्
अबुकासिकानों संदेशला। (तत्रेत १: 93) हन्वोर्विस्तारश्चेत् स्यात् तहिं संदंशो दंशो वा दोष४। तादृशमुच्चारणं दष्ट॑ भवति। व्यासो विस्तार इत्यनर्थान्तरम् | तस्यामवस्थायां हन्वोर्नचिर्भावो5पि घटते, स दोष:। दोषाभावश्च जुण8 |
(१9) ०_्वश्तिं न बढ़ेत् - त्वरितोच्चारणं दोष:। न हि त्वरया कृत उच्चारणे वर्णगुणा& प्रतीयेरन्। के ते जुणा8? सोष्गा कु टरृर्व्येश सह्मेच्यते सक्रत् स्वेन/ /तत्रेव 4. २० अर्थात् महाप्राणो वर्णः स्वेन पूर्व्यण सह सकृदुच्यते - संयुक्ता8; खठथफा३ कटतपै३ सह, घझ्ढ्धभाश्च गजडदबै३ सह पूर्वनिहितैरच्नार्यन्ते। सख्यं सक्ख्यं, शाद्यं शाद्ढ्यं, पथ्यं पत्थ्यं, रेफ्यं रेप्फ्यमिति, जिप्रति जिम्प्रति, आद्य8 आइड्द्य8, मध्यं मदृध्यं, सभ्य8 सब्भ्य इति। एवं शषसा अपि | यथा घनश्यामों घनश्श्यामः, निष्यन्दो निष्ष्यन्द१, दीर्घस्वरों दीर्घस्स्वर इति समुच्चार्यन्ते | तत्र चवर्गद्वितीयविषये विशेष: - असदोगारदिरपि व्छकर// /तत्रेत 4. 3) छकार४ संयोगादिरसंयोगादिवा चकारसहित उच्चार्यते - उपच्छायम्, तुच्छूयेनेति। अल्पप्राणानां तु स्वेनैव द्वित्वमुच्यते - स्वराकुस्वारोप्लितो (द्वेरच्यते संकोकादि// (तत्रेंत 4. 9) य॒या कृत्वा, पत्रमू, कट्या, विद्या, शम्या, कन्या, जप्यमित्यादय$ कृत्त्वा, पत्त्रमू, कद्द्या, विदृद्या, शम्म्या, कन्न्या, जप्प्यमिति समुच्चार्यन्ते | वेदे त्वनुसारात् पर8४ संयोगो5पि तथोच्चार्यते |
ऋऋ' जा
मा €ूूू->ूरा>--
पाणिनीयशिक्षा / ४६
एवमन्यत्रापि सत्वरपाठी न सम्यजगुच्चारयितुं प्रभवति | लिखितपाठिनो5पि स॒ एव दोष8 स्यात् | (?२) “निरस्त न बढ़ेत् - को5यं निरास8 ? उच्यते - निरस्तें स्थानक्रणापकर्षे/ / तत्रेर १६२) स्थानस्य करणस्य चापकर्ष यथावदुच्चारणपाटवाभावे निरासो नाम दोषो भवंति, तदेव निरस्तमिति। यथावत्ता च स्थानकरणयोर्गुण8 | न सार्वत्रिको5यं दोष१ किन्तु - सरेफ़योमध्यिमयोर्निरास/ / (तत्रेंव १६! २७० दीघरात्रिरस्त द् िसजनीयमृ/ (तत्रेंर १6३०० यदा चवर्गटवर्णों सरेफौ भवतस्तदा ' उच्छूय8 ,, उष्ट्र४ इत्यादी निरासो घटते। दीर्घात् स्वरात् परो विसर्णो निरस्तो भवति। अयं दोषो वर्जनीय8 । (?82) 2िलम्बितं न बढ़ेत् - विलम्बेनोच्चारणे सन्रिधिभड्ड8 ओ्रोतु$ कर्णपीडा तात्पर्यानवगमश्च भवन्ति। अतो भरतेनोक्तम् - पण्णों कलानों परतोविलम्बो न /विधीयते/ (/नट्यशारुमु 9७ 989/ कलाशब्दो मात्रापर्याय8। कर्तव्यो5पि विरामो नाधिक१ स्यात् षड्भ्यो मात्राभ्य8 | हस्वोच्चारणकालो मात्राकाल॥8 | (?४) गढ्गक़ितं न बढ़ेत् - गद्गदितं स्वरभड्लेनोचचारितम्। स दोष३8 | सुस्थकण्ठेनोच्चारणं जुण३ | क् (१६) श्रगीतं न वढेत् - तथा चाहुरभिनवगुप्तपादा अपि - रफक्ति/गाशिनिवेशे ( गानयोगो न पाठ्ययोग// (#अभमिनव#रती १७ 9०६/ राणबद्धगानाभिनिवेशे प्रगीतं स्यातू, पाठ्यं तु व्याहन्येतेति तदाशय३ | तथा वदेद् यथा पाठ्यस्योच्चारणं व्याहतं न स्याद् रागकृतेन स्वरादिनेति यावत् | (१4) +निष्पीडितं न वदेत्- लेशेन दा कचनें पीडनं 7/ (ऋग्वेदफ्रातिशाख्यम १६! 9७) लेशेन प्रयत्नशेथिल्येन/ प्रीडनमतिप्रयत्न// तादुने दोफों सर्वेध् वजयेत्/ (उकट४/
(१७) ग्रस्तपद न वढ़ेत्ु - अक्षराणां ग्रासे पदस्यापि मध्ये ग्रासो सम्भवति। स दोष३8। श्वासशक्तिमुल्लड्घ्य पठन्तो बाला प्रायेण पदं ग्रसन्ति | अत एवाह भरतमुनि३ -
परदवर्णसमासे व द्वुते बह्लकसडुटे /
कार्यो विराम/ पादानते तक्षा प्राणवशेन 7/ / (नाद्यशरूम् 7७ 726
पाणिनीयशिक्षा / ५०
यत्र पदानां समास8 पादान्तरं धावति, यत्र वा वर्णानां संकटा रचना, यत्र द्रुतो लय$, यत्र वा बहूनामर्थानां समवायस्तत्र पादान्ते विरामं कृत्वैव पठेत्, अथवा स्वप्राणशक्ति निष्ठाय यथाशक्ति समुच्चार्य यत्र शक्तिविरमति तत्र विराम॑ कृत्वैव पठेदित्यर्थ 8 | (१८) शग्रस्ताक्ष न वदेत् - जिल्लमूलनिगयले ग्रस्तमेतत्/ (ऋग्वेकफ्रातिशाख्यम् १८:८० निग्रहो नाम स्तम्भ्ननम्/ ( उतट/#) ग्रास# कण्ठयय)// (7६ 7२/ य/ आकुक्ते ग्रासों नाम दोष/ स कण्ठयकोरकारा55क्रारयरुत्पद्चते / स वजकितव्य# / (उकट४/ अद्यतना$ प्रायेण जिह्नाया मूलं निगजृह्य तथोच्चारयन्ति यथा हस्वाकारं निगीर्ण विद्धति। ' राम ' इत्युच्चारयितव्ये ' राम् _ इति कुर्वन्तो हस्वाकारें भ्क्षयन्ति | जिह्वामूलं हि तत्र करणम्, तत्रिग्रहे वर्णस्य निग्रहो5वश्यं भावी | व्यज्जनोच्चारणाव्यवहितक्षणे खल्वकारश्रुतये जिह्नामूलं प्रेरयितव्यं येन तदुच्चारणं संभवेदिति | (१6) दीन न वदेत् - केषांचिद् वर्णोच्चारणे स्वाभाविक दैन्यं जायते। स परिटहर्तव्यो दोष॥। अयमेव विक्लेशो दोष३ - विक्लेश/? स्थाने सकले सकले बदुर्ये (ऋग्वेदप्रातिशख्यम् १6 २३५ चतुर्थ पवर्णे समुच्चार्ये सकले करणसहिते स्थाने विक्लेशो नाम दोषों भवति। अवैशद्यं विक्लेश इति उवट३8 |
(२०) साबुनास्य न वदेत् - रच्छत् द कासिक्यमपीतरस्मात्/ (ऋग्वेक्प्रातिशख्यम् १6२२) रच्छत् (अबुनामिकातू) कण्ठूयाद् दीघाति पर विसजनीयमू् -- - - ऋकारात् (पर॑ं कप)? कासिक्यमाहु४/ स द्रोष// स्वतर्गॉःपावुम, दूँ: एतिश्य// (उक्ट४) एवमन्यत्रापि सानुनास्यदोष ऊहा४। दोषाभावश्च प्रथमों गुण8। | | ३४-३५। |
पांठ के बीस दोष हैं। ' न वदेत्' (उच्चारण न करे ) पद का प्रत्येक से समन्वय है। इस प्रकार -
(१)शद्डितं न वदेत् - शट्डित उच्चारण न करे। यह शट्डितत्व क्या है 2 सन्दिग्धत्व अर्थात् सन्देहयुक्त होना ही शड्वितत्व है। उच्चारणकर्ता जब उच्चारण करते समय शट्डित-सा होता है, तब उस का उच्चारण भी शड्डित हो कर श्रोता को शड्डुपक्ुल कर देता है कि इस वक्ता ने कैसा उच्चारण किया 2
पाणिनीयशिक्षा / ५१
ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.३८) में इसे उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है। ऋ ऋ ये दो स्वर रेफयुक्त हैं। कुछ लोग इन्हें उकार जैसा पढ़ते हैं। जैसे तिस्रो मातृख्रीन् पितृन्' (ऋग्वेद १.१६७.१०) यह उच्चारण करतें समय ' तिख्रो मात्रूख्नीन् पित्रून कर देते हैं। ' बृभिवृन् ' (ऋग्वेद ६.३५.२ ) के स्थान पर ब्रुभिन्रून् पढ़ते हैं।
ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.४१-४२) में ही आगे जा कर और उदाहरण दिये गये हैं।
_ 'ऐये४' (ऋण्वेद ५.२.८),' वैयश्वस्य ' (ऋग्वेद ८.२६.११ ) इन में ' ऐ' का उच्चारण प्रसड्ड प्राप्त होने पर' अ' का उच्चारण करते हैं - ' अय्ये४ ' वय्यश्वस्य '। इस के विपरीत कहीं ' अ' को ' ऐ ' जैसा उच्चारित करते हैं। ' रय्या ' (ऋग्वेद १०.१६.७) ' वय्यम् ( ऋग्वेद ६.६८.८) | हृदय्यया ' (ऋग्वेद १०.१५१.४) के स्थान पर रैया, वैयम्, हृंदैयया ' पढ़ते हैं। इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी जान लेने चाहिएँ। अशद्डितत्व गुण है।
(२)भीतं न वदेत् - भय से आक्रान्त हो कर उच्चारण न करे। इस दोष से अन्य सारे दोष उत्पन्न हो जाते हैं। निर्भय उच्चारण गुण है।
(३) उद्घुष्ट न वदेत् - आवश्यक न होने पर ऊँचे स्वर से उच्चारण न करे। अथवा सघोष व्यज्जनों के उच्चारण में अनुनाद उद्घोष है और अनाद अव्यक्तत्व कहलाता है। अव्यक्तत्व आगे कहा जाएगा। प्रातिशाख्य में आया है -
सघोष वर्णों का अनुनाद अथवा धारण कर दिया जाता है। सोष्म वर्णों का अनुनाद, अनाद और लोमश्य तथा ऊष्मों का क्षेवेठन कर दिया जाता है। चारों वर्गों में जिह्ला का प्रथन हो जाता है। (ऋणग्वेदप्रातिशाख्य १४.१८.२१ )
उवबट को आधार बनाकर इन का विवेचन इस प्रकार किया जा सकता है - अतिरिक्त ध्वनि अनुनाद ' है। वर्ण की अनुपलब्धि को ' धारण' कहा गया है। उच्चारण न करना ' अनाद ' है। वर्ण-उच्चारण में सुकुमारता का अभाव ' लोमश्य ' है। वर्ण के समान रूप वाला सीत्कारादि ध्वनि ' क्षेषेठठन ' है। जिह्ला का अनावश्यक विस्तार ' जिह्ाप्रथन हैं। इन में से अनुनाद और क्ष्वेछवन -पूर्वक घोष वर्ण का उच्चारण किया जाने पर वह' उद्घुष्ट ' कहलाता है। घोष वर्ण के उच्चारण में पदादि में अतिरिक्त नाद किया जाता है, वह दोष है। उदाहरणार्थ -
' द्यावा, द्वादश, श्वोतति, स्तौति ' इत्यादि पदों के उच्चारण में कुछ लोण पदादि में अकार या इकार का अधिक उच्चारण करते हैं। अनाद, धारण और जिह्लाप्रथन से उच्चारणीय वर्ण की अव्यक्तता हो जाती है। अथवा लोमश्यरूपी कठोरता ही उद्दघुष्ट ' हैं।
(४) अव्यक्त न वदेत् - अस्पष्ट उच्चारण न करे। अनाद, धारण और जिल्लाप्रथन से अव्यक्तता उत्पन्न होती है, यह बताया जा चुका है। अव्यक्तता दोष है और व्यक्तता जुण।
(५) अनुनासिकं न वदेत् - ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.६) तथा उस पर उचट के भाष्य में स्पष्ट किया गया है कि जब वर्ण नासिका से मिल कर उच्चारित होता है तब अनुनासिकत्व उत्पन्न हो जाता है। यह दोष है, जिस से बचना चाहिए |
अभिप्राय यह है कि अननुनासिक वर्ण का अनुनासिक रूप में उच्चारण करना दोष है और इस का अभाव गुण।
(६) काकस्वरं न वदेत् - कर्कश उच्चारण न करे। लोमश्य नामक परुषता बतायीं जा चुकी है। ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.२६) में भी वर्णों के अतिस्पर्श और रेफ के उच्चारण में बर्बरता को दोष कहा गया है। उवट ने बर्बरता से असुकुमारता का आशय लिया है।
पाणिनीयशिक्षा / ५२
(७) शिरसिगं न वदेत् - जो वर्ण मूर्धन्य नहीं हैं, उन का मूर्धा-स्थान से उच्चारण न करे। यह दोष है और इस का अभाव गुण । ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.४५) में इस का उदाहरण दिया गया है - कुछ लोग इकार के स्थान पर ऋकार पढ़ते हैं। ' निर्णिक् ' का उच्चारण करते समय ' ब्रिणिक् ' कर देते हैं।
(८) स््थानविवर्जितं न वदेत् - जिस वर्ण का जो नियत स्थान है, उसी से उस वर्ण का उच्चारण करे। भाषान्तर (संस्कृत से भिन्न भाषा ) के प्रभाव से चवर्ण तथा टवर्ण का दन््तमूलीय उच्चारण किया जाता है। इसी प्रकाश श-ष-स का उन के भिन्न स्थान से उच्चारण होता है। यह दोष है। यथास्थान उच्चारण गुण है।
(६)उपांशु न वदेत् - सुनाई न देने वाला उच्चारण उपांशु है। कुछ वक्ता बीच-बीच में इस प्रकार उच्चारण करते हैं कि पूरा वाक्य सुनाई नहीं देता। यह दोष है। स्पष्ट उच्चारण गुण है।
ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (१४.४) में ओठों से बद्ध उच्चारण को अम्बूकृत कह कर उसे दोष माना गया है।
(१० )दष्टं न वदेत् - ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.६, १४.११, १४.१३ ) में उल्लेख है कि अनुनासिक वर्णो के उच्चारण में हनुओं का विस्तार हो जाने पर सन्दंश अथवा दंश नामक दोष होता है। उस प्रकार का उच्चारण दष्ट हो जाता है। व्यास (विस्तार) का भी यही अर्थ है। उस स्थिति में हनु नीचे भी हो जाती हैं। यह दोष है और इस का अभाव गुण।
(११) त्वरितं न वदेत् - जल्दी में उच्चारण करना दोष है। शीघ्रता से उच्चारण किये जाने पर वर्णगुणों की प्रतीति नहीं होती। वे गुण कौन से हैं ?
ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (६.२) के अनुसार महाप्राण वर्ण का अपने पूर्ववर्ती वर्ण के साथ एक बार उच्चारण किया जाता है - संयुक्त ख ठ थ फ, पूर्ववर्ती क ट त प के साथ और घझ ढ ध भ अपने से पूर्वनिहित ग ज ड द ब के साथ उच्चारित होते हैं। सख्यं-सक्ख्यं, शाठयंन-शाट्ठयं, पथ्यंनपत्थ्यं, रेफ्यं>रेप्फ्यं, जिप्रतिल्"जिग्प्रति, आदय४-5आड्ढ्य 8, मध्यं- मद्ध्य॑, सभ्य83्च्सब्भ्य 8 |
इसी प्रकार श ष स भी हैं। जैसे - घनश्याम£५च्घनश्श्याम$, निष्यन्द४--निष्ष्यन्द ३, दीर्घस्वर४ -दीर्घस्स्वर8 उच्चरित किये जाते हैं।
ऋग्वेदप्रांतिशाख्य (६.३ ) में ही चवर्ण के द्वितीय वर्ण के विषय में विशेष व्यवस्था है। छकार का उच्चारण चकार के साथ ही होता है, भले ही वह छकार संयोगादि हो या असंयोगादि - उपच्छायम्, तुच्छयेन |
ऋग्वेदप्रातिशाख्य (६.१) के अनुसार अल्पप्राणों का द्वित्व स्वत३ है। संयोगादि वर्ण स्वर या अनुस्वार से युक्त होने पर दो बार कहा जाता है। जैसे - कृत्वा, पत्रम्, कद्या, विद्या, शम्या, कन्या, जप्यम् आदि को क्रमश१ कृत्त्वा, पत्त्रमू, कट्द्या, विदृद्या, शम्म्या, कन्न्या, जप्प्यम् कहा जाता है। वेद में अनुस्वार के परवर्ती संयोग का भी द्वित्व-उच्चारण किया जाता है।
इस प्रकार के स्थानों पर त्वरापूर्वक पाठ करने वाला ठीक उच्चारण करने में समर्थ नहीं होता। लिखितपाठी का भी यही दोष होता है।
(१२ ) निरस्तं न वदेत् - यह ' निरास ' क्या है? इस पर ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.२ ) में कहा गया है कि स्थान और करण का अपकर्ष हो जाने पर यथावत् उच्चारणपटुता का
ह
"|
पाणिनीयशिक्षा / ५३
अभाव निरास नामक दोष है। यही ' निरस्त ' है। स्थान और करण की यथावत् स्थिति गुण है। यह दोष सार्वत्रिक नहीं है। ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.२७, १४.३० ) के अनुसार जहाँ चवर्ग और टवर्ग का रेफ सहित प्रयोग होता है, वहाँ ' उच्छूय३8 ', ' उष्ट््8 ' इत्यादि में निरास दोष आ जाता है। दीर्घ स्वर का परवर्ती विसर्ग निरस्त हो जाता है। इस दोष से बचना चाहिए ।
(१३ ) विलम्बितं न वदेत् - विलम्ब से उच्चारण किये जाने पर सन्रिधिभड्ड, श्रोता को कर्णपीडा तथा तात्पर्य का अबोध होता है। इसीलिए नाद्यशास्र (१७.१४३) में भरत ने कहा है कि छह कलाओं (मात्राओं ) से अधिक विलम्ब नहीं किया जाना चाहिए। हस्व उच्चारण में लगने वाला समय एक मात्रा कहलाता है।
(१४) गदृगदितं न वदेत् - स्वरभडूपूर्वक उच्चारण न करे। यह दोष है। सधे कण्ठ से उच्चारण करना गुण है।
(१५) प्रगणीतं॑ न वदेत् - अभिनवभारती (१७.१०६) में आचार्य अभिनवणुप्त ने भी कहा है कि रागणबद्ध गान किये जाने पर पाठ्य का हनन हो जाता है। उच्चारण इस प्रकार किया जाना चाहिए जिस से कि रागकृत स्वर आदि से पाठ्य का उच्चारण बाधित न हो।
(१६ ) निष्पीडितं न वदेत् - ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.१७) और वहीं उवट के भाष्य में लेश और पीडन दोषों को परिभाषित किया गया है। प्रयत्न में शिथिलता होने पर लेश और प्रयत्न की अधिकता होने पर पीडन दोष होता है। दोनों ही दोषों से बचना चाहिए ।
(१७) ग्रस्तपदं न वदेत् - अक्षरों को निगल लेने पर पद का भी बीच में ही ग्रास हो जाता है। यह दोष है। अपनी श्वासशक्ति का अतिक्रमण कर पढ़ते हुए बच्चे प्राय# पद का ग्रास कर लेते हैं। इसीलिए भरतमुनि ने नाद्यशास्र (१७.१३६) में कहा है कि जहाँ पदों का समास छनन््द के अग्रिम पाद तक जाता हो, जहाँ वर्णों की रचना जटिल हो, जहाँ लय द्वुत हो अथवा जहाँ बहुत-से अर्थों का एकीभाव हो वहाँ पादान्त में विराम कर के ही पाठ करना चाहिए, या फिर अपनी प्राणशक्ति (श्वास) का निश्चय कर के यथाशक्ति उच्चारण कर, जहाँ शक्ति चुक जाय वहाँ विराम कर के ही पाठ करना चाहिए ।
(१८ ) ग्रस्ताक्षरं न वदेत् - ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.८) में कहा गया है कि जिह्नामूल का निग्रह किये जाने पर ग्रस्त दोष होता है। उवट ने निग्रह का अर्थ ' स्तम्भन ' किया है। आगे ऋग्वेदप्रातिशाख्य ( १४.१२ ) में पुन8 बताया गया है कि ग्रास नामक दोष कण्ठ्य अकार और आकार में उत्पन्न होता है। यह वर्जनीय है।
आजकल प्राय8 जिह्ना के मूल का निग्रह कर कुछ ऐसा उच्चारण किया जाता है, जिस में हस्व अकार का निगरण हो जाता है, उस का श्रवण नहीं होता। उदाहरणार्थ - ' राम ' का उच्चारण करते हुए' राम् ' कर देते हैं और हस्व अकार का भक्षण कर जाते हैं। वहाँ जिह्लामूल करण है, जिस का निग्रह होने पर वर्ण का निग्रह भी अवश्यम्भावी है। व्यज्जन के उच्चारण से ठीक बाद अकार की श्रुति हो सके, इस के लिए जिह्बामूल को प्रेरित करना चाहिए, जिस से अकार का उच्चारण सम्भव हो।
(१६) दीन न वदेत् - कुछ वर्णो के उच्चारण में स्वाभाविक रूप से दीनता उत्पन्न हो जाती है। यह दोष दूर किया जाना चाहिए। इसी को ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.२५ ) में
विक्लेश ' दोष कहा गया है।
पाणिनीयशिक्षा / ५७
(२० ) सानुनास्यं न वदेत् - ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१४.३२) और उस पर अपने भाष्य में उवट ने स्पष्ट किया है कि अनुनासिक कण्ठ्य दीर्घ और ऋक़वार के परवर्ती विसर्ण का नासिक्य उच्चारण दोष है। स्वतवॉपायु॥ और बूँ:पतिभ्य४ इस के उदाहरण हैं।
इसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी सानुनास्य दोष जान लेना चाहिए। दोषाभाव 'होना ही प्रथम जुण है ।।३४-३५। |
प्रात३ पठेन्नित्यमुर४स्थितेन स्वरेण शार्दूलरुतोपमेन | मध्यन्दिने कण्ठगतेन चैव चक्राह्मसंकूजितसन्रिभेन । । ३६। | |
तारं तु विद्यात् सबनं तृतीयं
शिरोगतं तद्च सदा प्रयोज्यम् | मयूरहंसान्यभ्ृतस्वराणां
तुल्येन नादेन शिर8स्थितेन | |३७। |
सवनं॑ नाम सोमसन्धानं स्रानं यागश्च । . सवन॑ स्रानयागयो$९
इत्यनेकार्थसंग्रह४ (३.४५६) । ' होमस्तु सवनम् इति वैजयन्ती। तत् त्रिधा - प्रातश्सवनं, मध्याह्ृसवनं, सायंसवनं च। सवनशब्देन काल द उपलक्ष्यते। वेदगानव्यवस्थापि त्रिधा श्रूयते - || ग्रायत्र श्रात/सकवनम्/ (घ्गरन्दोग्यें 2. 94. 9
द औज# माध्यन्दिनसवनमृ/ (तत्रेव ३. १4. 3५ जागतें तृतीयसकनमृ्/ /तत्रेंव 2. 94. 4५ म्रन्द्र श्रात/सक्नम् / (शोनकरोपनिफ्त् २
क् स्वरसप्तकं त्रिधा - मन्द्रं मध्यं तारं चेति। सवनेषु तेषां विभाग इत्याह || - प्रातशपठेदिति | क् (१) प्रातश्सवने नित्यमुर१स्थितेन शार्दूलरुतोपमेन हुड्डऊनरसदृशेन स्वरेण पठेत्। अयं मन्द्र8 स्वर8। अत्र भरत३ -
मन्द्रो नामोर/स्थानगत/- - - -नीचो नामोर/स्कानगतो मन्द्रतर/ /
(नाट्यशरूम् १७ 99२
पाणिनीयशिक्षा / ५५
(२) मध्यन्दिने मध्याह्नसवने चक्रवाककूजनसदूृशेन कण्ठगतेनैव च स्वरेण पठेत्। इदं मध्यसप्तकम्। तथा चोक्तम् - मध्यो आगस्तावदनावेशे सर्वत्र स्थित एक/ (तत्रेव, अभिनवभारती) आवेशो नाम भावविशेषावस्था। तत्र नीचावेशे मन्द्र, उच्चावेशे च तार४ स्वर३। अनावेशे तु स्वभावतो मध्य एव। शिक्षानुसारेण सूर्यगत्या स्वरपरिवर्त इति मध्यन्दिने कण्ठगतो मध्य स्वर६ | शार्दूलरुतापेक्षया नीचत्व॑ मयूरादिरुतापेक्षया चोच्चत्वमिति कृत्वा चक्राह्नकूजितं मध्यमाचख्यु 8 |
(३)तृतीयं सवनं तार॑ विद्यातू तदच्च॒ सदा शिरोगतं मयूर - हंस - कोकिलानां स्वरसदृशेन शिर स्थितेन नादेन प्रयोगयोग्यं भवति | तथा च भरत#$ -
दीपो नाम थिर/स्वानगतस्तारतर// (नाट्यशारसम् १७ 99२/ पाणिनीयशिक्षाया१ सप्तमाष्टमश्लोकयोरयमर्थो व्याख्यातपूर्व इति नेह प्रतन््यते | ।३६-३७। ।
कोशग्रन्थो में सवन ' शब्द के तीन अर्थ बताये गये हैं - सोमरस का निकालना, स्नान और यज्ञ। अनेकार्थसंग्रह (३.४५६) में सवन का अर्थ स्नान और यज्ञ लिया गया है। बैजयन्ती कोश सवन का होम अर्थ देता है। यह सवन तीन प्रकार का है - प्रातश्सवन, मध्याह्सलवन और सायंसवन। सवन शब्द से समय का अर्थ उपलक्षित होता है। वेद की गान-व्यवस्था भी तीन प्रकार की कही गयी है। छान्दोग्य उपनिषद् (३.१६.0, ३, ५ ) में प्रातश_सवन को गायत्री छन्द से, माध्यन्दिनसवन को त्रिष्ठुभू छन््द से तथा सायंसवन को जगती छन्द से सम्बद्ध बताया गया है। शौनकोपनिषत् (२) में प्रात४सवन को मन्द्र कहा गया है।
स्वरसप्तक तीन प्रकार का है - मन्द्र, मध्य और तार। सबनों में उन का विभाजन करने की दृष्टि से ही इस प्रकार की व्यवस्था दी गयी है -
(१) प्रातःसवन के समय सदैव वक्षस्थल में स्थित, बाघ की ध्वनि के संदृश, हुँकार - जैसे स्वर से पाठ करे। यही मन्द्र स्वर है। भरत ने भी नाद्यशाख्र (99७.99२) में स्पष्ट किया है कि उर४स्थान में रहने वाला स्वर मन्द्र कहलाता है। वही मन्द्रतर होने पर नीच स्वर हो जाता है।
(२) दिन के मध्य में किये जाने वाले मध्याह्लसवन के समय चकवे की कूक केतुल्य कण्ठगत स्वर से पाठ करे। यह मध्यसप्तक है। नाद्यशाख्र (१७.9२) तथा अभिनवभारती में भी इसे स्पष्ट किया गया है। उस के अनुसार अनावेश की स्थिति में सर्वत्र मध्य स्वर का प्रयोग होना चाहिए |
आवेश भाव -विशेष की अवस्था है। नीचावेश में मन्द्र तथा उच्चावेश में तार स्वर का प्रयोग होता है। अनावेश की स्थिति में स्वाभाविक रूप से मध्य स्वर ही रहता है। शिक्षाग्रन्थ के अनुसार सूर्य की गति के कारण स्वर में परिवर्तन होता है, अत३ मध्याह्न में कण्ठणत मध्य स्वर कहा गया है। शार्दूल-शब्द ( मन्द्र ) की अपेक्षा नीच होने तथा मयूरादि के शब्द (तार ) की अपेक्षा उच्च होने के कारण चकवे के शब्द के तुल्य शब्द को मध्य कहा गया है।
> अधयाानमयुून समा अत» 5 ककम-०-.. पक #ख्कड 22 कल्तन ८ कि #क-.
पाणिनीयशिक्षा / ५६
(३) तृतीय सवन तार है। उस का प्रयोग सदैव शिर8स्थान से तथा मयूर, हंस, कोयल के स्वर के समान शब्द से प्रयोग के उपयुक्त होता है। भरत ने भी नाट्यशास्र (१9.9१२) में कहा है कि शिरश्स्थान में रहने वाला तार-स्वर ' उच्च ' है तथा वही तारतर होने पर * ' दीघ ' कहलाता है।
पाणिनीयशिक्षा के सातवें और आठवें श्लोकों की व्याख्या में इस पर विस्तार से विचार किया जा चुका है । ।३६-३७। |
(८) अचो5स्प्ृष्टा यणस्त्वीषन्नेमस्पृष्टाः शल8 स्मृता$ | शेषा8 स्पृष्टा हल$ प्रोक्ता निबोधानुप्रदानत३ | | ३८। |
वर्णाच्चारणात् प्राक् तेन सहैव च प्रयत्ना विधीयन्ते | प्रयत्नैरेव तत्तत्स्थानेषु
वायुर्विधार्यते येन वर्णोच्चारणं सम्भवति। ते च यत्ना द्विधा विभज्यन्ते - (१) उच्चारणात् प्राक् कृतो यत्न आभ्यन्तरयत्न आन्तरयत्न8 प्रयत्नो वा निगद्यते, (२) त्चारणेन सहैव कृतस्तु यत्नो बाह्य $, स एवानुप्रदानमित्युच्यते |
तत्र विशेषेण विवेचनीयत्वादाभ्यन्तरप्रयत्नांस्तावदू विवृणोति - अचोथस्पृष्टा इति।
अन्रेदमवधेयम् | स्पृष्टविवृतभेदेन द्विघैवाभ्यन्तरो यत्न४। तत्र चतुर्धा व्यवस्था -
(१) अच$ स्वरा अस्पृष्टा भर्वन्ति। तेषामुच्चारणे स्पृष्ट४ प्रयत्नो न क्रियते। परिशेषात् ते विवृतप्रयत्नजन्या एव। जिह्नया न क्वचिद् रोध३ क्रियते न वा स्पृश्यत इति विवृतत्वं स्वराणाम् |
(२)यणो यरलवा ईष्व्स्पृष्टाः। तेषामुच्चारणे जिह्ना मनागुच्चारणस्थानं स्पृशतीति ते शेषतो विवृता भवन्ति।
(३) शल8 शषसहा नेमस्पृष्टा अर्धस्पृष्टा भवन्तीति कृत्वा ते5र्धीविवृता 8 ।
(४) शेषा हलो वर्गीयव्यज्जनानि स्पृष्टप्रयत्नेनैवोच्चार्यन्त इति न ते विवृता लेशेनापि |
अन्न प्रातिशाख्यम् -
स्प्ृष्टमस्वितमृ् / 4+स्प्॒एं ६ श्रागपकाराह्रत॒णामु/. स्वराबुस्वारोष्मफामस्प््टं स्वितमृ/ नेके.. कण्ठयस्य /स्कितमाहुरुप्मण/ /
(ऋग्वेदफ्रातिशाख्यम् 93. 6 - 9२)
._+++* मल
पाणिनीयशिक्षा / ५७ ५5 ने ननडंे॑ांओमऊींब चंबा । ४ भजन
स्प्रएं करण॑ (अ्रयतनं) स्पशानामृ/ तदस्वितें दोदितव्यमृ / अशस्वितमिति/ यत्र वर्णस्यानमात्रित्य मध्ये जिल्ला न संतिते तदास्वितमू /---+- दु/स्प्रश्मीपत्स्पण्टमित्यव? / हकारात् ग्राक ब॒त॒र्णा व्षानां दरलवानाम्ृ/---- स्वराणामबुस्वारस्कोष्मणां वास्ट्रएं (स्वित वेदितव्यम्/ यत्र कर्णप्कानमाश्रित्य जिह्लागतिएते तत् स्वितमु/ एक आचाया? कण्ठ्यस्वोष्मणो हकारस्य
|
विसननीयस्य व (स्वितमस्पएं करण न मन्यन्ते/ स्प्र॒एं दु/स्प्रषं वैवमेके/ (उकद४) अन्न शषसहानां विषये वैमत्यम् | शिक्षायां तु ते नेमस्पृष्टा मता;॥ अथ शिक्षासूत्राणि - स्पृएकरणा# स्पशा१। इपित्स्पूएकरणा अन्तस्वा॥/ इपिब्वेद्तकरणा ऊप्माण:/ विद्वलकरणा वा। (व्व्तकरणा# स्वरा// ( फणिनीयशिक्षासूऋणि ३.८-८) अत्रापि शषसहानामूष्मणां विसर्गस्य चोष्मणो विषये वैमत्यं दृश्यते। उच्चारणे जिह्ना सर्वथा स्थिता न लभ्यते किन्तु अर्धस्पर्श तनुत इति साधूक्त प्रतीयते ' नेमस्पृष्टाः शल8 ' इति। अथ बाह्ययत्नान् प्रस्तौति - निबोधानुप्रदानत इति। इतोड5ग्रे यद् विवेचयिष्यते तदनुप्रदानतो ज्ञातव्यमित्यर्थ॥ | | ३८। |
वर्णों के उच्चारण के पूर्व और उच्चारण के साथ प्रयत्न किए जाते हैं। इन प्रयत्नों द्वारा ही मुख के उन-उन स्थानों तक वायु को पहुँचाया जाता है जिस से वर्ण का उच्चारण हो पाता है। वे यत्न दो भागों में बाँटे गये हैं - (१) उच्चारण के पहले किया गया यत्न, जो आभ्यन्तर यत्न या प्रयत्न कहलाता है, और (२) उच्चारण के साथ ही किया गया यत्न बाह्य यत्न है, यही अनुप्रदान है। इन दोनों यत्नों में से आभ्यन्तर यत्न या प्रयत्न विशेष रूप से विवेचनीय हैं। इन्हीं की व्याख्या ' अचो5स्पृष्टा8 ' इत्यादि द्वारा की गयी है।
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि आभ्यन्तर यत्न के दो ही भेद होते हैं - स्पृष्ट और विवृत। इस विषय में चार प्रकार की व्यवस्था है -
(१) अच् प्रत्याहार के अन्तर्गत आने वाले वर्ण (स्वर) अस्पृष्ट होते हैं। उन के उच्चारण में स्पृष्ट प्रयत्न नहीं किया जाता। वे विवृत प्रयत्न से ही जन्म लेते हैं। स्वरों का विवृतत्व इसलिए है क्योंकि उन के उच्चारण में जिह्ना के द्वारा न तो कोई अवरोध किया जाता है और न ही किसी स्थान का स्पर्श किया जाता है।
(२)यण् (यर ल व) ईष्ट्य्पृष्ट हैं। उन के उच्चारण में जिह्ना उच्चारण-स्थान को थोड़ा -सा छूती है। इसके अतिरिक्त वे विवृत ही रहते हैं।
(३)शल् (श ष स ह) अर्धस्पृष्ट होते हैं, इसलिए वे अर्धविवृत कहे गये हैं।
(४)शेष हल् वर्णों (वर्णीय व्यज्जनों ) का उच्चारण स्पृष्ट प्रयत्न द्वारा ही होता है, अत5 वे लेशमात्र भी विवृत नहीं हैं।
इस विषय पर ऋग्वेदप्रातिशाख्य (१३.६-१२) में इस प्रकार विवेचन मिलता है - ' स्पृष्ट अस्थित है। हकार के पूर्ववर्ती चार दुःस्पृष्ट हैं। स्वर, अनुस्वार और ऊष्म वर्णों का अस्पृष्ट स्थित है। कुछ आचार्य विसर्ग और हकार का अस्पृष्ट करण नहीं कहते। '
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पाणिनीयशिक्षा / ५८
उवट के भाष्य से इसे भली प्रकार समझा जा सकता है -
' स्पर्श वर्णों का करण (प्रयतन ) स्पृष्ट है। उसे अस्थित जानना चाहिए। जहाँ जिह्ना वर्णस्थान का आश्रय ले कर बीच में नहीं ठहरती, वह अस्थित है। दुुस्पृष्ट का आशय ईषत्स्पृष्ट से है। हकार के पूर्ववर्ती चार वर्णों (यर ल व) का करण दुःस्पृष्ट है। स्व॒रों, अनुस्वार और ऊष्म वर्णो (शष सह) का स्थित अस्पृष्ट है। जहाँ जिह्ना वर्णस्थान का आश्रय ले कर ठहर जाती है वह स्थित कहा गया है। कुछ आचार्य कण्ठ्य - ऊष्म अर्थात् हकार और विसर्ण का स्थित अस्पृष्ट करण नहीं मानते | कुछ अन्य आचार्यों के अनुसार इन का करण स्पृष्ट अथवा दुश्स्पृष्ट है। '' |
यहा श ष स ह के विषय में मतभेद है। शिक्षा में ये नेमस्पृष्ट (अर्धस्पृष्ट ) कहे गये हैं। परन्तु पाणिनीय शिक्षायूत्रों (३.४-८) में इन के करण इस प्रकार बताये गये हैं -
' स्पर्श वर्ण स्पृष्ट करण वाले हैं। अन्तभ्स्थ (यव र ल ) ईषत्स्पृष्ट, ऊष्म (शष स ह ) ईषबद्विवृत अथवा विवृत और स्वर विवृत करण वाले हैं। ' यहाँ भी ऊष्म वर्णों (शष स ह) तथा ऊष्म विसर्ग के विषय में वैमत्य दिखाई देता है। इन के उच्चारण में जिह्ना पूरी तरह स्थित नहीं होती, अपितु आधा स्पर्श करती है, अत5 शल् को नेमस्पृष्ट कहा जाना उचित प्रतीत होता है।
इस के बाद बाह्नम यत्नों का विवेचन किया जा रहा है। तात्पर्य यह है कि आगे जो स्थान
बताया जाएगा, उसे अनुप्रदान से जानना चाहिए | ।३८।।
अमो5नुनासिका न हौ नादिनो हझष8 स्मृता$ | ईषन्नादा यणो जश्च श्वासिनस्तु खफादय8 । ।३६। |
ईषच्छवासांश्चरो विद्याद------
अम४५्च्अ-इ-उ-ऋ-लू-ए-ओ-ऐ - औ- हयवरलञमड-णन इत्येते वर्णा३ हकारं रेफं च वर्जयित्वा3नुनासिका भवन्ति। तत्रायं विवेक$ - अमडणणना अनुनासिका एव, शेषा8 सन्ति निरनुनासिका४ किन्तु कदाचित् सानुनासिका अपि भवन्ति। अत एवं भरतेन नित्यानुनासिका एव परिगणिता8 -
उजपनमा नासिक्रोट्अव ज्ञेया/ / नाटदि्यछस्त्रम् १४१ 9८) ड्ति/
अथ श्वासनादविभागेन बाह्ययत्नो विभज्यते। तत्र हझष३ -+ हझभघदध - वर्णा नादिनो नादानुप्रदाना; | खफादय8- खफछठथा$ श्वासिन१ श्वासानुप्रदानाश/ यण# न्यरलवा४, जश्"जबगडदशा8 इत्येत ईषन्नादा३,
परिशेषे श्वासिनो5ईपि। चर४ "चटतकपशषसान् ईषच्छुवासान् विद्यात्, परिशेषभागे ते नादिनो5पि। प्रातिशाख्ये तु -
पाणिनीयशिक्षा / ५६
वायु॥ ग्राण/ क्रोड्यमनबुप्रदानं कण्ठस्य खे /विव्वते सद्रते गा। आपन्ते श्वासतां नादलां गा. वक्त्रीह्यायुभरयं वान्तरोभीं / /
ता वर्णानों श्रक्कतयो #वन्ति रवास्रोडध्ोफणफामितरेफां द नाद# / सोष्म्रोष्मणां घोषिणां शवासनादों
तेषां स्थान श्रति नादात् तद॒क्तमू // ( ऋग्वेदप्रातिशाख्यम् १2 9-७)
उवटानुसारिणी विबृतिर्यथा -- कण्ठस्य खेन-विवरे विपुले वा संबृतेर सड्कुचिते वा, प्राणो वायु, कोष्ठयमनुप्रदानम्--उदर्य बाह्म॒प्रयत्नम्, आपद्यते | स वायुर्वक्तुश्वेष्टायां कृतायां श्वासतां नादतां वा5पद्यते। विबृते कण्ठविवरे श्वास़्रों भवति प्राण४, संबूते च नाद इति विवेक8। इत्थं च विवारश्वासौ संवारनादा वा प्रयत्नौ वर्णोच्चारणसहवर्तिनीौ जायेते। अथवा
अन्तराच"-कण्ठविवरे समीकृते-विवारसंवारहिते सत्युभयं श्वासतां नादतां चापद्यते, तेनोभौ विवारसंवारी सहैव भवत इति मध्यमा स्थितिः४। ता४
>श्वासता, नादता, तद्रुभयरूपा चेति तिस्नो वर्णानां प्रकृतयो भवन्ति। तत्राघोषाणामृःखफछठथचटतकपानां शषसानां च श्वासो भवतीति
विवारश्वासाघोषत्व॑ प्रकृतिः॥ . इतरेषाम्च्यवरलानां जमडण्णनानां यमानुस्वाराणां च नाद१ प्रकृतिरिति संवारनादघोषत्व॑ प्रकृति8। ये सोष्माणो घोषिण४-झभघढधा३, ये चोष्माण४-हकार - विसर्ग - जिह्नामूलीयो - पध्मानीयास्तेषां श्वासनादौ द्वयी प्रकृतिरिति विवेक8 | एवं श्वासादीनि त्रीण्यनुप्रदानानि वर्णकालस्थानानि भवन्ति। नाधिकानि, न न्यूनस्थानानि | आभ्यन्तराः प्रयत्ना वर्णच्वारणपूर्वस्थितय#/ किन्तु बाह्मा वर्णोच्चािरणसमकालस्थितय8 | स्थानं स्थिति8। श्वासनादोभयात्मकविषये पाणिनीयशि0क्षा प्रातिशाख्याद् वैमत्यं बिर्भर्ति | शिक्षासूत्राण विंशकारिकाव्याख्यायामुद्धृतानि खलु॒किज्चित् पार्थक्यं वह॑न्ति। घोषाघोषविषये नास्ति विवाद8 - गप्चर जज डढण दधन बम तयदेव यरलवा मता घोषा: / कर बछ टठ तक प्रफ ड्वति वर्गष्वपोषा# स्ट॒/ // ( नाट्यशासम् 7८ 92) अत्रापि हकारविसर्गो घोषौ, शषसाश्चाघोषा इति योजनीयम् | अल्पप्राणमहाप्राणविषयको विचारो विंशकारिकाव्याख्यायां द्रष्टव्य 8 |
लि...
पाणिनीयशिक्षा / ६०
सिद्धान्तकौमुद्यां कुतश्चन शिक्षाग्रन्थात् कारिके उद्धृते -
ख्या खमार३ खय/ ४#क 3५ ऐ /ििसर्य और एव ६/ एते शगासाकुप्रदाना अप्ोषाएव /बिद्वण्कते कण्ठमन्ये छ क्ोषा/ स्ट्र/ संग्रला नाद#2गिन: / अबुग्मा वर्गयमग्ा यणएदाल्यासव/ स्कूल: / / विवरणमपि तत्रैव कृतम् - वर्गाणां भ्रथ्मद्वितीया।/ सयस्तथा तेफामेत यम "निल्लामूूलीयोपवध्यानीयों /विसय? र/फरारवेत्येतेफों विकार शवार्रेडघोपश्च, अन्येष द सकारो नाढ़े ध्ोषश्च / तर्कागयां अवमतृतीय+ पजचमा/ अ्रदमततीययमों चरलग्रश्वाल्पप्राका:, अन्ये महाप्राफा। / (/जिद्धान्तकोलुकी सन्गाप्रकरणम)
लघुकौमुदीकार8 सारल्यं वर्तयामास -
खर) /विगारा# सगसा अप्ोषाएव / लश४ सक्ररा गाढ़ा ध्ोषाशच/ तर्णाणां
अचम[तृतीयपज्वमा कणरदाल्पप्रया३/ कयाणां (द्वेतीयबादुरकों ७लश्च मह्यप्राणा/ /
तत्र वेदमात्रोपयोगिनां यमानां गणना न कृता। शेषा अयोगवाहा$ खर्ष
पठिता इति विवारश्वासाघोषानुप्रदानत्वमेव, शर्षतेषां पाठेन
महाप्राणत्वमपीति दिक् । ।३६ १७ ।।
अम् (अइउ ऋलएओऐ औहयवरलजमड्णन ) वर्ण, हकार और रेफ को छोड़कर अनुनासिक होते हैं। ज म डःण और न अनुनासिक ही हैं। शेष निरनुनासिक हैं किन्तु कभी इन का सानुनासिक उच्चारण भी होता है। इसीलिए भरत ने नाट्यशासत्र (१४.१८) में ड॒ जण न म को नासिकय स्वीकार किया है जो नित्यानुनासिक हैं।
इस के पश्चात् बाह्यायत्न श्वास और नाद भागों में बाँटा गया है। हझष् (हझभघढ ध) - ये वर्ण नादी अर्थात् नाद अनुप्रदान वाले हैं। खफादि (ख फ छ ठ थ) श्वासी कहे गये हैं, इन का अनुप्रदान श्वास है। यण् (यरलव) जश् (जबगडद) - ये ईषन्नाद हैं अर्थात् शेष अंश में श्वासी भी हैं। चर (चटतकपशषस ) ईषत्-श्वासी हैं अर्थात् शेष भाग में वे नादी भी हैं।
ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (१३.१-७) तथा इस की उवटानुसारिणी व्याख्या इस विषय पर और विवेचन करती है -
कण्ठविवर के फैलने या संकुचित होने पर वायु बाह्य यत्न को प्राप्त करता है। वक्ता द्वारा उच्चारण करने की चेष्टा किये जाने पर वायु श्वासता या नादता को प्राप्त होता है। कण्ठविवर के विवृत होने पर वायु श्वास हो जाता है और संबृत होने पर नाद। इस प्रकार विवार और श्वास अथवा संवार और नाद प्रयत्न वर्णोच्चारण के साथ ही उत्पन्न होते हैं। इस के अतिरिक्त एक मध्यम स्थिति भी बनती है, जबकि कण्ठविवर विवार और संवार दोनों से रहित होता है। तब विवार और संवार दोनों एक साथ ही जन्म लेते हैं।
०००००
। पाणिनीयशिक्षा / ६१
इस प्रकार वर्णों की तीन प्रकृतियाँ होती हैं - श्वासता, नादता और श्वासनादता। अघोष वर्णो (ख फ छ ठथ च टत क प) और श ष स की श्वासता है, अत४ इन की प्रकृति विवार-श्वास-अघोषत्व है। य वर लज म डः ण न, यम और अनुस्वार की नादता है अत$ इन की प्रकृति संवार-नाद-घोषत्व है। सोष्म घोषी वर्णो (झ भघ ढ ध) तथा ऊष्मों (ह, विसर्ग, जिह्ाामूलीय और उपध्मानीय) की द्वयी प्रकृति(श्वास - नाद) है। इस प्रकार श्वास आदि तीन अनुप्रदान वर्ण के उच्चारण काल तक स्थित रहते हैं। उन की स्थिति न अधिक होती है, न कम। आशभ्यन्तर प्रयत्नों की स्थिति वर्णों के उच्चारण से पूर्व रहती है, किन्तु बाह्य प्रयत्न वर्णाच्चारण के समकाल में होते हैं।
श्वास - नाद की उभयात्मक प्रकृति मानने के विषय में पाणिनीयशिक्षा का प्रातिशाख्य से मतभेद है। बीसवीं कारिका की व्याख्या में जो शिक्षासूत्र उद्क्ृत किये गये हैं, उन में भी कुछ अंशों में यह पार्थक्य देखा जा सकता है। घोष-अघोष के विषय में कहीं कोई विवाद नहीं है। नाद्यशाख्र (१४. १३) में भी इस विषय पर विचार करते हुए निर्देशित है कि - गघ ड, जझज, डढण, दध न, बभम और य र ल व घोष हैं। क ख, चछ, ट 5, त थ, प फ अघोष वर्ण हैं। यहाँ भी हकार और विसर्ग की घोष में तथा श ष स की अघोष में गणना जोड़ लेनी चाहिए। अल्पप्राण-महाप्राण विषयक विवेचन बीसवीं कारिका की व्याख्या में द्रष्टव्य है।
सिद्धान्तकौमुदी में किसी शिक्षाग्रन्थ से कारिकाएँ उद्धृत कर बताया गया है -
खयू प्रत्याहार के वर्णों के यम, खयू प्रत्याहार के व्यज्जन, जिह्लामूलीय, उपध्मानीय, विसर्ग और शर प्रत्याहार के वर्ण श्वासानुप्रदान तथा अघोष होते हुए कण्ठ को विवृत करते हैं। अर्थात् इनके विवार-श्वास-अघोष बाह्य यत्न (अनुप्रदान) हैं। इन से बचे हुए शेष व्यज्जन हश् प्रत्याहार में आते हैं। उन के यम, हशू् प्रत्याहार के वर्ण - घोष, संबृत तथा नादभागी होते हैं। इन के प्रयत्न संवार -नाद-घोष हैं। वर्णों तथा यमों में जो अयुग्म (प्रथम, तृतीय, पज्चम ) होते हैं, उन्हें तथा यण् प्रत्याहार के व्यज्जनों को अल्पप्राण कहा गया है। परिशेषात् वर्गों और यमों के युग्म (वर्णीय द्वितीय-चतुर्थ ) और शल् प्रत्याहार के व्यज्जन महाप्राण होते हैं।
इस का विवरण भी वहीं दिया गया है - वर्गों के प्रथम-द्वितीय खयू, उन्हीं के यम, जिह्ामूलीय, उपध्मानीय, विसर्ग और शष स - इन के बाह्य यत्न विवार- श्वास - अघोष हैं। इन से जो शेष रहें, उनके संवार -नाद-घोष प्रयत्न हैं। इन में वर्गों के तृतीय -चतुर्थ - पज्चम, हयवरल तथा तृतीय-चतुर्थ -पज्वम यम आते हैं। वर्गों के प्रथम-तृतीय -पञज्वम और प्रथम-तृतीय यम तथा यर ल व अल्पप्राण हैं। वर्गों के द्वितीय-चतुर्थ वर्ण, उन के यम तथा शष स ह महाप्राण हैं।
लघुकौमुदीकार ने सरलता के लिए इस प्रकार कहा है -
खर्प्रत्याहार के वर्णों के विवार - श्वास -अधघोष प्रयत्न हैं। हश् प्रत्याहार के व्यज्जनों के संवार -नांद-घोष प्रयत्न होते हैं। वर्णों के प्रथम-तृतीय-पजञ्चम तथा यणू् प्रत्याहार के वर्ण अल्पप्राण हैं। वर्गों के द्वितीय-चतुर्थ तथा शल् प्रत्याहार के वर्ण महाप्राण हैं।
यहाँ वेदमात्र के लिए उपयोगी यमों की गणना नहीं की गयी है। शेष बचे अयोगवाह खर् प्रत्याहार के वर्णों के अन्त्नर्णत आ जाते हैं, इसलिए उन का अनुप्रदान विवार - श्वास - अघोष
५ नर कलनी जौ“ आ “७ ज्््
पाणिनीयशिक्षा / ६२
है। इन अयोगवाहों ( अनुस्वार, विसर्ग, जिह्ाामूलीय, उपध्मानीय ) का पाठ शर्- प्रत्याहार में किया गया है, इसलिए इन का महाप्राणत्व भी है यह जानना चाहिए | ३६ %, ।।
गोधमितत् प्रचक्षते | दाक्षीपुत्रपाणिनिना येनेदं व्यापितं भुवि | ।४०। ।
एतत्ल्शिक्षाशास्रम्ू, आचार्या3, गो8--वाच३, धामन-पदस्थानं प्रकाशं वा प्रचक्षतेःआमनन्ति, पश्यन्ति वा। येन हेतुना, विशेषतः दाक्षीपुत्रपाणिनिना भुवि>-भूलोके, इदं शास्त्र व्यापितम्-प्रसिद्धि नीतम् |
दक्षस्यापत्यं स्त्री दाक्षी यस्य माता, पणिनो गोत्रापत्यं पाणिनो यस्य पिता
सो5सौ शिक्षाग्रन्थं भुवि प्रख्यापयाम्बभूवेति स्वपित्रोर्महिम्ना ग्रन्थमहिमानमुद्बधलयामास | |४०। |
इस शिक्षाशाखत्र को आचार्यों ने वाणी का पदस्थान अथवा प्रकाश - स्वरूप स्वीकार किया है। इसी कारण विशेषत8 दाक्षीप्रुत्न पाणिनि ने इस शाख्र को प्रसिद्धि प्रदान की |
दक्ष की पुत्री दाक्षी जिस की माता है, पणि का गोत्रापत्य पाणिन जिस का पिता है, उस पाणिनि ने इस शिक्षाशाख्र को भूमण्डल में प्रसिद्ध किया - यह कह कर ग्रन्थकार अपने माता-पिता की महिमा के कारण स्वप्रणीत ग्रन्थ की महिमा का सड्केत करते हैं | | ४०। |
छन्द8 पादो तु वेदस्य हस्तो कल्पो5थ पठयते | ज्योतिषामयन चक्षु्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते | | ४१। |
शिक्षा प्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् | तस्मात् साडइमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते | ।॥४२। ।
ननु शिक्षाशासत्राध्ययनेन क३ पुरुषार्थ: सिध्येत्? अपुरुषार्थत्वे च
शिक्षाया३, वेदं विहाय किंकृते तद््ग्रहणायोद्यम8 ? इति प्रत्यवतिष्ठमानं क्लिष्टवेदवादिनं प्रत्याचक्षाण प्राह च्छन्द इति | ब्राह्मणेन /निष्कारणं वडक़े वेदो5ध्येयो ज्ञेवश्च /
इति श्रुते्दशतयी विद्यानामध्येतव्या भवति - चत्वारो वेदाः षट च
तदक्लनि। तत्र वेदाड्लेषु शिक्षान्यतमत्वं भजति। तथा हि, छन्द४शासखत्र॑ वेदस्य
दाह बककपकयकनक4न क्ककजक्कक दचच५
पाणिनीयशिक्षा / ६३
पादौ, तस्मादृते न ऋछचवां गति१ साधुतां लभेत। धर्म - जृह्य - श्रौत - शुल्बसूञ्रभेदेन कल्पो नाम वेदस्य हस्तौ पठ्यतेःआम्नायते, न हि पार्णि विना
कर्म साधयितुं प्रभवेत् । ज्योतिषामयनम॒च्ग्रहनक्षत्रगतिज्ञापकं ज्योतिषं वेदस्य चक्षु३, तद् विहायान्ध इव वेदेषु भ्राम्येत्। निरुक्त वेदस्य श्रोत्रं भवति, तद् विना श्रुतो5पि वेदः खलु अश्रुत एव स्यात्, सार्थकवेदग्रहणाभावात् | शिक्षा वेदस्य प्राणमू, तस्या अपुरस्कारेण वर्णनिष्पत्तिरूपो गन्धो5पि न जुह्नेत | व्याकरणं च वेदस्य मुखम्, तद् विना कि कथमुच्येत ? तस्मात् साडूं वेदमधीत्यैव ब्रह्मललोके महीयते पूज्यते। निरड्ुस्य हि न स्वरूपलाभ इति । |४१-४२। |
प्रश्न उपस्थित होता है कि शिक्षाशाखत्र के अध्ययन से कौन-सा पुरुषार्थ सिद्ध होगा 2 यदि शिक्षा का फल पुरुषार्थ -प्राप्ति नहीं हैं तो फिर वेद को छोड़ कर शिक्षाशाख्र के अध्ययन का यत्न क्यों किया जाय ? इस शड्ूग को उपस्थित करने वाले क्लिष्ट-वेदवादी को उत्तर देते हुए ग्रन्थकार इन दो कारिकाओं को प्रस्तुत करते हैं।
' ब्राह्मण को बिना किसी प्रयोजन के छहों अड्डों सहित वेद का अध्ययन करना और उसे जानना चाहिए '- इस श्रुति के अनुसार दस विद्याएँ अध्येय होती हैं - चार वेद और छह बेदाड़ः। उन वेदाड़ों में शिक्षा एक है। छन््द४शाख्र वेद के चरण हैं, उन के बिना मनन््त्रों की गति ठीक नहीं हो सकती। धर्म, गृह्य, श्रीत और थुल्ब सूत्रों के भेद वाले कल्प को वेद के दोनों हाथ माना गया है। हाथ के अभाव में कोई कर्म सिद्ध नहीं किया जा सकता। ग्रहों - नक्षत्रों की गति को बतलाने वाले ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है, क्योंकि उस के ज्ञान के बिना कोई भी व्यक्ति वेदों में एक अन्धे के समान भटक सकता है। निरुक्त वेद का कान है, उस के जाने बिना सुना गया वेद भी न सुने के तुल्य ही है, क्योंकि निरुक्त ही वेदमन्त्रों के अर्थज्ञान का आधार है। शिक्षा वेद की नासिका है। यदि वह न हो तो वर्णनिष्पत्तिरूप गन्ध का ग्रहण भी नहीं हो सकता। व्याकरण वेद का मुख है, जिस के बिना कुछ भी कैसे कहा जा सकता है ? इसलिए साइड वेद का अध्ययन कर के ही ब्रह्मलोक में पूजित होता है ।* | ।|४१-४२। ।
(६) उदात्तमाख्याति वृषो5डजुलीनां प्रदेशिनीमूलनिविष्टमूर्धा । उपान्तमध्ये स्वरितं ध्रृतं च कनिष्ठिकायामनुदात्तमेव | |४३। ।
# यहाँ कुछ लोग ' अधीत्येव ' पाठ मान कर ' अधीती+एव ' पदच्छेद करते हैं। तदबुसार साडुः वेद का अधीती ही पूजाभाजन होता है।
$ तमातत् का +. करार कक पा कान अनतातकफ- >> है ह*-5 ५५ च्क + हर 4३७.) | कबक- न >> दा | रे ६ ह कै क्र > साधक: अत लन् कि मम
पाणिनीयशिक्षा / ६४
उदात्तं प्रदेशिनीं विद्यात् प्रचयं मध्यतो5डजुलिम् | निहत॑ तु कनिष्ठिक्यां स्वरितोपकनिष्ठिकाम् | ।४४। |
सामवेद ऋचामुच्चारणेन साकमड॒णुष्ठ8 कार्यकारी भवति। तत् कथम् ? श्रूयताम् | प्रदेशिन्यास्तर्जन्या मूले निविष्ट४ स्थापितो मूर्धाउग्रभागो यस्य सो5ड्गुलीनां वृषो5ड्गुष्ठ उदात्तमाख्याति सूचयति। उपान्ते5नामिकामूले निविष्टमूर्धा3ड्गुष्ठट.. स्वरितमाख्याति तथा मध्येन-मध्यमाडणुलिमूले निविष्टमूर्धासा धृतम्-प्रचयम्--एकश्रुतिस्वरमाह | कनिष्ठिकायां तन्मूले निविष्टमूर्धा सो5नुदात्तमेव सूचयति | तदित्थम् - - प्रदेशिनीमुदात्तं, मध्यतो5ड्ग्लिं प्रचयं, कनिष्ठिक्यां निहतं, स्वरितं तूपकनिष्ठिकां विद्यात्। उदात्तस्य तर्जनी, प्रचयस्य मध्यमा, अनुदात्तस्य कनिष्ठिका, स्वरितस्य च मध्यमेति अड्गुष्ठमूर्ध्ना धृतेन सूचर्यन्ति | सूच्यसूचकयोरभेदोपचारेण मूले तथा प्रयोग8 कृत३ | ' अम्रिमीके ' इत्युदाहरणम्। तत्र ' अ ' इत्यनुदात्तस्योच्चारणक्षणे कनिष्ठामूले5ड्गुष्ठाग्रं निविशनीयम् | ' इ' इत्युदात्तस्योच्चारणे तर्जनीमूले, | ई ' इति स्वरितोच्चारणे त्वनामिकाया मूले, ' ए' इति प्रचयस्योच्चारणे मध्यमाया मूले5ड्गुष्ठनिवेश8 कार्य8 | इयं सामगाने हस्तप्रयोगसरणि३ | | ४३-४४। ।
सामवेद में ऋचाओं के उच्चारण के साथ ही अँगूठा कार्य करता है। वह कैसे ? प्रदेशिनी अर्थात् तर्जनी अँगुली के मूल में अग्रभाग को स्थापित किये जाने पर अँगुलियों का वृष अर्थात् अड्गुष्ठ उदात्त स्वर को सूचित करता है। अँगूठे का अग्रभाग अनामिका के मूल को स्पर्श करने पर स्वरित स्वर को बतलाता है। वह जब मध्यमा अँगुली के मूल पर स्थापित होता है तो प्रचय अर्थात् एकश्रुति-स्वर को सूचित करता है। कनिष्ठिका के मूल में स्थित होने पर । अनुदात्त का बोध कराता है। इस प्रकार अँगूठे के अग्रभाग से युक्त हो कर तर्जनी उदात्त स्वर की, मध्यमा प्रचय या एकश्रुति की, कनिष्ठिका अनुदात्त की और अनामिका स्वरित की सूचक होती है। सूच्य - सूचक में उपचारवृत्ति से अभेद मान कर मूल कारिका में वैसा प्रयोग किया गया है। न् | उदाहरण है - ' अग्रिमील्ठे | यहॉाँ' अ' इस अबुदात्त स्वर के उच्चारणकाल में अड्गुष्ठाग्र क्
धरम सारा नाक पका 2५
कनिष्ठा के मूल में रखना चाहिए। ' इ' इस उदात्त स्वर के उच्चारण में तर्जनी के मूल में,
' ई ' इस स्वरित के उच्चारण में अनामिका के मूल में, ' ए ' इस प्रचय के उच्चारणकाल में अड्गुष्ठाग्र मध्यमा के मूल में रखना चाहिए। यही सामगान में हस्तप्रयोग की विधि है। ।।४३-४४। |
2००००»
पाणिनीयशिक्षा / ६५
अन्तोदात्तमाथ्ुदात्त -
मुदात्तमनुदात्तं नीचस्वरितम् |
मध्योदात्तं स्वरितं क् द्व्युदात्तं अचद्युदात्तमिति नव पदशय्या | ।४५। |
त्रिभि३ स्वरैरुदात्तानुदात्तस्वरिति॥ पदशय्या-पदस्य स्वरूपविशेषावस्था संवर्ते। सा च नवच्नवविधा भवति। किजञ्चित्पदमन्तोदात्तम्, किज्चिदाद्युदात्तमू, किज्चिदुदात्तमू, किज्चिदनुदात्तमू, . किज्चिन्नीच - स्वरितम्”-अनुदात्तस्वरितम्, किज्चिन्मध्योदात्तम्ू, किज्वित् स्वरितम्, किज्चिद् दृव्युदात्तमू, किज्चित् प्रुनस्त्र्युदात्तमिति | |४५ | |
उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित - इन तीन स्वरों से पद की स्वरूप -विशिष्ट अवस्था हो जाती है। वह अवस्था नौ प्रकार की है। (१)अन्तोदात्न (२) आश्युदात्त (३ ) उदात्त (४)अनुदात्त (५) नीचस्वरित [ अनुदात्तस्वरेित ] ( ६)मध्योदात्त (७) स्वरित (८) द्व्युदात्त (६ ) तऋद्युदात्त । । ७५। |
तेषामुदाहरणानि -
अम्रि8 सोम8 प्र वो वीर्य हविषां स्वर्बृहस्पतिरिन्द्राब॒हस्पती ।
इन के उदाहरण हैं अग्रि8 सोम8 प्र वो वीर्य ह॒विषां स्वर्बृहस्पतिरिन्द्राबृह॒स्पती ।
नवानामेतेषां स्वरविचितिर्यथा -
इन नौ भेदों का स्वर-विवेक इस प्रकार है -
अम्निरित्यन्तोदात्तं सोम इत्याद्युदात्तम् | प्रेत्युदात्तं व इत्यनुदात्तं वीर्य नीचस्वरितम् | | ४६ । ।
पाणिनीयशिक्षा / ६६
हविषां मध्योदात्त॑
स्वरिति स्वरितम् |
बृहस्पतिरिति दृव्युदात्त -
मिन्द्राबृहस्पती इति तच्युदात्तम्। | ४७। |
(१)' अगि गतौ ' धातो8 ' अज्लेनलोपश्च ' इत्युणादिसूत्रेण ' नि प्रत्यये कृते ' अग्नि ' शब्दस्य निष्पत्ति१। तत्र ब्युत्पत्तिपक्षे आद्ुदात्तश्च (पाणिनीयशिक्षासूत्रम् ३. १. ३) . यूत्रेण प्रत्ययस्वरस्येकारस्योदात्तत्वे ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् (तत्रैव ६. १. १५८)' इत्यकारस्यानुदात्तत्वे ' अग्निई इत्यन्तोदात्तं पदं भवति। अव्युत्पत्तिपक्षे तु' फिषो5नत उदात्त३ (फिद्सूत्र १.१) ' इत्यन्तोदात्तता |
(२) 'षुज् अभिषवे' धातो& ' आर्तिस्तुसुहुसृधृक्षिक्षुयावापदियक्षिनी भ्यो मन् ' इत्युणादियूत्रेण ' मन् ' प्रत्यये कृते ' सोम ' शब्दस्य निष्पत्ति8। तत्र व्युत्पत्तिपक्षे प्रत्यस्य नित्त्वात् ' जित्यादिनित्यम् (पाणिनीयशिक्षासूत्रम् ६. १. १६७) ' इति सूत्रेणाद्युदात्तता। अव्युत्पत्तिपक्षे तु ' वृषादीनां च ( तत्रैव ६ १. २०३)*' इति आद्ुदात्तत्वे, ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् _ इति मकारा - कारस्यानुदात्तत्वे ' उदात्तादनुदात्तस्य स्वरित४ ' इति स्वरितत्वे ' सोम8 इति भवति। इदं पदमाद्युदात्तम् |
(३) ' प्र ' इति' निपाता आश्ुदात्ता8 ' इति फिट्सूत्रेणोदात्त 8 |
(४) ' व४' इति ' अनुदात्तं सर्वमपादादौ ' (तत्रैव ८. १. १८) इति सूत्नेणानुदात्तता ।
(५)' वीर विक्रान्तौ' धातो१' ण्यत्' प्रत्यये कृते वीर्य शब्दस्य सिद्धि३ | तत्र व्युत्पत्तिपक्षे ' तित्स्वरितम् (पाणिनीयशिक्षासूत्रम् ६, १. १८५५) इति सूत्रेण प्रत्ययस्वरः स्वरितः। ईकारस्य च ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् इत्युक्तसूत्रेणानुदात्तता | अव्युत्पत्तिपक्षे वा' बिल्वभक्ष्यवीर्याणि च्छन्दसि इति फिट्सूत्रेणान्तस्वरितत्वम्। ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतर8 (तत्रैव १. २. ४०) इति ' ईकार8 ' सन्नतर४ल्-अनुदात्ततर४-नीचतर8। इल्ानुदात्तो
पाणिनीयशिक्षा / ६७
नीच इत्यनर्थान्तरम् | इत्थं च॒ ' वीर्यम् ” इति नीचस्वरितं पदम् ।
> (६) हु दानादनयो8 ' धातो8 ' अर्चिशुचिहुसृपिच्छदिच्छर्दिभ्य इसि॥३ ' इत्यौणादिक इसि - प्रत्यये ' हविष् ' इत्यस्य निष्पत्ति। तत्र च' आशध्ुदात्त - श्व इति पाणिनीयसूत्रेण व्युत्पत्तिपक्षे प्रत्ययेकारस्योदात्तत्वम् | अव्युत्पत्तिपक्षे च फिषो5न्त उदात्त४ ' इति फिद्सूत्रेणान्तोदात्तत्वेनेकार उदात्तः/ | तत$ षष्ठीबहुवचने ' आम्' विभक्तौ ' हविषाम् ' इति पदम्। तत्र' अनुदात्तौ सुप्पितौ (तत्रेव ३. १. ४) ' इति विभक्तिस्वरस्यानुदात्तत्वम्। हकाराकारस्य चोक्तसूत्रेण ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' इत्यनेनानुदात्तत्वे ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतर£ इल्युक्तसूत्रेणानुदात्ततरत्वे विभक्तेराकार४ ' उदात्तादनुदात्तस्य
स्वरितः (तत्रैव ८. ४७. ६६) इत्यनेन स्वरितत्वम्। तथा च' ह॒विषाम् ' इति मध्योदात्तं पदं निष्पद्यते | (७) ' स्व३$' इत्यव्ययपर्द' न्यड्सस्वरी स्वरितौ' इति फिट्सूत्रेण स्वरितम् | (८) बृहस्पतिरिति दृब्युदात्तम्। ' उभे वनस्पत्यादिषु युगपत् ' ( 78 १४० ) इत्यनेन समासघटक पदढद्वयं प्रकृतिस्वरेण दृव्युदात्तं तिष्ठति। अनेनैव
सूत्रेण बृहच्छन्द आद्युदात्तो निपात्यते। * पत्यावैश्वर्य '(६. २. १८) पाणिनिसूत्रेण पतिशब्द आद्ुदात्त;।। ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' इति शैषयोरनुदात्तत्वम्, तत्र तकारेकारस्य ' उदात्तादनुदात्तस्य स्वरित३ ' इति स्वरितत्वम्, हकाराक़ारस्य' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतर९ ' इत्यनुदात्ततरत्वम् | तथा च बृहस्पति ' इति दृब्युदात्तं पदम् ।
(६) ऋजेन्द्राग्रवजविप्र० ' इत्याद्यौणादिकेन इन्द्रशब्दो ' रन् ' प्रत्ययान्त 8
ज्नित्यादिनित्यम् '* इति पाणिनीयसूत्रेण व्युत्पत्तिपक्ष आश्वुदात्त8 | अव्युत्पत्तिपक्षे तु ' वृषादीनां च ' इत्यनेनाुदात्तः । इन्द्रश्च बृहस्पतिश्चेति इन्द्दे कृते ' देवताद्नन्द्दे च' ( पासू ६.२.१४१) इति उभयपदप्रकृतिस्वरेण इन्द्राबृहस्पती ' इति त््युदात्तं पदम्। शेषं बृहस्पतिवत् | |४६-४७। ।
(१) अगि गतौ ' धातु से ' अड्ले्नलोपश्च ' इस उणादि सूत्र द्वारा ' नि' प्रत्यय किये जाने पर ' अग्नि ' शब्द निष्पन्न होता है। यहाँ यदि व्युत्पत्तिपक्ष को आधार बनाया जाय तो _आद्युदात्तश्च' (पासू ३. १. ३ ) सूत्र द्वारा प्रत्यय स्वर इकार का उदात्तत्व होने पर, अबनुदात्तं पदमेकवर्जम् '(पासू ६. १. १५८) यूत्र से इकार का अनुदात्तत्व होने पर ' अग्रि8 ' पद अन्तोदात्त हो जाता है। अव्युत्पत्तिपक्ष में ' फिषो5न्त उदात्त३ ' ( फिट्सूत्र १. १) के आधार पर अन्तोदात्तता बनती है।
पाणिनीयशिक्षा / ६८
(२) ' षुज् अभिषवे ' धातु से ' अर्तिस्तुसुहुयृध्ृक्षिक्षुयावापदियक्षिनी भ्यो मन् ' इस उणादि यूत्र से ' मन् ' प्रत्यय करने पर ' सोम ' शब्द की निष्पत्ति होती है। यहाँ व्युत्पत्तिपक्ष लें, तो प्रत्यय नित् है इसलिए ' अित्यादिनित्यम् ' (पासू ६.१ .१६७) यूत्र से आद्युदात्तता होगी । अव्युत्पत्तिपक्ष में ' वृषादीनां च ' (पासू ६ .१.२०३) यूत्र से आश्युदात्त होने पर, अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' से मकार का अबुदात्तत्व होने पर, ' उदात्तादनुदात्तस्य स्वरित8 ' से स्वरितत्व होने पर ' सोम४ ' रूप बनता है। यह पद आद्ुदात्त है।
(३) 'प्र' यह पद' निपाता आद्युदात्ता8 ' इस फिट्यूत्र से उदात्त है।
(४) 'व४ ' पद की ' अनुदात्तं सर्वमपादादी ' (पायू ८.१.१८) के आधार पर अनुदात्तता है। ।
(५) ' वीर विक्रान्तौ ' धातु से ' ण्यत् ' प्रत्यय किये जाने पर ' वीर्य ' शब्द सिद्ध होता है। यहाँ व्युत्पत्तिपक्ष में' तित् स्वरितम् ' (पासू ६.१.१८५ ) यूत्र से प्रत्ययस्वर स्वरित है। 'अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' यूत्र से ईकार की अनुदात्तता है । अव्युत्पत्तिपक्ष में बिल्वभक्ष्यवीर्याणि च्छन्दसि ' फिट्सूत्र से अन्तस्वरितत्व है। ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतर४ (पासू १.२ .४० ) के आधार पर ईकार अबुदात्ततर अथवा नीचतर है। यहाँ अनुदात्त और नीच एक ही अर्थ रखते हैं। इस प्रकार ' वीर्यम्' यह नीचस्वरित पद है।
(६) ' हु दानादनयो# ' धातु से ' अर्चिशुचिहुसूपिच्छदिच्छर्दि भ्य इसि४ ' सूत्र से उणादि प्रत्यय ' इसि ' होने पर ' हविष् ' रूप बनता है। व्युत्पत्तिपक्ष में आद्युदात्तश्च ' इस पाणिनीय यूत्र से प्रत्यय के इकार की उदात्तता है। अव्युत्पत्तिपक्ष में ' फिषो$5न्त उदात्त४8 ' इस फिद्सूत्र से अन्तोदात्त होने के कारण इकार उदात्त है। तब षष्ठी बहुवचन में ' आम् ' विभक्ति होने पर ' हविषाम् ' पद बनता है। इस पद में ' अनुदात्तौ सुप्पिती' (पासू ३ .१.४) से विभक्ति- स्वर का अनुदात्तत्व है। हकार के अकार का पूर्वोक्त सूत्र ' अबुदात्तं पदमेकवर्जम् ' से अनुदात्तत्व होने पर, ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतर४ ' सूत्र से अनुदात्ततरत्व होने पर, विभक्ति का आकार ' उदात्तादनुदात्तस्य स्वरित४' (पायू ८-४.६६) से स्वरित हो जाता है। इस प्रकार ' हविषाम् ' यह मध्योदात्त पद निष्पन्न होता है।
(७) ' स्व8 ' यह अव्ययपंद है जो ' न्यड्स्वरौ स्वरितौ ' इस फिद्यूत्र से स्वरित है।
(८) ' बृहस्पति ' द्व्युदात्त पद है। ' उभे वनस्पत्यादिषु युगपत् ' (पासू ६.२ . १४० ) सूत्र-से समास के घटक दोनों पद प्रकृति-स्वर के कारण दृब्युदात्त हैं। इसी यूत्र से ' बृहत् शब्द आद्ुदात्त है। ' पत्यावैश्वर्य ' (पासू ६.२ १८) के आधार पर पति शब्द आद्ुदात्त है। ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' से दोनों शेष पदों का अनुदात्तत्व है, उन में तकार का इकार उदात्तादनुदात्तस्य स्वरित8 ' से स्वरित है। हकार का अकार ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतर8 से अनुदात्ततर है। इस प्रकार ' बृहस्पति$ ' दृव्युदात्त पद है।
(६) इन्द्र ' शब्द ' ऋजेन्द्राग्रवजविप्र० ' इत्यादि उणादि सूत्र से ' रन् ' प्रत्ययान्त है। व्युत्पत्तिपक्ष में यह पद ' ञअित्यादिलनित्यम् ' पाणिनीय यूत्र के आधार पर आध्रुदात्त है। अव्युत्पत्तिपक्ष लेने पर ' वृषादीनां च' यूत्र से आद्युदात्त है। ' इन्द्रश्च बृहस्पतिश्च ' ऐसा द्वन्द्व समास करने पर ' देवताद्वन्द्दे च' (पासू ६.२ १४१) के अनुसार उभयपद प्रकृति - स्वर से ह इन्द्राबृह॒स्पती ' इस प्रकार तचद्युदात्त पद बनता है। शेष नियम ' बृहस्पति ' के समान ही हैं | |४६-४७। ।
पाणिनीयशिक्षा / ६६
अनुदात्तो हृदि ज्ञेयो मूर्ध्न्युदात्त उदाहत३ | स्वरित8 कर्णमूलीय8 सर्वास्ये प्रचय8 स्मृत४ | |४८। ।
केचिद् व्याचक्षते - हृदि कर कृत्वानुदात्त३, मूर्धदेशे करं कृत्वोदात्त३, कर्णमूले कर कृत्वा स्वरित४ , सर्वमुखसमीपदेशे कर कृत्वा प्रचयस्वर उच्चार्य इति।
हस्तचालनस्येयं माध्यन्दिनी रीतिः स्यात्। परन्तु सप्तमाष्टम - कारिकयोर्यदुक्तं तेन समन्वयं कृत्वैवापरे व्याचक्षीरन्। सर्वास्ये कथं
हस्तचालनं क्रियेत ? अभिनवगुप्तपादाचार्येणोक्तम् -
स्थानत्रयस्यप्रत्येकनूध्वाधोमध्यकल्पनयोदात्ाकुदा/त्तस्कारितकम्पितनिगल्यित् / (अभिनवआरती 979. 99२)
ऊर्ध्वभागे निष्पन्नो 5जुदात्त इति मूर्धन्यत्वमुदात्तस्य, अधोभागे निष्पन्नत्वाद् हृदिस्थो5नुदात्त४ , कर्णमूलं तु तयोरम॑ध्यस्थ३ कण्ठविवरं तञ्जन्य एव स्वरित१, प्रचयस्तु सर्वमास्यविवरं व्याप्रोतीति तात्पर्यम् | तत्र प्रचयश्रवणविषये विशेष३ -
स्वर्तादबुदात्तानों परेषों प्रचय? स्वर/ / उद्ात्तछतितों कान्ति एक द्वे गा बल्लनि ढा/ ( ऋग्वेदफ्रातिशाख्यम २. 96 )
इत्युदात्तश्रुतय एव प्रचया8 | स्वरितात् परेषामनुदात्तानां प्रचयत्वमिति |
वस्तुतस्तूभयथा व्याख्या सम्भवति। पूर्व व्याख्यानं शिक्षेव समर्थयति - : हस्तेन वेदं यो5धीते ' इत्यादि (५५) ।
' सर्वास्ये प्रचय8 ' इत्यस्यायमर्थ8 स्यात् - समग्र॑ मुखाकारमभिलक्ष्य प्रचयोच्चारकाले हस्तं चालयेदिति | |४८। ।
कुछ लोग इस प्रकार व्याख्या करते हैं कि हृदय -स्थान में हाथ कर के अबुदात्त का, मूर्धा - प्रदेश में हाथ कर के उदात्त का, कर्णमूल में हाथ कर के स्वरित का तथा सारे मुख के समीप हाथ कर के प्रचय स्वर का उच्चारण करना चाहिए।
शुक्ल - यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा के अनुसार हस्तचालन की यह रीति सम्भव है। परन्तु पाणिनीयशिक्षा की सातवीं और आठवीं कारिकाओं में जो कहा गया है, उस के आधार पर समन्वय करते हुए अन्य लोग व्याख्या करते हैं। सारे मुंख में हस्तचालन कैसे हो सकता
द द द *. पाणिनीयशिक्षा / ७०
है? नाट्यशास्र ( १७.११२) पर अपनी व्याख्या अभिनवभारती में आचार्य अभिनवगुषप्त कहते हैं -
' तीनों स्थानों (मूर्धा, हृदय और कर्णमूल ) में प्रत्येक स्थान के ऊर्ध्व, अध३ और मध्य भाग को कल्पित कर ददात्त, अनुदात्त, स्वरित एवं कम्पित की व्यवस्था जाननी चाहिए। '
तात्पर्य यह है कि ऊर्ध्वभाग से निष्पन्न स्वर उदात्त होने के कारण उदात्त का मूर्धन्यत्व तथा अधोभाग से निष्पन्न स्वर अबुदात्त होने के कारण अबुदात्त का हृदिस्थत्व स्पष्ट है। कर्णमूल इन दोनों (मूर्धा एवं हृदय) के बीच में स्थित कण्ठविवर है। स्वरित वहीं से जन्म लेता है। प्रचय स्वर सारे आस्यविवर को व्याप्त करता है। ऋग्वेदप्रातिशाख्य (३ १६) में प्रचय स्वर के श्रवण के विषय में विशेषत४ बताया गया है कि स्वरित स्वरों के पश्चात् आने वाले अनुदात्तों का प्रचय स्वर हो जाता है। उन की श्रुति उदात्त हो जाती है; वे एक, दो या बहुत हो सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि प्रचय की श्रुति उदात्त ही होती है। स्वरित के परवर्ती अबुदात्त प्रचय हो जाते हैं।
वस्तुत४ इस कारिका की व्याख्या दोनों ही प्रकार से की जा सकती है। पहली व्याख्या का समर्थन आगे आने वाली कारिका ' हस्तेन वेदं यो5धीते' (५५ ) से हो जाता है। ' सर्वास्ये प्रचय४ का अभिप्राय यह हो सकता है कि प्रचय स्वर के उच्चारण - काल में सारे मुखाकार को लक्षित कर हस्तचालन किया जाना चाहिए | |४८। |
(१०) चाषस्तु वदते मात्रां द्विमात्र॑ त्वेव वायस8 | शिखी रौति त्रिमात्र॑ तु नकुलस्त्वर्धमात्रकम् | ।४६। |
मात्राकालज्ञानाय प्रस्तौति - चाषस्त्विति। चतुर्णा तिरश्चां रुतानि सम्भूय मात्राकालं ज्ञापयितुं प्रभवन््तीति भावः। चाषो नीलकण्ठो मात्रां वदति। वायस8 काको द्विमात्रं दीर्घ त्वेव वदति। शिखी मयूरसित्रमात्र॑ प्लुतं रौति। नकुलस्तु पुनरर्धमात्रक व्यज्जनकालमुच्चारयति। तदेव॑ मात्राज्ञान - पूर्वकमेवोच्चारणीयमिति भावः | ॥४६। |
मात्रा की कालगणना प्रदर्शित करने के लिए यह कारिका प्रस्तुत की गयी है। चार मानवेतर प्राणियों के शब्द मिल कर मात्रा के उच्चारणकाल को बता सकते हैं। नीलकण्ठ एक मात्रा का उच्चारण करता है। कौआ दो मात्राओं को बोलता है अर्थात् केवल दीर्घ उच्चारण ही करता है। मयूर के प्लुत स्वर में तीन मात्राएँ हैं। नेवला आधी मात्रा अर्थात् केवल व्यञज्जन के उच्चारण काल का शब्द करता है। तात्पर्य यह कि इस प्रकार मात्रा -ज्ञान करने के अनन्तर ही उच्चारण करना चाहिए | ।४६। |
कुतीर्थादागतं दग्धमपवर्ण च भक्षितम् | न तस्य पाठे मोक्षो5स्ति पापाहेरिव किल्बिषात् | ।५०। |
पाणिनीयशिक्षा / ७१
साधुपाठेन पापान्मुक्तिश्चित्तशुद्धिवा भवति नासाधुपाठेनेत्याह - कुतीर्थादेति। यत् कुतीर्थादागतं यद् दग्धं॑ यदपवर्ण यघ्च भक्षितं ब्रह्मेत्युत्तरादाकृष्यते, तस्य ब्रह्मणो वेदस्य शब्दस्य पाठे पठितु४ किल्बिषात् पापाहेरिव मोक्षो नास्ति। यथा पापो दुष्ट? सर्पो यदि कण्ठं ग॒ह्लाति तदा मोक्षो न सम्भवी तथैव सदोषब्रह्मपाठिन8 किल्बिषादपराधात् प्रत्यवायरूपकलुषाद्
भ्रष्टीच्चारणजन्यमलाद् मुक्तिर्न सम्भवति। चतुर्धा ब्रह्मपठनं सदोषं भवति - (१) कुतीर्थादाचारहीनोपाध्यायादागतं जृहीतम्, (२) दग्धं नीरसं निरव - धानेनान्यमनस्केनोच्चारितमू, (३) अपवर्ण यथावद्दर्णस्वरूपरहितत्वेन
सन्दिग्धम् /असन्दिग्घान् स्वरानृ द्वयात् - ऋग्वेक्फ्रात्शिख्यम 3. २६ञ, (४) भक्षितं मध्ये मध्ये ग्रस्तम् , यथा इउसन्वों सन््ध्यवचनम् /तत्रेव १४? 4० /, यथा स इन्द्रः इत्यादौ सैन्द्र४ इत्युच्चारणम् । अथवा पापाहेगुृहे निवसतो यथा मुक्ति्न भवति, यदा कदा दृष्टिपयमवतरञ्नसौ भयं तनोति, पुनश्च गूढमास्ते तथात्मनि कृतवसते१ किल्बिषान्न मुक्तिरिति योज्यम् | |५०। |
साधु पाठ करने पर ही पाप से मुक्ति अथवा चित्तशुद्धि सम्भव है, असाधु पाठ करने पर नहीं। कुतीर्थ से आये हुए, दग्ध, अपवर्ण और भक्षित वैदिक शब्द का पाठ करने पर पाठक का मोक्ष सम्भव नहीं है। जैसे दुष्ट सर्प यदि गला पकड़ ले तो उस से छुटकारा सम्भव नहीं होता, उसी प्रकार दोषयुक्त वेदपाठ करने वाले की मुक्ति, भ्रष्ट उच्चारण से उत्पन्न होने वाले अपराधरुपी प्रत्यवाय से नहीं हो सकती। वेदपाठ चार प्रकार से सदोष हो सकता है - (१)कुतीर्थ अर्थात् आचारहीन उपाध्याय से ग्रहण किये जाने पर | (२ ) दग्ध अर्थात् अन्यमनस्क स्थिति में लापरवाही से उच्चारण किये जाने पर। (३ ) अपवर्ण अर्थात् किसी वर्ण के वास्तविक उच्चारण में सन्देहयुक्त होने पर | ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (३.२६) में आया है- असन्दिग्ध रूप से स्वरों का उच्चारण करे। (४) भक्षित अर्थात् बीच-बीच में निगल लिये जाने पर | ऋणग्वेदप्रातिशाख्य (१४.६० ) में इस का उदाहरण बताया गया है -' स इन्द्र8 ' के स्थान पर ' सैन्द्र४ ' उच्चारण करने में सब्धि का कथन न करना भक्षित है। इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है कि जिस प्रकार घर में रहने वाले दुष्ट सर्प से मुक्ति नहीं हो सकती, जब कभी दिखाई देने पर वह भय उत्पन्न करता है और फिर छिप जाता है, उसी प्रकार स्वयं में निवास करने वाले इन असाधु उच्चारणरूपी अपराधों से मुक्ति सम्भव नहीं है | ।५०। |
सुतीर्थादागतं व्यक्त स्वाम्नायं सुव्यवस्थितम् | सुस्वरेण सुवक्त्रेण प्रयुक्त ब्रह्म राजते | ।५१। ।
पाणिनीयशिक्षा / ७२
सुतीर्थात्_ सदुपाध्यायादागतमध्ययनेनाधिगतम्, व्यक्त स्पष्ट म्लेच्छनरहितम्, स्वाम्नायं सम्प्रदायानुगतं शाखत्रसम्मतम्, सुव्यवस्थितं प्रत्यक्षरं सुनिश्चितप्रयोगसम्पन्नम्, एवम्भूतं ब्रह्मल्वेदो मन्त्रः शब्दो वा, न सुस्वरेण वैस्वर्यरहितलयादिना, सुवक्त्रेण+ अविकृतमुखेन प्रयुक्त पठितं सद् राजते शोभते। इह लोके सभासु, अमुत्र च दिविषत्सु दीप्यते। न तादृश$ पाठ१ क्वापि तिरस्कारं लभत उपेक्षां वा। अथ श्रूयते - उत त्व/ पश्यनब् न ददर्श गाचमुत त्व/ एण्वन् न ९/णत्येन/मृ् / उले त्वस्मे तनवें िसस्ोे जायेब पत्य उश्ती सुगासा# // (ऋगवेदे) अपि चोवाच भारवि३ - विविक्ततणा+रणा सुख्ति।. अस/दयन्ती हृदयान्यपि (द्वेषाम् / प्रवतते नाक़तप्रण्यकर्मणों श्रसत्रणमीरपदा सरस्वती / /
कृतपुण्यता तावत् सैव यत् सौष्ठवेन वर्णोच्चारणं सम्पद्येतेिति | ।५१। |
सुतीर्थ से आगत अर्थात् श्रेष्ठ जुरु से सीखा गया, स्पष्ट, परम्परानुसारी शासत्र के अनुसार, सुव्यवस्थित अर्थात् प्रत्येक वर्ण के सुनिश्चित प्रयोग से सम्पन्न, मन्त्र या शब्द सुस्वर अर्थात् वैस्वर्य से रहित लय आदि पूर्वक तथा सुवक्त्र अर्थात् अविकृत मुख द्वारा प्रयुक्त होने पर (पढ़ा जाने पर ) शोभित होता है। वह पाठ इस लोक में सभाओं में तथा परलोक में देवताओं के बीच प्रकाशित होता है। वैसा साधु पाठ कहीं तिरस्कार या उपेक्षा का भागी नहीं बनता। वेद में आया है -
कोई इस वाणी को देखते हुए भी नहीं देखता और कोई इसे सुनते हुए भी नहीं सुनता। जब कि किसी के लिए यह वाणी स्वयं को उसी प्रकार प्रकाशित कर देती है, जिस प्रकार सुवासिनी पत्नी स्वयं को पति के सम्मुख उपस्थित कर देती है।
भारवि ने भी कहा है -
पृथक् - पृथक् चमकते वर्णों रूपी अलड्जारों से सज्जित, कर्णप्रिय, शत्रुओं के भी हृदयों को निर्मल करती हुई, प्रसन्न और गम्भीर पदों वाली सरस्वती उन पर कृपा नहीं करती, जिन्होंने पुण्य कर्म न किये हो।
पुण्यकर्मा जनों की कृतप्रुण्यता यही है कि वे भलीभाँति वर्णों का साधु उच्चारण करने मे समर्थ होते हैं । ।५१। |
मन्त्रो हीन8 स्वरतो वर्णतो वा
मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह | ह स वाग्वजो यजमानं हिनस्ति
यथ्ेन्द्रशत्रु8 स्वरतो5पराधात् | ।५२। |
पाणिनीयशिक्षा / ७३
वर्णच्चारणे शब्दोच्चारणे वा दोष आयाति चेत् का तर्दहि हानि8 स्यादित्याह दृष्टान्तेन - मन््त्रो हीन इति। स्वरतो हीन१-जत्रैस्वर्यसम्पत्तिरहित४, अथवा वर्णतों हीन४- साधूचारणविकलवर्ण8, समुच्चारणे क्ृतानवधानो मन्त्र किल मिथ्याप्रयुक्तो भवति। फलशून्यत्वादन््यथाफलप्रसवित्वाच्च मन्त्रस्य प्रयोगो मिथ्यात्वं वहति। कुत४ ? तमर्थ नाहरः यस्मै प्रयोजनाय मन्त्र8 प्रयुज्यते तत्पसूतये यो3र्थो5भिप्रेतस्तमर्थ नाह न ब्रूते न प्रकाशयति। ननु प्रयोगो निरर्थक एव स्यात्, फलप्रसवो मा भूत्, का हानिरिति चेन्न। विपरीतफलस्य सम्भवात्। अत४ स न मन्त्रो भवति प्रत्युत वाग्वज8 स्यात्। वागेव वज्ो वाग्वज8 किंवा वाग् बज इवेति वाग्वज8। तादृशो वाग्वजो यजमानं हिनस्ति | यथेन्द्रशत्रुशब्द/ स्वरत8 स्वरमात्रकृतादपराधात् बृत्रमेव जघान, नेन्द्रमिति |
अन्रेदमुपाख्यानम् _- इन्द्रेण त्वष्ठु8 पुत्रो विश्वरूपो जप्ते। क्रुद्धस्त्वष्टा पुरन्दरवधाय यागणमाभिचारिकं वितेने। तत्र ऋत्विग्भि३ ' इन्द्रशब्रुर्विवर्धस्व ' इति मन्त्रेणाहुतिर्दत्ता | मन्त्र तैराद्युदात्तता कृता येन बहुव्रीहिसमासे ' बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदम्' इति पूर्वपदप्रकृतिस्वरेण ' इन्द्र शब्द आद्युदात्त आस्ते। तथा च ' इन्द्र: शत्रु8 शातयिता (मारको) यस्य स$ इत्यर्थो भवति। अत एव यागाग्रेरुत्पत्नस्य वृत्रस्य घातक इन्द्रो बभूव | यदि ' इन्द्रस्य शत्रु; शातयिता इति षटष्ठीतत्पुरुषेण प्रयोग४ कृतो$भविष्यत् तर्डि बृत्र इन्द्रस्य शातयिता5 - भविष्यत्। तत्पुरुषे हि . समासस्य ' इति सूत्रेणान्तोदात्तता भवेत्। सा नर्त्विग्भिः कृतेति स्वरदोषाद् विपरीतं फलमजनिष्टेति | |५२। |
वर्ण अथवा शब्द के उच्चारण में दोष आ जाने पर क्या हानि होती है ? इसे एक उदाहरण दे कर समझाया गया है। उदात्त, अनुदात्त और स्वरित खबरों के प्रयोग से रहित अथवा सावधानी से उच्चारित न किया गया मन्त्र मिथ्याप्रयुक्त (व्यर्थ) हो जाता है। मन्त्र का मिथ्याप्रयुक्तत्व इस अर्थ में है कि जिस फल के लिए उस मन्त्र का प्रयोग हुआ है वह फल तो प्राप्त नहीं होता, उलटे विपरीत फल उत्पन्न हो जाता है। इसलिए वह मन्त्र नहीं अपितु वाग्वज बन जाता है। वह वाग्वज़ उसी प्रकार यजमान का नाश कर देता है, जैसे कि
इन्द्रशत्रु ' शब्द ने स्वरमात्र के अनुचित प्रयोग के अपराध से इन्द्र के स्थान पर वृत्र का ही
वध कर दिया था।
इस प्रसड़ की कथा इस प्रकार है -
इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का वध कर दिया। इस से क्रुद्ध हो कर त्वष्टा ने इन्द्र को मारने के लिए आभिचारिक यज्ञ का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ में ऋत्विजों ने ' इन्द्रशत्रु - विंवर्धस्व ' मन्त्र से आहुतियाँ दीं। पुरोहितों ने मन्त्र के उच्चारण को आद्युदात्त कर दिया। बहुव्रीहि समास में ' बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदम् ' के अनुसार पूर्वपद-प्रकृति स्वर के कारण ' इन्द्र ' शब्द आद्युदात्त होता है। तब अर्थ हो जाता है- ' इन्द्र जिस का शत्रु (मारक) है। ' यदि ' इन्द्र का शत्रु (मारक) ' ऐसा षष्ठी - तत्पुरुष का प्रयोग किया गया होता तो वृत्र इन्द्र
॥
है | | पाणिनीयशिक्षा / ७४ | [ “/*फरफफरससफफ कक कफ फ फफकफफफफफकस क ऑफसफफफअफ अईस जडनई ई ७ फद6 ईट तभखभ भ“त "खेत | । का मारक हो जाता। तत्पुरुष में ' समासस्य ' सूत्र से अन्तोदात्तता होती। ऋत्विजों ने वैसा प्रयोग नहीं किया इसीलिए स्वरदोष से विपरीत फल उत्पन्न हो गयां | |५२। |
अनक्षरमनायुष्यं विस्वरं व्याधिपीडितम्। अक्षता शखत्ररूपेण वजं पतति मस्तके | ५३। ।
उक्तमेवार्थ द्रढयत्नाहानक्षरमिति। अनक्षरं वर्णविवर्जितं पठितं मन्त्रस्वरूपं पठितारमनायुष्यमल्पायुष॑ करोति। तदेव विस्वरं विरुद्धस्वरयुक्त॑ पठितं पठितारं व्याधिपीडितं करोति। अथवानक्षरमनायुष्यं भवति, आयुषे हित - मायुष्यं, नायुष्यमनायुष्यम्। विस्वरं व्याधिपीडितं भवति, सा च पीडा न् पठितर्येव सम्भवतीति लाक्षणिक३ प्रयोग३, पाठ्यपाठकभावसम्बन्धेन चेय॑ लक्षणा, यथायुर्घृतमिति। इत्थंभूतं च पाठयं॑ मन्त्रस्वरूप॑ वर्जं वज़तुल्यं भवति, कि च अक्षतान व्याप्रुवता पाठकं समग्रतया स्ववशे कुर्वता शम्ररूपेण, तद् वजं पाठकस्य मस्तके पतति। तं विनाशयतीत्यर्थ३ | अक्षतेति । ' अक्षू व्याप्ती ' धातो$ शर्तरि तृतीयाया एकवचने रूपम् | अक्षति व्यप्रोतीत्यक्षत्, तेनाक्षता | मस्तके पतित४ खड़्गणो यथा सर्वाडि व्याप्रुवन् खण्डशश्छिनत्ति तथा दुष्ठ ...._ पाठो5पि। वजपातो यत्र क्वापि वृक्षादौ पतति तं समग्रतया परिव्याप्य दहति तथेति भाव४ | ।५३। |
यदि प्रयोक्ता द्वारा किसी मन्त्र का प्रयोग करते समय कोई वर्ण छोड़ दिया जाय तो वह पाठक की आयु को क्षीण कर देता है। विरुद्ध स्वर से पढ़ने पर उच्चारणकर्ता रोग से पीड़ित होता है। अथवा अनक्षर (वर्णत्याग) आयुहीन तथा विस्वर (विरुद्ध स्वर) व्याधिपीडित होता है। यह पीड़ा पढ़ने वाले (उच्चारणकर्ता ) में ही सम्भव है, अत8 इसे लाक्षणिक प्रयोग जानना चाहिए। इस लक्षणा का आधार पाठ्यपाठकभाव - सम्बन्ध है। जैसे ' आयुर्घृतम् ' में लक्षणा का आधार कार्यकारणभाव - सम्बन्ध है। इस प्रकार का अनक्षर तथा विस्वर मन्त्रस्वरूप वज के समान होता है जो पूरी तरह अपने वशीभूत करने वाले शखत्र के तुल्य हो, पाठक के मस्तक पर गिर कर उस का विनाश कर देता है।
_अक्षू व्याप्तौ ' धातु से शतृ प्रत्यय होने पर तृतीया विभक्ति के एकवचन में ' अक्षता' रूप बनेगा। जो व्याप्त करता है वह ' अक्षत् , उस के द्वारा ' अक्षता || े
जैसे मस्तक पर गिरने वाला खड़ सारे अड्डू को व्याप्त करता हुआ उस के टुकड़े - टुकड़े कर देता है, उसी प्रकार दोषयुक्त पाठ भी पाठक का विनाश कर देता है। जैसे वृक्षादि पर गिरने वाला वज (बिजली ) उसे चारों ओर से घेर कर जला देता है उसी प्रकार अनक्षर एवं विस्वर मन्त्रप्रयोग उच्चारणकर्ता को नष्ट कर देता है । | ५३।।
शरााार+मान+जाा+ननमयइमममभ मन. 3५८०» कनभान---ल्
पाणिनीयशिक्षा / ७५
हस्तहीनं च यो5धीते स्वरवर्णविवर्जितम् | ऋग्यजुश्सामभिर्दग्धो वियोनिमधिगच्छति | |५४। |
यो5ध्येता. हस्तहीनम्ृन्वाजसनेयशाखाध्यायी सन् यथावत् पाणिचालनरहितमू, सामण४ सन् वा5डुष्ठाडुलिसंयोगशून्यमू,. तथा स्वरवर्णविवर्जितमृज्त्रैस्वर्यविकलं वर्णानां यथावदुच्चारणरहितं चाधीते>पठति सो5ध्येता त्रिवेदीरूपाम्जिना दग्ध४ सन् वियोनिम्ृ*विकृतयोनिम्>तिर्यग्योनि नारकयोनि वाधिगच्छति प्राप्रोति। नासौ देवत्वं न वा मानुष्यकं लभत इति भाव३ |
साधुपाठ एव मनुष्यलक्षणम्। लक्षणहीनो नामासौ कथं साधीयसीं योनि लभेतेति यावत्। भगवता भर्त्हरिणा यद् व्याकरणमहिमानमुद्दिश्य जगौ तच्छिक्षाशासत्रविषये5पि जाघटीति -
इदमा्ं पदसस््कान /सिद्धिसपानपर्वणाम् / डयं सा मोक्षमापानामजिलाा राजपद्धाति। / /
इत्येवमसाधुपाठिन8 का मोक्षस्य वार्ता, मानुष्यकमपि तस्य दुर्लभमिति | |५४। |
जो वेद का अध्ययन करने वाला वाजसनेयिशाखाध्यायी होते हुए यथावत् स्वरानुसारी हस्तप्रयोग से रहित वेदपाठ करता है अथवा सामगानकर्ता होते हुए अड्डुष्ठ और अड्भुलि के यथावत् संयोग से रहित सामगान करता है तथा त्रैस्वर्य से शून्य एवं वर्णो का ठीक उच्चारण नहीं करता, वह अध्येता ऋण् -यजु४- साम इन तीनों वेदरूपी अग्रियों से जलाया जाता हुआ तिर्यक् योनि अथवा नारकीय योनि को प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि उसे देवत्व या मनुष्यत्व की प्राप्ति नहीं होती |
वर्णो का साधु पाठ करना ही मनुष्य का लक्षण है। लक्षणहीन होने पर वह उत्तम योनि को कैसे प्राप्त कर सकता है ? व्याकरण की महिमा बतलाते हुए भगवान् भर्तृहरि ने जो वचन कहा है, वह शिक्षाशासत्र के विषय में भी पूर्णरूपेण घटित होता है -
' यह (व्याकरणशासत्र ) सिद्धिरूपी नसेनी का पहला पदस्थान और मोक्ष का लक्ष्य प्राप्त करने की कामना रखने वालों के लिए सीधा राजमार्ग है। '
अत5 स्पष्ट है कि असाधु उच्चारण करने वाले के लिए तो, पुन४ मनुष्य का जन्म ही दुर्लभ है, तब उसके लिए मोरक्षप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं उठता | ।५४। |
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पाणिनीयशिक्षा / ७६ >- हस्तेन वेदं यो5धीते स्वरवर्णार्थसंयुतम् | क् ऋणग्यजुश्सामभि१ पूतो ब्रह्मलोके महीयते | |५५॥। । कि
यो5ध्येता स्वरवर्णार्थसंयुतं वेदं हस्तेनाधीते स ऋग्यजु१सामभि१ पूत४ सन् ब्रह्मलोके महीयते इत्यन्वय ९ ।
स्वरा उदात्तानुदात्तस्वरितप्रचयकम्पितरूपा;। वर्णा: शिक्षोक्त - समुच्चारणयुत३। अर्था३ शब्दप्रतिपाद्या3। तै? संयुतं वेदम्। न विस्वरं न सम्यगुच्चारणरहितवर्ण न वार्थानुसन्धानरहितं न वा खलुं हस्तसज्चाररहितं वेदमधीयान एव पुरुषो वेंदै8 पूतो भवति, स॒ एव चान्ते ब्रह्मलोके पूज्यत इति। ५ स्वराणां वर्णानां विषये बहूक्त शिक्षायामेव, तत्रापि स्वरविषये हस्तसज्चारमड्गुष्ठसज्चारं वा प्रतिपादितवान्। अर्थानुसन्धानपूर्वक एव पाठ8 क्रियेतेति प्राह भगवान् यास्क३ -
स्वाकुरय'ं आरह्यर/ किलामूदपीत्य वेदानु न /विनगानकाति गोडदमि/ अर्वन्न डइत् सकलें भद्रमशुते नाकमोति ज्ञानविध्ूतपाप्मा // डति / /
अध्येता भारवाही वेदानां मा भूदिति शिक्षेतरवेदाडैरर्थ निर्णीय तदनुसन्धानेन सहैव पाठ8 कर्त्तव्य४| |५५। |
जो वेदों का अध्ययनकर्ता उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, प्रचय और कम्पित स्वरों, शिक्षाग्रन्थ के निर्देशानुसार उच्चारित किये गये वर्णों और शब्दों के प्रतिपाद्य अर्थों से युक्त वेद का हस्त -सज्चारपूर्वक अध्ययन करता है, वह प्रुरुष वेदत्रयी द्वारा पवित्र हो जाता है और अन्त में ब्रह्मलोक में पूजित होता है। न
स्वरों और वर्णों के विषय में पाणिनीयशिक्षा में बहुत-क़ुछ कहा जा चुका है। स्वरों के विषय में हस्तसज्वार और अड्डृष्ठसज्चार की विधि का प्रतिपादन भी हुआ है। वेद का पाठ अर्थबोध के साथ ही होना चाहिए, इस का निर्देश भगवान् यास्क ने भी किया है -
' वेदों का अध्ययन करने पर भी जो अर्थ को नहीं जानता, वह बोझ ढोने वाला ढूँठ ही है। अर्थ का ज्ञाता ही अपने पापों का नाश कर समस्त कल्याण की प्राप्ति करता है और अन्त में स्वर्ग जाता है। '
वेदाध्यायी व्यक्ति कहीं वेदों का भारवाही न बना रह जाय, इस के लिए उसे शिक्षा से भिन्न वेदाड्डों के द्वारा अर्थ का ज्ञान कर अर्थानुसन्धान के साथ ही वेदपाठ करना चाहिए | ५५। |
पाणिनीयशिक्षा / ७७
(११) शडूर8 शाडूरीं प्रादाद् दाक्षीपुत्राय धीमते | वाड़-येभ्य8 समाहृत्य देवीं वाचमिति स्थिति३ | ।५६। |
शडृ-र8>लोकमझुलकारी भगवान् महेश्वर$, शडूरस्येयं शाडूरी तां शाडूरीं शाम्भवीमिमां वाचं वाक्स्वरूपां शिक्षाव्याकरणरूपां तथा वर्णसमाम्नायरूपां देवीम्ू, वाड़ु-येभ्यो वेदेभ्य&/ समाहृ॒त्यैकत्र सज्चित्य धीमते प्रज्ञानशालिने दाक्षीपुत्राय पाणिनये प्रादात्, इत्येषा स्थिति३ सम्प्रदायव्यवस्था | नेयं मानवी कल्पना किन्तु स्वयं मुनेहदि आविर्भूय भगवानेवानार्दि विद्यामिमां ददाविति शडूुररूपेणैव वेदाइुकार8 पाणिनिस्तस्थौ। अतश्च पाणिनि प्रति कृता नमस्क्रिया शडूररं॑ प्रीणयेदिति कृत्वा पाणिनिरेव पाणिनि तुष्टाव, तद्चोपरिष्टात् प्रस्तोष्यते |
कथमात्मानं स्तुयादिति तु न शडक््यम्, सम्प्रदाये सम्प्रदानस्य महिम्नैव सम्प्रदातुर्मीहमा स्यादिति। पाणिनि१ किल शडद्५ूराद् विद्यामवाप्य ' जुरु४ शडूररूपी _ संवृत्त३। स्तोता पाणिनिररवराचीन१ स्यातन्राम किन्तु स्तुत्यरूपेण स स्वयमात्मानमनादिनिधनं ब्रह्मरूपं मनसिकृत्य स्तौति। तत्र को व्याघात8 | |५६। |
संसार का मडुल करने वाले भगवान् महेश्वर शिव ने अपनी इस शाडूरी वाक्स्वरूपा देवी को, जो शिक्षाव्याकरण तथा वर्णसमाम्नाय के स्वरूप वाली है, वेदों के वाड्रूय से सज्चित कर ज्ञानसम्पन्न दाक्षीपुत्र पाणिनि को प्रदान किया था। यही स्थिति (इस शाखत्र की सम्प्रदाय - व्यवस्था ) है। यह कोई मानवी कल्पना नहीं है, अपितु स्वयं भगवान् शडूर ने ही पाणिनि मुनि के हृदय में आविर्भूत हो कर यह अनादि विद्या उन्हें प्रदान की, अत8 वेदाड्ुकार पाणिनि शडूबररूप ही हैं। इसीलिए पाणिनि के लिए की गयी नमनक्रिया शडूर को प्रसन्न करती है, यही मान कर पाणिनि ने स्वयं की स्तुति की है जिसे आगे प्रस्तुत किया जाएगा।
कोई व्यक्ति स्वयं की स्तुति कैसे कर सकता है, इस की शडूग नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सम्प्रदाय में सम्प्रदान की महिमा के कारण ही सम्प्रदाता को महत्ता मिलती है। शड्डूर से विद्या प्राप्त कर के पाणिनि स्वयं भी शडूरस्वरूप गुरु ही हो गये। स्तुति करने वाले पाणिनि भले ही अवरचीन हों, किन्तु स्तुत्य के रूप में वे स्वयं को अनादिनिधन ब्रह्मस्वरूप मान कर
ही स्तुति करते हैं। इस में क्या बाधा हैं? | ।५६। |
द्
|| पाणिनीयशिक्षा / ७८ | येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् | कृत्स्न॑ व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नम8 | |५७। ।
सम्प्रदायानुरोधेन शम्भोरनुग्रहभाजनं पाणिनिमेव प्रणमन्नाह - येनेति | येन पाणिनिना महेश्वरादक्षरसमाम्नायं चतुर्दशसूत्रात्मकं वेदमूलवर्ण - पाठमधिगम्य लब्ध्वा शिष्यभावेनोपासनाफलरूपं प्राप्य कृत्स्रमन्यूनं समग्र व्याकरणं न त्वन्यवदसमग्रं प्रोक्तं प्रवचनेन शिष्यान् ग्राहयामास, तस्मै पाणिनये नम$ |
स्तोता पाणिनिमहेश्वराल्लब्धवरः स्वेनेव. स्तुत्यो बभूवेति. १ स्वनिष्ठापकर्षनिरूपितोत्कर्षशालीभवन् स एव नमस्क्रियाया उद्देश्य इति भाव8 द | |५७। |
सम्प्रदाय की महिमा के कारण, शिव की कृपा के पात्र पाणिनि को प्रणाम करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं - जिस पाणिनि ने महेश्वर से चतुर्दशसूत्रात्मक वेद के मूल वर्णपाठ (अक्षरसमाम्नाय ) को, शिष्यभाव से की गयी उपासना के फलस्वरूप प्राप्त कर समग्र व्याकरणशाशख्र का शिष्यों को उपदेश किया, उस पाणिनि के लिए नमस्कार है।
स्तुति करने वाले पाणिनि, महेश्वर से वर प्राप्त कर उन (शिव) के तुल्य ही हो कर स्व॒ुत्य हो गये। स्वनिष्ठ अपकर्ष से निरूपित (स्वनिष्ठ ) उत्कर्ष से युक्त हो कर स्वयं पाणिनि ही नमस्क्रिया के उद्देश्य बन गये हैं। स्वयं के अपकर्ष के स्वीकारपूर्वक दूसरे का उत्कर्ष
स्वीकार करना ही नमन-क्रिया है। यहाँ स्तोता - स्तुत्य का अभेद होने से ही पाणिनि ने स्वयं को नमन किया है ।५७। |
ननु स्तोतृस्तोतव्ययोरभेद/ कथमिति चेत् वृक्षतच्छाखावदिति जुहाण | «- विद्यां साक्षात्कुर्वाणस्य तस्यैव व्युत्यितस्य च भेदोपपत्तेः | सम्प्रदायप्रवर्तकत्वेन स्तुत्यत्वमनुपदमेव ब्रूते -
येन धौता गिर३ पुंसां विमलै४ शब्दवारिभि३ |
तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नम8 | ।५८। |
येन पाणिनिना विमलै३- क्लिष्टापशब्दरूपपडटूसंसर्गरहितै३, शब्दा एव वारीणि तै॥ शब्दवारिभि४>अनपकभ्रष्टसंस्कृतशब्दरूपसलिलधाराभिः९१ » पुंसां
पाणिनीयशिक्षा / ७६
गिरो धौता$ प्रक्षाल्य विशदीकृता१, अज्ञानजं च तम8 कलुषं भिन्नम्-सूर्योदयेन रजनिजन्यतामिस्रमिव विदारितम्, तस्मै शिक्षाव्याकरणवेदाडुप्रकाशस्य सम्प्रदायस्य च प्रवर्तयित्रे पाणिनये नम8 |
व्याकरणमसौ पूर्व प्रवर्तयामास पश्चाच्च शिक्षावेदाड्डमिति यत्किज्चिदेतत् | सर्वथा सो5पशब्दानपवर्णाश्च व्यपोह्य संस्कृतशब्दानां परिनिष्ठितोच्चारणस्य च परम्परां सम्प्रदायरूपां प्रतिष्ठापयाम्बभूवेति निर्विवादमेतत्। अविच्छित्नश्चायं सम्प्रदायो5द्यावधि न नास्मदाद्यै? सेव्यत इति पाणिनि प्रति नमस्या भगवत8 शडू-रस्यैव वरिवस्येत्युपनिषत् | |५८। |
जिस पाणिनि ने क्लिष्ट और अपशब्दरूपी कीचड़ के सम्पर्क से रहित, शुद्ध - परिष्कृत शब्दरूपी जल की धाराओं से मनुष्यों की वाणियों को धो कर निर्मल बना दिया तथा अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को वैसे ही दूर कर दिया जैसे सूर्योदय रात्रि के अन्धेरे को समाप्त कर
देता है; उस शिक्षा व्याकरण बेदाड़ के प्रकाशक और सम्प्रदाय के प्रवर्तक पाणिनि के लिए
नमस्कार है। यह निश्चित है कि पाणिनि ने पहले अपशब्दों और अपवर्णों का परिमार्जन किया और शब्दों के परिनिष्ठित उच्चारण की परम्परा को प्रतिष्ठित किया । यह सम्प्रदाय जो आज तक अविच्छिन्न परम्परा के रूप में विद्यमान है, उस के प्रवर्तक पाणिनि के प्रति प्रणत होना वस्तुत४ भगवान् शडूरर की ही शुश्रूषा है | | ५८। |
अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञज्जनशलाकया | चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नम8 | ।५६॥। |
अपि च सर्वलोकस्यागदंकार इव पाणिनिरन्तर्दर्शनं विशदयामासेत्याह - येन च पाणिनिना अज्ञानान्धस्यरःअविद्यातिमिरजन्यादर्शनस्य लोकस्य >परम्परानुसरणकृतपरिकराया£/ समस्तजनताया ज्ञानाज्जनशलाकयार>ः ज्ञानमेवाज्जनं तस्य शलाकया शास्रोपदेशरूपया वर्तिकया चक्षु४-आशभ्यन्तरं गीर्वाणवाणीप्रसंख्यानरूपम्, उन्मीलयामास --अन्तर्दर्शनाय सामर्थ्येन सम्पन्न चकार, तस्मै पाणिनये नम8 | तिमिरयेगाक्रान्तं चक्षु३ खलु चिकित्सको दयया शनैरञज्जनशलाकयोद्घाटयति, अज्जनेन दर्शनसामर्थ्य॑ च प्रतिपादयति यथा तथेति पाणिनिर्भगवानुपदेशेन हृदयतिमिरं निरस्य शब्दसाक्षात्कारयोग्यं लोक विदधाविति भाव४8 । ।५६।।
पाणिनीयशिक्षा / ८०
जिस पाणिनि ने अविद्यारूपी अन्धकार के कारण अब्धें, किन्तु परम्परा के अनुसरण के लिए कटिबद्ध जनसमुदाय के नेत्र को ज्ञानरूपी काजल की सलाई द्वारा खोल दिया, उस पाणिनि के लिए नमस्कार है।
देववाणी के तात्चिक स्वरूप को जानना ही संसार का आशभ्यन्तर नेत्र है। अज्ञानान्धकार का आवरण होने से लोक अन्धवत् है। पाणिनि ने शासरोपदेशरूपी वर्तिका से परम्परा को अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न कर दिया, अत एव वे नमनार्ह हैं। जिस प्रकार चिकित्सक अन्धत्व रोग से आक्रान्त नेत्र को अज्जनशलाका द्वारा खोल कर उसे फिर से देखने की शक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार भगवान् पाणिनि ने शिक्षाशाख्र का उपदेश कर लोक के हृदयान्धकार को दूर करते हुए उसे शब्दों के साक्षात्कार में समर्थ बना दिया | ।५६। |
त्रिनयनमभि मुखनिश्यृतामिमां य इह पठेत् प्रयतश्च सदा द्विज३8 |
स भवति धनधान्य(पशुपुत्न)कीर्तिमा - नतुलं च सुखं समश्नुते दिवीति दिवीति | ।६0। ।
फलश्रुतिमुखेन ग्रन्थान्ते मझुलमुपनिबध्नाति - त्रिनयनमिति। त्रीणि नयनानि सूर्यचन्द्रकृशानुरुपाणि यस्य तं त्रिनयनं शडूरम्, अभिरः इत्थम्भूताख्याताम् - इत्थंभूताख्यानार्थे ' अभि ' इत्यस्य ' अभिरभागे | इति सूत्रेण कर्मप्रवचनीयत्वमू, ततश्च '॒कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया । त्रिनयनमभिल-शडूस्रेण दत्तस्वरूपाम्। मुखनिश्सृताम्*गुरुशिष्यपरम्परया मुखेभ्यो लब्धोच्चारणाम्। इमां पाणिनीयशिक्षाम्। यो द्विजो द्विजन्मा, न तु वृषल३, प्रयतश्च--बाह्याभ्यन्तरशौचसमन्वित४ सन्, सदा पठेत् | स इह लोके धनधान्यपशुपुत्रकीर्तिमान् भवति। शरीरत्यागानन्तरं च दिवि स्वर्ग, अतुलम्च्अनुपममपरिमितं च सुखं समश्नुते सम्प्राप्नोति। _. इति ग्रन्थसमाप्ति१। दिवीति द्विरुक्ति३ पुनरपि मड्ुल्यवचनेन समाप्तिमेव द्रढयति | |६०। |
ग्रन्थ की परिसमाप्ति पर फलश्रुति के माध्यम से पुन४ मड्ल का उपनिबन्धन किया गया है। सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि रूप तीन नेत्रों वाले भगवान् शडूर द्वारा जिसे स्वरूप प्रदान किया गया है, गुरू-शिष्य परम्परा द्वारा मुखों से जिसे उच्चारण मिला है, ऐसी इस पाणिनीयशिक्षा का जो द्विज बाहर और भीतर से पवित्र हो कर सदा पाठ करता है वह इस लोक में धन, धान्य, पशु, पुत्र तथा कीर्ति से सम्पन्न होता है। शरीरत्याग के पश्चात् वह स्वर्ग में अनुपम तथा असीम सुख प्राप्त करता है। ' इति' से ग्रन्थसमाप्ति का सड्डेत है। ' दिवीति दिवीति ' यह द्विरुक्ति पुन मड्डुलवचन द्वारा समाप्ति को पुष्ट करती है ।।६०। |
पाणिनीयशिक्षा / ८१
अथ शिक्षामात्मोदात्तश्च हकारं स्वराणां यथा । गीत्यचो5स्पृष्टोदात्तं चाषस्तु शडुर एकादश । |
एकादशसु भागेषु विभक्तो5यं ग्रन्थ; - ( 9) अथ शिक्षाम् इत्यारभ्य पज्चानां प्रथमो भाग8 (२)' आत्मा बुदृध्या इत्यारभ्य पज्चानां द्वितीयो भाग$ (३) ' उदात्तश्चानुदात्तश्च ' इत्यारभ्य पज्चानां तृतीयो भाग8 ( ४) हकारं पज्चमैर्युक्तम् ' इत्यारभ्य पज्चानां चतुर्थो भाग: (५) ' स्वराणामूष्मणां चैव ' इत्यारभ्य पज्चानां पञज्वमो भाग8 (६) ' यथा सौराष्ट्रिका नारी इत्यारभ्य षण्णां षष्ठो भाग8 ( ७) ' गीती शीघ्री ' इत्यारभ्य षण्णां सप्तमो भाग8 ( ८) ' अचो5स्पृष्टा8 ' इत्यारभ्य पज्चानामष्टमो भाग (६) उदात्तमाख्याति इत्यारभ्य षण्णां नवमो भाग8 ( १०)' चाषस्तु वदते ' इत्यारभ्य सप्तानां दशमो भाग४ ( ११) ' शड्भर8 शाडूरीं प्रादात् ' इत्यारभ्य च पज्चानामेवैकादशो भाग इति षेष्टि; कारिकाणाम् ।
इत्यवस्थिना बच्चूलालेन ज्ञानोपाद्वेन कृत॑ पाणिनीयशिक्षायां त्रिनयनभाष्यं सम्पूर्णम् ।
या लोकानों विधातुर्विलसाति वदने वेदमावेदयन्ती
या कामानृ प्रयन्ती /निवसति हृदये निरचला केटआरे/ / सो#ग्यस्यापिदेवी घटयलि सदया या गिरीशधदिलं शब्दज्ञानों श्रिग्त् सा त्रिशुवनजननी सवदा स्वक्षा स्तात् //
यह ग्रन्थ ग्यारह भागों में विभक्त है - (१)' अथ शिक्षाम्' से आरम्भ कर पाँच कारिकाओं का पहला भाग है । (२)' आत्मा बुदृध्या ' से ले कर पाँच कारिकाओं का दूसरा । (३) ' उदात्तश्चानुदात्तश्च ' से पाँच कारिकाओं तक तीसरा । (४) ' हकारं पज्चमैर्युक्तम् ' से पाँच कारिकाओं का चौथा । (५) स्वराणामूष्मणां चैव ' से ले कर पाँच कारिकाओं का पॉाँचवाँ । (६) ' यथा सौराष्ट्रिका नारी ' से आरम्भ कर छह कारिकाओं तक छठा । (७) गीती शीघ्री ' से छह कारिकाओं तक सातवाँ । (८)' अचोडस्पृष्टा४' से आरम्भ कर पाँच का आठवाँ (६) ' उदात्तमाख्याति' से छह कारिकाओं का नवाँ । (१०)' चाषस्तु वदते' से ले कर सात कारिकाओं तक दसवाँ तथा (११)' शड्ूर॒8 शाडूरीं प्रादात्' से आरम्भ कर पाँच कारिकाओं तक ग्यारहवाँ भाग है । इस प्रकार साठ कारिकाएँ पूर्ण होती हैं ।।
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परिशिष्ट (क)
_याज्ञवल्क्रयशिक्षा ' के कतिपय अंशों को ले कर उस सम्प्रदाय को सामने लाना अभिप्रेत है जिस में पाणिनीयशिक्षा अन्यतम है । प्रातिशाख्यों को छोड़कर ' शिक्षा ' नाम से जो ग्रन्थ मिलते हैं उन में शिक्षासूत्र प्राचीन माने जाते हैं परन्तु सभी सम्प्रदायों के शिक्षासूत्र सुलभ नहीं हैं । शिक्षा ' नाम से जो ग्रन्थ मिलते हैं वे कारिकाबद्ध हैं। याज्ञवल्क्र॒यशिक्षा शुक्लयजुर्वेद के वेदाड़ के रूप में ज्ञातव्य है क्यों कि इस वेद के द्रष्ट ' याज्ञवल्कय ' हैं | निश्चय ही इस शिक्षाग्रन्थ में भी याज्ञवल्क्रय ' शब्द का प्रयोग हुआ है , अत? कहा जा सकता है कि किसी शिष्य ने इसे कारिकाबद्ध कर के सडुलित किया हो । यहाँ हम इस शिक्षा की कुछ कारिकाएँ ले कर पाणिनीयशिक्षा के सिद्धान्तों को समर्थित करना चाहते हैं - (१) तैस्वर्य -
गान्धवविदे ये प्रोक्ताः सप्त षपड़जादयः स्वरा३ । त एव वेदे विज्ञेयास्तत्र उच्चादय स्वरा४ | |६। ।
अर्थात् सड्डीतशाश्र में जो सात स्वर हैं, वे ही बेद में उदात्त आदि तीन स्वरों के रूप में ज्ञातव्य हैं -
उच्चौ निषादगान्धारौ नीचावृषभभैवतौ । शेषास्तु स्वरिता ज्ञेया8 षड़ज-मध्यम-पञ्चमाः | | ७। |
अर्थात् गान्धर्ववेद के निषाद एवं गान्धार वेद में उदात्त स्वर हैं, ऋषभ एवं धैवत अनुदात्त हैं तथा शेष षड़ज, मध्यम एवं पज्चम स्वरित हैं । इन कारिकाओं का आशय पाणिनीयशिक्षा में यथावत् लिया गया है ।
(२) मात्राविचार -
निमेषो मात्राकालः स्यादिुत्कालस्तथा परे । अक्षरात्तुल्ययोगाच्च मतिः स्यात्सोमशर्मणः | |१०। |
एक मात्रा का काल. एक पलक गिरने के बराबर होता है । कुछ आचार्यों के अनुसार बिजली चमकने का काल मात्राकाल है । किसी भी उच्चारण करने वाले (सोमशर्मा ) की बुद्धि मात्राकाल की बननी चाहिए जो अक्षर के अनुसार बनती है (पलक गिरने या बिजली कौंधने से उसका सादृश्य-सम्बन्धमात्र होता है )। तात्पर्य यह कि मात्रा की कोई नापजोख नहीं हो सकती , सादृश्यमात्र से सड्भेत किया गया है, अतः मात्राकाल बुद्धि में ही बनता है जिसे सम्प्रदाय से तो जाना जाता है परन्तु केवल तुलना के आधार पर समझाने से पूरी बात नहीं बन सकती ।
पाणिनीयशिक्षा / ८३
सूर्यरश्मिप्रतीकाशात् कणिका यत्र दृश्यते । अणुत्वस्य तु सा मात्रा मात्रा च चतुराणवा | |११। |
सूर्य की किरणों के प्रकाश से निष्पन्न जहाँ छोटा सा कण दिखाई पड़ता हैं वह अणुकाल की मात्रा है, अक्षर के उच्चारण में चार अणुकालों की एक मात्रा बनती है। अणुकाल को आणव कहते हैं ।
प्रकाशकण के दिखने का जो क्षण होता है वही अणुमात्रा या आणव कहा गया है | चार आणवबों की एक मात्रा बनती है । मात्रा का यही उच्चारणकाल होता है ।
मानसे चाणवं विद्यात्कण्ठे विद्याद् द्विरणवम् । त्रिराणवं तु जिह्नाग्रे निः्सृतं मात्रिकं विदु। |१२। ।
उच्चारण करते समय मन में एक आणव, कण्ठ में दो आणव तथा जिह्ाग्र में तीन आणव होते हैं। श्रव्य बनकर जब अक्षर बाहर निकलता हैं तब चार आणवों की पूरी मात्रा होती है । द्रष्व्य है कि मात्राकाल से कम काल का उच्चारण नहीं हों सकता अतएव अर्द्ध मात्रा को अनुच्चार्य मानते हुए ' दुर्गासप्तशती ' में आया है - ' अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषत३ । '
अवग्रहे तु कालः स्यादर्धमात्रात्मको हि सः | पदयोरन्तरे काल एकमात्रा विधीयते | |१३। |
जहाँ पर अवग्रह होता है वहाँ अर्द्धमात्राकाल का विराम किया जाता है और दो पदों के मध्य में विरामकाल की पूरी एक मात्रा विहित है ।
एकमात्रो भवेद् हस्वों द्विमात्रो दीर्घ उच्यते । त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यज्जनं चार्धमात्रिकम् । |१६। |
एक मात्रा वाले स्वर को हस्व , दो मात्रा वाले को दीर्घ तथा तीन मात्रा वाले को प्लुत जानना चाहिए, व्यंज्जन की आधी मात्रा होती है ।
यहाँ द्रष्व्य है कि ओकार का जप करते समय जो बीच में आधी मात्रा का काल छूटता है वही परब्रह्म है जबकि उच्चारित ओंकार शब्दब्रह्म कहा गया है । यह तथ्य : शडूरांचार्य ने तज्जपस्तदर्थभावनम् ' सूत्र पर ' योगभाष्यविवरण ' में स्पष्ट किया है ।
(३) वक्ता के विषय में -
कूर्मोड़ानीव संहत्य चेष्टां दृष्टि दृदं मन३ । स्वस्थ8 प्रशान्तो निर्भीको वर्णानुच्चारयेद् बुध॥ | |२३ | ।
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पाणिनीयशिक्षा / (४
जिस प्रकार कच्छप अपने अड्डों को भीतर समेट लेता है उसी प्रकार सारी चेश्ठओं तथा दृष्टि को एकाग्र कर के, मन को दृढ़ बनाकर और प्रकृतिस्थ, शान्त एवं निर्भय होकर वर्णों का उच्चारण करना चाहिए ।
इस कारिका में जानकार उच्चारयिता के विषय में कहा गया है , अतएव ' बुध शब्द का प्रयोग हुआ है । उच्चारण करते समय शारीरिक, वाचिक एवं मानसिक चेष्टा को एकाग्र, दृष्टि को स्थिर और मन को दृढ़ होना चाहिए; अप्रकृत, अशान्त एवं भयग्रस्त वक्ता ठीक-ठीक उच्चारण नहीं कर सकता ।
ना5भ्याहन्यान्न निर्हन्यान्न गायेन्रैव कम्पयेत् । यथा55दावुच्चरेद् वर्णास्तयैवैनान्ू समापयेत्ु | |२४। ।
वक्ता को चाहिए कि वर्णों का उच्चारण करते समय कहीं पर भी आघात न दे तथा बिजली की कड़क के समान निर्घात भी न दे । इसी प्रकार न गावे और न स्वर को कम्पित करे । जिस प्रकार आरम्भ में वर्णों का उच्चारण करे उसी प्रकार समाप्ति तक उनका निर्वाह करे ।
कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि मन्त्र या पद्य पढ़ते समय व्यर्थ का बलाघात कर दिया जाता है , कहीं-कहीं गले से कड़कनें की - सी आवाज निकलने लगती है , वक्ता को इन से सावधान रहना चाहिए | आरम्भ से अन्त तक पाठ्य का यथावत् निर्वाह अत्यन्त आवश्यक है | अत एवं आगे वक्ता के दोष बताये गये हैं --
न करालो न लम्बोष्ठो नाउव्यक्तो नाउनुनासिक/ | |२६। । गद्गदो बद्धजिह्ृश्च न वर्णान् वक्तुमरहति ।
जिस का मुखाकार विकट हो , ओछ्ठ लम्बे हों, उच्चारण में स्पष्टता न हो , नाक से बोलता हो, गला रुँँध जाता हो और जीभ बँध जाती हो वह बर्णों का उच्चारण नहीं कर सकता अथवा उसे ऐसा नहीं करना चाहिए ।
प्रकृतिर्यस्थ कल्याणी दन्तोष्ठौ यस्य शोभनौ | |२७। । प्रगल्भश्च विनीतश्च स वर्णान् वक्तुमहति ।
अर्थात् जिस का स्वभाव मड्लमय हो, दाँतों और ओठों की रचना सुन्दर हो, जो उच्चारण में प्रगल्म हो और साथ ही उच्चारण में विनीत ( अनुशासित ) हो वही वर्णों का उच्चारण कर सकता है ।
पूर्व कारिका में वक्ता के दोष आये हैं । दोषों का अभाव सर्वोपरि गुण है , अत8 विकराल आकृति, लम्बे ओठ न होना, अस्पष्टता तथा अनुनासिकता का अभाव, कण्ठबिल की स्फीतता और जीभ का नुकीलापन वक्ता के गुण हैं ।
पाणिनीयशिक्षा / ८५ (४ ) पाठ - दोष «
शद्]ितं भीतमुद्रष्ृष्टमव्यक्तमनुनासिकम् | । २८। ।
काकरवरं मूर्दृध्नि गतं तथा स्थानविवर्जितम् । विस्वरं विरसं चैव विश्लिए्टं विषमाहतम् | |२€। । व्याकुलं तालहीनं च पाठदोषाश्चतुर्दश ।
चौदह पाठदोष इस प्रकार हैं -
१ ऐसा प्रतीत होना कि वक्ता शझ्जायुक्त है । उस की शड्डा कुछ इस प्रकार की हो सकती है कि मैं ठीक पाठ कर पा रहा हूँ कि नहीं ।
कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि पाठ करने वाला डर रहा है ।
वर्ण को अधिक घिसकर बोलना ।
उच्चारण का स्पष्ट श्रव्य न होना ।
उच्चारण करते समय नासिका इतनी सक्रिय रहे कि निरनुनासिक भी सानुनासिक बन जाए ।
६ कोौए का - सा स्वर निकालना ।
७ ऐसा उच्चारण जो मूर्धा पर चढ़ जाए ।
८. जिस वर्ण का जो स्थान है उस से रहित उच्चारण करना ।
६ स्वर या बलाघात का यथावत् प्रयोग न करना ।
१० शुष्क उच्चारण करना ।
११ संश्लेष के विरुद्ध वर्णों या पदों को दूर-दूर कर देना ।
१२ अयोग्य स्थान पर बलाघात देना ।
१३ ऐसा उच्चारण करना जैसे वक्ता बहुत व्याकुल हो रहा है ।
१४ लय और ताल से रहित पढ़ना ।
# ६१ . ७६. - ४७०. 39)
इन चौदह पाठदोषों को निकाल देने से चौदह गुण बनते हैं। (५९) वेदपाठ पर विशेष --
ज्ञातव्यश्च॒ तवैवार्थों वेदानां कर्मसिद्धये । पठन् मात्रापपाठात्तु पड़े गौरिव सीदति | |४२। ।
कर्म की सफलता के लिए वेदों के अर्थ को जानना आवश्यक होता है । मात्राओं के अपपाठ से पढ़ने वाला दल-दल में फँसी गाय के समान निरुपाय हो जाता है ।
अर्थज्ञान के लिए अपपाठ से बचना होगा । प्रत्येक मात्रा का समुचित उच्चारण अर्थज्ञान का मूल है | वेदपाठ में हस्तपाठ का विशेष महत्त्व बताते हुए कहा गया है -
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पाणिनीयशिक्षा / ८६
यथा वाणी तथा पाणी रिक्त तु परिवर्जयेत् | |४७। । यत्र यत्र स्थिता वाणी पाणिस्तत्रैव तिःति ।
यथा धनुष्या55वितते शरे क्षिप्ते पुनर्गुण/ | |४८। । स्वस्थानं प्रतिपद्येत तदद्धस्तगतः स्वर४ ।
अर्थात् उदात्तादि तीन स्वरों को व्यक्त करने वाली वाणी के समान ही हाथ भी चलाया जाता है । जो त्रैस्वर्य से रिक्त स्थान होता है उसे छोड़ देना चाहिए । जहाँ-जहाँ वाणी ठहरती है वहीं हाथ भी रुक जाता है । जिस प्रकार तने हुए धनुष पर बाण होता है और बाण के छूटने पर प्रत्यज्चा पुन॥ अपने स्थान पर आ जाती है उसी प्रकार हस्तगत स्वर जानना चाहिए । अर्थात्
स्वर के समाप्त होते ही हाथ रुक जाना चाहिए । हस्तचालन के विषय में इस प्रकार निश्चित कर दिया गया है -
अड्गुष्ठस्पोत्तरं पर्व तर्जन्युपरि यद् भवेत् | |५२।। प्रादेशस्य तु सोद्देशस्तन्मात्रं चालयेत्करम् ।
अँगूठे तथा तर्जनी के छोरों की नाप को प्रादेश कहते हैं | वेदपाठ में हस्तचालन प्रादेशमात्र का होता है ।
कुछ लोग उदात्त के लिए बहुत ऊपर और अनुदात्त के लिए बहुत नीचे तक हस्तचालन करते हैं जो शिक्षाशाशत्र के अनुसार अनुचित है. ।
(६) वृत्ति विचार -
सड्रीत में जिसे लय कहते हैं यहाँ उसी को वृत्ति कहा गया है । द्रत, मध्य और विलम्बित
भेदों से तीन वृत्तियों या लयों की व्यवस्था है । पाठ के विषय में इन तीनों वृत्तियों को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है -
अभ्यासार्थे द्वुतां वृत्ति प्रयोगार्थ तु मध्यमाम् | |४६। । शिष्याणामुपदेशार्थे कुर्याद् वृत्ति विलम्बिताम् ।
अभ्यास के प्रयोजन से द्रुतवृत्ति का, सामान्य प्रयोग के लिए मध्यमवृत्ति का और शिष्यों के उपदेश में विलम्बितवृत्ति का प्रयोग करना चाहिए । ये तीनों वृत्तियाँ सापेक्ष हैं | मध्यमवृत्ति ही सामान्य लय है जिसमें पाठ या उच्चारण का प्रयोग सामान्य होता है । उसी में शीघ्रता करने से द्रुतवृत्ति बनती है और विलम्ब से विलब्बितवृत्ति कही जाती है । वृत्तियों की यह व्यवस्था व्यवहार से ही जानी जा सकती है ।
७. 2०2७ साहा पाए ३ कया सरशएाटटचाक ० ४ ०४४७४#/७७ंांज 9 मल २. नही कक" अलग -नमम>म>ंभन--+ त+कनन.. 0 आंआ आ00ार्मिमिजााार भा आप
पाणिनीयशिक्षा / ८७ (७) प्रचय अथवा एकश्रुति -
सामान्यतया उदात्त से पर अनुदात्त स्वरित हो जाता है । अन्य नियमों से भी स्वरित हो सकते हैं | स्वरित के अनन्तर आने वाले सभी अनुदात्त प्रचय कहलाते हैं जिंन्हें शब्दतत्त्व के विचारक एकश्रुति या एकस्वर भी कहते हैं । पाणिनि के दो सूत्र इस विषय में प्रसिद्ध हैं -
१-- एकश्रुतिंदूरात् सम्बुद्धी अर्थात् दूर से सम्बोधन करने में एकश्रुति का ही प्रयोग होता है ।
२- यज्ञकर्मण्यजपन्यूड्खसामसु अर्थात् जप, न्यूड्ख और सामपाठ को छोड़ कर सभी यज्ञकर्मों में एकश्रुति का ही प्रयोग विहित है ।
सामान्यतया लौकिक पाठ एकश्रुति में ही होते हैं जिन में त्रैस्वर्य स्पष्ट नहीं रहत्ता, केवल कथ्य को स्पष्ट करने के लिए कहीं-कहीं उच्च स्वर से उच्चारण पाया जाता है जिसे सामान्यतया नाटयशाख््र में उदात्त कहा गया है | इस प्रकार एकश्रुतिक पाठ में कथ्य को बल देने के लिए किसी स्वर पर जो बलाघात आता है उसी को व्यवहार में उदात्त कहने की प्रथा बन गयी है । यह उदात्त वैदिक त्रैस्वर्य से पृथक् एकश्रुति के अन्तर्गत ही आता है । याज्ञवल्कय की कारिका इस प्रकार है -
स्वरितादनुदात्ता ये प्रचयांस्तान् प्रचक्षते | | ५६। । एकस्वरानपि च तानाहुस्तत्त्वार्थचिन्तकाः ।
(८) विसर्ग का उच्चारण -
यथा बालस्य सर्पस्य निश्श्वासो लघुचेतसः । एवमूष्मा प्रयोक्तव्या हकारपरिवर्जिता | |७४ | ।
लघुचेता (अल्पशक्ति ) सर्पशावक का जैसा निश्श्वास होता है , विसर्ग का बैसा प्रयोग करना चाहिए । उस के उच्चारण में हकार वर्जित है ।
सर्पशिशु का निश्श्वास अत्यन्त हल्का होता है बैसी हीं लघुता विसर्ग के उच्चारण में अपेक्षित है । इस प्रकार हकार से पृथक विसर्ग को समझा जा सकता है ।
(६) स्वरित में हस्तचालन --
उच्चस्थानगते हस्ते स्वरितं नोपपद्यते । अधस्तात्तु यदा गच्छेत्स्वरितं न तथा भवेत् | ।६२। |
“१ उदात्तादीनां स्वराणामविभागेनावस्थानमेकश्रुतिः ।
किन । |
| । |
पाणिनीयशिक्षा (पट
यदि हाथ उच्च स्थान पर चला जाए अथवा अधोगत हो जाए तो स्वरित नहीं हो सकता । तात्पर्य यह कि हृदय से मूर्धा तक के विवर में ऊर्ध्व-विवर से उदात्त, हृदय-विवर से अनुदात्त और कण्ठ-विवर से स्वरित का उच्चारण होता है. | हस्तचालन में भी ध्यान रखना चाहिए कि स्वरित का सड्लेत्त करने के लिए हाथ ऊपर नीचे न जा कर बीच में बना रहे ।
(१०) विवृत्तिविचार -
|| । दयोस्तु स्वस्योर्मध्ये सन्धिय्यत्र न दृश्यते । ॥ | | विवृत्तिस्तत्र विज्ञेया _ य5ईशे ' तु निदर्शनम् | |१०६। । पिपीलिका पाकवती तथा वत्सानुसारिणी । वत्सानुसंसृता चैव चतस्रस्तु विवृत्तय/ | |११०। | पिपीलिका55 बन्तदीर्घा नाभ्या55 सीन्निदर्शनम् । पाकवत्युभयोहस्वा व्विन5 इन्द्रेति दर्शनम् । ।१११। | |] वत्सानुसारिणी चादौ दीर्घा ता$अस्य दर्शनम् । ॥ | | अन्ते च वत्सानुसृता तान5 आवोठमश्विना | |११२। |
॥ | क् । दो स्वरों के बीच में जहाँ सन्धि नहीं पाई जाती वहाँ विवृत्ति जाननी चाहिए । उदाहरणार्थ
॥। | 'य ईशे ' में विसर्ग का लोप होने से विवृत्ति घटित हुई है । ये विवृत्तियाँ चार प्रकार की होती हैं
द - पिपीलिका, पाकवती, वत्सानुसारिणी और वत्सानुसंसृता ।
१ आदि तथा अन्त के दोनों स्वर दीर्घ हों तो पिपीलिका विवृत्ति होती है । जैसे, ' नाब्म्या आसीत् ' ।
|॥| २ दोनों ओर स्वर हस्व हों तो विवृत्ति को पाकवती कहते है । जैसे, ' न इन्द्र ' | यहाँ द क् ' न8 ' के विसर्ग का लोप है ।
||
क् |
३ ओदि में दीर्घ और अन्त में हस्व हो तो वत्सानुसारिणी विवृत्ति कही जाती है । जैसे , “ता अस्य ' । ४ वत्मानुसंसृता विवृत्ति वहाँ होती है जहाँ प्रथम स्वर हस्व और द्वितीय स्वर दीर्घ पाया जाए । जैसे ,' तान आवोढमश्विना ' । विवृत्ति की सूचना के लिए बैदिक पाठों में अवग्रह लगाया जाता है । लोक में सामान्यतः अवग्रह नहीं लगाते । परिशिष्ट क (२) में द्रष्टव्य है कि अवग्रह की स्थिति में आधी मात्रा का विराम देना चाहिए अन्यथा विवृत्ति का समुचित परिज्ञान असम्भव रहता है |
(११) ऋ तथा ल -
अर्धमात्रास्वरं किज्वित्पथड्न्यूनमिवोचरन् । ऋकारे च लकारे च हृत्कण्ठमनसापि च । |११६। |
द ऋकार तथा छकार में रेफ एवं लकार की आधी मात्रा मध्य में रहती है, आसपास स्वर रहता है| है जिसे ' स्वरभक्ति ' कहते हैं। यह स्वरभक्ति अर्धमात्रा से कुछ कम होती है | ऋकार तथा छकार
पाणिनीयशिक्षा / ८६
को एकमात्रिक बनाने के लिए आवश्यक है कि उन का उच्चारण मूर्धा से किया जाए और स्वर्भक्तियाँ हृदय , कण्ठ तथा मन से उच्चारित हों । तात्पर्य यह कि इन स्वरों के उच्चारण में विशेष मन$स्थिति बना कर हृदय और कण्ठ से होते हुए मूर्धा पर वायु का आघात करना होता है और जिह्मा को उलट कर दोनी के समान बना लिया जाए तभी समुचित उच्चारण हो सकता है । उच्चारण - स्थान मूर्धा है, हदय और कण्ठ उस के करण हैं -
लकारस्य तु दीर्घत्वं नास्ति वाजसनेयिन/ । |१२३ | ।
अर्थात् वाजसनेयीसंहिता के शुक्लयजुर्वेदियों के अनुसार दीर्घ छूकार नहीं होता । छकार के उच्चारण में दन्त स्थान है जिस से यह ऋकार की अपेक्षा पृथक् स्थिति रखता है ।
(१२) स्वरों के विषय में -
स्वर उच्च8 स्वरो नीच स्वर४ स्वरित एव च । स्वरप्रधानं त्रैस्वर्य व्यज्जनं तेन सस्वरम् | | १२६। । मणिवद् व्यज्जनान्याहु४ सूत्रवत् स्वर इष्यते । व्यज्जनान्यनुवर्तन्ते यत्र तिष्ठति स स्वर | ।१३०। ।
व्यज्जन की अपेक्षा स्वर की यह और विशेषता है कि वही उच्च या उदात्त , नीच या अनुदात्त तथा स्वरित होता है । ञ्रैस्वर्य में स्वर ही प्रधान है । स्वर के उदात्तादि भेदों से व्यज्जन भी सस्वर हो जाता है । अर्थात् अकारादि स्वर उदात्तादि में से जैसा होगा व्यज्जन भी वैसा ही उदात्त, अनुदात्त या स्वरित होगा । इस प्रकार व्यज्जन भी प्रत्येक स्वर के प्रभाव से अपना स्वरूप बदल देता है । व्यज्जन मनके के समान होते हैं और स्वरों को सूत्र के समान माना गया है | व्यज्जन स्व॒रों का अनुसरण करते हैं । जहाँ स्वर रुकते हैं वहीं व्यज्जन भी विराम लेते हैं ।
तात्पर्य यह कि आगे या पीछे कोई स्वर न हो तो व्यज्जन का उच्चारण असम्भव होता है । हमारी भाषा के व्यज्जन स्वरोच्चारण का ही अनुसरण करते हैं ।
(१३) अनुस्वार के विषय में विशेष -
वर्ण तु मात्रिके पूर्वे हनुस्वारों द्विमात्रकः । द्विमात्रे मात्रिकः स स्यात् संयोगाद्रश्च यो भवेत् | |१४२। ।
अनुस्वार से पूर्व हस्व स्वर होने पर अनुस्वार की दो मात्राएँ हो जाती हैं और यदि पूर्ववर्ती स्वर दीर्घ है अथवा उस के बाद में संयुक्ताक्षर है तो अनुस्वार एकमात्रिक रहेगा | उदाहरणार्थ, ' राम॑ं भजति ' में अनुस्वार की दो मात्राएँ मानी जाएँगी । उस के लिए पाणिनीयशिक्षा में रह के उच्चारण का नियम लागू होगा कि हृदय में एक मात्रा, कण्ठ में आधी मात्रा और नासिका में आधी मात्रा होती है । इस प्रकार अनुस्वार की आधी मात्रा ही श्रव्य बन पाती है । ' रमां भजति ' में अनुस्वार का पूर्ववर्ती दीर्घ स्वर है अत४ अनुस्वार की एक मात्रा रहती है ।
पाणिनीयशिक्षा / ६०
यहाँ भी आधी मात्रा कण्ठ में और आधी मात्रा नासिका में जाननी चाहिए । ' राम॑ स्मरति ' जैसे स्थलों में संयोग के आदि में अनुस्वार आया है , अत% उस की भी एक ही मात्रा होती है ।
मकारान्ते पदे पूर्वे सवर्णे परतः स्थिते ।
मसवर्ण विजानीयादिमम्म इति दर्शनम् । १४३ । |
अर्थात् यदि पूर्व पद मकारान्त हो और परवर्ती पद का आदि वर्ण भी मकार हो तो वहाँ पुस्वार का उच्चारण मकार का ही होता है । अर्थात् ' इमम्मे ' जैसे स्थलों में अनुस्वार का उच्चारण नहीं होता । तात्पर्यत४ अनुस्वार का परसवर्ण हो जाता है |
इससे स्पष्ट है कि यदि मकारादि पद बाद में नहीं है तो पदान्तवर्ती अनुस्वार का परसवर्ण विकल्प से होता है । इसके अतिरिक्त जो लोग अनुस्वार का उच्चारण मकार से एकीकृत करते हैं, वे शिक्षाविरुद्ध हैं |
- अनुस्वारों द्विमात्रः 8 | हस्वाद् वा यदि वा दीर्घात् देवानां हृदये यथा | | १४४ । ।
ऋकारान्त व्यज्जन के पहले आने वाले अनुस्वार की दो मात्राएँ होती हैं । ऋकार चाहे दीर्घ हो या हस्व, उभयथा ट्िंमात्रता विहित है । ' देवानां हृदये ' इस का उदाहरण है । पूर्ववत् आधी मात्रा ही श्रव्य होगी परन्तु यहाँ उच्चारण की प्रक्रिया स्पष्ट की गई है ।
(१४) विसर्ग के विविध रूप - ओभावश्च विवृत्तिश्व श-ष-सा रेफ एव च । जिह्मामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः । | १४ ६।। यद्यो परं पदम् । स्वरान्तं तादृशं विद्याद् यदन्यद्र व्यक्तमूष्मण॥ | १४७ | ।
ये कारिकाएँ पाणिनीयशिक्षा में यथावत् आयी हैं । (१५) यकार तथा वकार के विषय में -
पादादौ च पदादौ च संयोगावग्रहेषु च । ज शब्द इति विज्ञेयो यो5 न््यः स य इति स्पृत/ः । ।१५२। ।
पाद तथा पद के आदि में और संयोग तथा अवग्रह में यकार का उच्चारण जकारवत् होता
है । अन्यत्र आने वाला यकार अपने ईषत्पृष्ट रूप में उच्चारित होता है ।
कननमनन-म-मभ-न--
पाणिनीयशिक्षा / ६१
शुक्लयजुर्वेद में ऐसा हीं उच्चारण किया जाता है । जैसे ' यम ' को जम (बम) ' कार्य ' को कार्ज़ (कार्य्य) इत्यादि उच्चारण करते हैं । लौकिक उदाहरण केवल पदादि और संयोग के ही सुलभ हैं। पाद के आदि का पदादि में ही अन्तर्भाव हो जाता है ।
वकारखिविधः प्रोक्तो गुरु्लघुर्लधूत्तर४ । आदी गुरर्लघुर्मध्ये पदान्ते च लघूत्तर । | १२३ | ।
है ५
बकार तीन प्रकार का कहा गया है - गुरु, लघु तथा लघूत्तर । पदादि में गुरु , मध्य में लघु और पदान्त में लघूत्तर होता है । इन्हीं को गुरूच्चारण, लघूचारण और लघूचारणतर कहा गया है । यकार तथा बकार के उच्चारण को ले कर यह द्रष्व्य है कि जब गुरु उच्चारण किया जाय तब ' व्वकार ' के सदृश हो जाता है । लघु उच्चारण सामान्य स्वरूप हैं । लघूचारणतर में श्रुतिमात्र बचती है जिसके विषय में पाणिनि का सूत्र है- व्योर्लघुप्रयलतर$ शाकटायनस्य । ( पासू ८०३ «१८) पद के अन्त में आने वाले वकार और यकार के स्थान पर लघुप्रत्यनतर या लघूचारणतः बकार तथा यकार होते हैं | भट्टोजिदीक्षित ने इस सूत्र पर लघूचारण का अर्थ स्पष्ट किया है - यस्योच्चारणे जिह्वाग्रोपाग्रमध्यमूलानां गैथिल्यं स लघूचारण$४ । | जिस यकार अथवा वकार के उच्चारण में जिद्चा के अग्र , उपाग्र , मध्य और मूल शिधिल रहते हैं उसे लघुच्चारण कहा गया है । वेदों में जहाँ गुरूच्चारण होता है वहाँ दो बकार लिखे जाते हैं जैसे , ' मधुव्वाता ऋतायते । इसी प्रकार यकार को प्रकारान्तर से ' य' लिखा जाता है जैसे, 'बच्च भाव्यम् । लघुप्रयलतर का उच्चारण अलपश्रव्य रहता है । पूर्णश्रव्यता गुरूद्चारण एवं लघूदारण में ही पायी जाती है । पदादि और संयोग में गुरूचचारण ही हो पाता है , अतएव वहाँ प्राय४ ज और ब बोला जाने लगता है । याज्ञवल्क्यशिक्षा में यकार के जकारोच्चारण को वैदिक-मान्यता दी गयी है परन्तु वकार को बकार-सदृश करने की व्यवस्था नहीं है । वहाँ घर्षी-दन्त्योष्ठय उच्चारण ही स्वीकृत है । कात्यायन-परिशिध्सूत्र में यकारविषयक उच्चारण पर कह गया है - अथान्तस्थानामाद्यस्य पदादिस्थस्यान्यहलसंयुक्तस्य संयुक्तस्यापि रेफोष्मान्त्याभ्यामृकारेण चाविशेषेणादिमध्यावसानेषृच्चारणे जकारोच्चारणं द्विभविष्येवम् । ( माध्यन्दिनवाजसनेयाहिकम्, पृ. ६६ ) अर्थात् अन्तस्थों का प्रथम यकार है । वह पद के आदि में हो, असंयुक्त हो अथवा रेफ या हकार या ऋकार से संयुक्त हो तो समान रूप से आदि, मध्य तथा अन्त में जकारोच्चारण होता है । इसी प्रकार द्वित्व होने पर भी जानना चाहिए । (यमुना, आर्य, बाह्य, शत्या आदि
उदाहरण हैं । )
# माध्यन्दिन वाजसनेयाहिक पृ. १०० पर यह पाठ इसे प्रकार है - वकारखिविधो ज्ञेयो गुरुर्लघुर्लधूत्तर । आदिगुरर्लघुर्मध्ये पदान्ते च लघुतर* ( माध्यन्दिनीशिक्षा )
पाणिनीयशिक्षा / ६२
वहीं पर वकार के उच्चारण की व्यवस्था दी गयी है -
अथान्त्यस्यान्तस्थानां पदादिमध्यान्तस्थस्य त्रिविधं गुरुमध्यमलघुवृत्तिभिरुद्चारणम् | (तज्नैव ) || अर्थात् अन्तस्थों में अन्तिम वकार है जिसका त्रिविध उच्चारण होता है - पद के आदि में गुरूचचारण, मध्य में मध्यमोच्चारण और अन्त में लघूचारण ।
(१६)रडू -
रड्ढे चैव समुत्यन्ने नो ग्रसेतू पूर्वमक्षरम् । स्वरं दीर्घ प्रयुज्जीत पश्चान्नासिक्यमुचरेतु | | १६६। । यथा सौराष्ट्रिका नारी आरॉ२5 इत्यभिभाषते ।
एवं रड्डू8 प्रवक्तव्यों डकारपरिवर्जितः | |१७०। |
कुछ अन्तर से ये कारिकाएँ पाणिनीयशिक्षा में आ चुकी हैं | यहाँ एक तथ्य विशेष कहा गया है कि रड्ड का उच्चारण डकार जैसा नहीं होना चाहिए ।
(१७) उच्चारण के विषय में विशेष -
यथा व्याप्री हरेत्युत्रान्दंष्ट्राभिन च पीडयेतु । भीता पतनभेदाभ्यां तदद् वर्णान् प्रयोजयेत् | ।१७६। ।
यह कारिका पाणिनीयकशिक्षा में यथावत् है ।
| मधुरं च न चाव्यक्तं व्यक्त चापि न पीडितम् । | ' सनाथस्येव देशस्य न वर्णा: सड्डूरं गताः । ।१८०। | क् द ॥ ॥
जिस प्रकार अच्छे राजा के देश में वर्णसड्ूर नहीं होता उसी प्रकार समुचित उच्चारण में वर्णसडूर नहीं पाया जाता । उच्चारण मधुर हो पर अस्पष्ट नहीं और स्पष्ट हो पर पीडित नहीं । यहाँ पीडित उसे कहा जाएगा जो अनावश्यक निर्घात के साथ बोला जाए ।
यथा सुमत्तनागेन्द्र/ पादात्पादं निधापयेत् । एवं पद पदाद्यन्तं दर्शनीयं प्रथक प्रथकू | |१८१। | |
जिस प्रकार मतवाला हाथी एक पैर के पश्चात् दूसरा पैर रखता है, इसी प्रकार पदों का उच्चारण करना चाहिए जिस से पद के आदि और अन्त पृथक पृथक जाने जा सके ।
गीती शीघ्री शिरश्कम्पी यथालिखित-पाठक३ । अनर्थज्ञोउल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमा३ | |१८२।।
33७33»...
पाणिनीयशिक्षा / ६३ कि 2०७+०७3७भ3333333333+« ५४3५3...
पाणिनीयशिक्षा मे 'तथालिखित ' है और यहाँ ' यथालिखित ' है जो अधिक स्पष्टता से अभिप्राय देता है कि जैसा लिखा है वैसा नहीं पढ़ा जाता अपितु सम्प्रदाय जान कर उच्चारण करना चाहिए ।
माधुर्यमक्षरव्यक्ति३ पदच्छेदस्तु सुस्वर४ । धैर्य लयसमत्वं च षडेते पाठके गुणा; । |१८३ | |
कारिका पाणिनीयशिक्षा में द्रष्टन्य है । वहाँ,' पाठका गुणा ' पाठ है जिस से पाठक शब्द को ' पाठकीय ' अर्थ देना पड़ता है । यहाँ ' पाढक्रै गुणा४ ' पाठ उचित प्रतीत होता है । दूसरे यह कि पाणिनीयशिक्षा में ' लयसमर्थम् ' पाठ आया है जब कि यहाँ लयसमत्वम् ' पाठ है जिससे अर्थ आता है कि लय में व्याघात नहीं होना चाहिए । उसी आधार पर आगे कहा गया है -
आचार्या: सममिच्छन्ति पदच्छेदन्तु पण्डिताः । ख्रियो मधुरमिच्छन्ति विक्रुष्टमितरे जनाः | |१८४ | ।
आचार्य लोग चाहते हैं कि जिस लय में पढ़ा जाए, आदि से अन्त तक उसी का निर्वाह हो | यही लयसमत्व है | पण्डितलोग पदच्छेद चाहते हैं अर्थात् अलग-अलग पदों की प्रतीति को आवश्यक मानते हैं । श्लियाँ उच्चारण में मधुरता चाहती हैं | इतरजन चिल्लाहट पसन्द करते हैं ।
(१८) यम - चत्वारों यमाः कुँ, खुँ , गुँ , पुँ इति ।
सकुकुँमेति प्रथमो ज्ञेयः सकृथ्खूना इत्यपरो भवेत् । विद्गमाते तु तृतीयश्च जम्भे द्ध्पूँमश्चतुर्थक# | |१६३ | । अपज्यमैश्वैकपदे संयुक्त पञ्चमाक्षरम् ।
उत्पद्यते यमस्तत्र सोडडूं पूर्वाक्षस्थ हि | ।१६४ | ।
यमों के विषय में पहले यह ज्ञातव्य है कि इन का उच्चारण कण्ठनलिका से ले कर नासिका तक सीमित है । मुँह बन्द रख कर नासिका से पाँच ध्वनियाँ निकलती हैं । उन में से हुँकार एक है जिस को प्रातिशाख्यों में नासिक्य माना गया है । अर्थात् शुद्ध नासिका से निकलने वाली वहीं ध्वनि है । शेष चार ध्वनियाँ कण्ठ और नासिका से बनती हैं जिन को कुँ, खुँ, गुँ, घुँ कहा जाता है । वेदों में इन का प्रयोग होता है | एक ही पद में संयुक्ताक्षर आता हो, जिस का प्रथम घटक पञ्चमाक्षर न हो और उत्तरघटक पज्चमाक्षर हो तब यम की उत्पत्ति होती है और वह यम पूर्वधटक का अड्ज बन जाता है । उदाहरणार्थ -
पाणिनीयशिक्षा / ६४
पूर्वघटक क, च, ट, त, प हो तो ककारसदृश यम होगा । जैसे , रुकुकुँम । पूर्वघटक ख, छ, ठ, थ, फ हो तो खकारसदृश यम होता है । जैसे , सकृथ्खँना | पूर्वघटक ग, ज, ड, द, ब हो तो गकारसदृश यम होता है । जैसे विद्याते के लिए विदगमाते ।
घ, झ, ढ, ध, भ पूर्वधटक हो तो घकारसदृश यम होता है । जैसे दध्म8 के लिए दधूघूँम३ | ल्
सभी वर्गों के यम नहीं होते वे केवल कवर्गीय चार वर्णों के समान होते हैं और उन का उच्चारण नासिका से किया जाता है ।
रू कं ग
अन्त में यही कहना है कि उच्चारण एवं पाठ की शुद्धता ही शिक्षाशाख्र का प्रतिपाद्य है ।
अशुद्ध पाठ से कथ्य का अर्थ स्पष्ट नहीं होता, पाठ में अर्थ का अनुसन्धान न किया जाए और शुद्ध पढ़ा जाए तो भी उसे उत्तम माना गया है । पद्मपुराण में आया है -
उत्तमं सार्थपाठं च मध्यमं च निरर्थकम् । विनार्थ शुद्धपाठश्वेदुत्तमेन सम॑ भवेत् || (हरिवंशमाहात्य १.२१-२२)
अर्थात् सार्थक पाठ ही उत्तम है और निरर्थक या अर्थानुसन्धान के बिना किया हुआ पाठ मध्यम माना जाता है परन्तु अर्थ के बिना भी यदि शुद्धपाठ किया जाए तो उत्तम के समान ही होता है ।
यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि हमारी वर्णमाला वैदिक या छान्दस है, इसीलिए हमारी आन्तरिक संरचना को ' छान्दस ' माना गया है । वर्णों के शुद्ध उच्चारण से छान््दस अन्तरात्मा शुद्ध रूप प्राप्त करता है और उस से अशुद्धियों का कलुष दूर हो जाता है | इसीलिए पाणिनीयशिक्षा में तीन बार आया है-
ब्रह्मलोके महीयते । ।
परिशिष्ट (ख) (वर्णसमाम्नाय )
वर्णसमाम्नाय या अक्षरसमाम्नाय को ब्रह्मराशि कहा गया है । आजकल जो ' वर्णमाला ' शब्द प्रचलित है वही अपने मूल स्वरूप में वर्णसमाम्नाय है और यही शब्दब्रह्म भी है । लघुशब्देन्दुशेखर (पृ. ६ ) में प्राचीन उद्धरण इस प्रकार आया है जिस से परम्परा सूचित होती है -
१ इतमक्षरचन्दों वर्णशः समनुक्रान्तम् । यथाचार्या ऊचु४ - ब्रह्मा बृहस्पतये प्रोवाच । बृहस्पतिरिन्राय । इन्द्रो भरद्ाजाय । भरद्वाज ऋषिभ्यः । ऋषयो ब्राह्मणेभ्यं । त॑ खल्विममक्षरसमाम्नायमित्याचक्षते | न भुकृत्वा न नक्त प्रब्रूयाद् ब्रह्मरशिः ॥
यह अक्षरों का बेद वर्णराशि के रूप में प्रसार पाता है, अतः यह ब्रह्मराशि है । आचार्यों ने इस की परम्परा बतायी है कि ब्रह्मा ने बृहस्पति को, बृहस्पति ने इन्द्र को, इन्द्र ने भरद्वाज को, भरद्वाज ने ऋषियों को और ऋषियों ने ब्राह्मणों को दिया | इस को अक्षरसमाम्नाय कहते हैं । भोजन कर के अथवा रात में इस का पाठ नहीं करना चाहिए । महाभाष्य के द्वितीय आह्रिक में इस ब्रह्मराशि के विषय में कहा गया है -
२ सो<यमक्षरसमाम्नायो वाकूसमाम्नाय$ पुष्पितः फलितश्चन्द्रतारकबत् प्रतिमण्डितो ब्रह्म- राशिः । सर्ववेदपुण्यफलावाप्तिश्वास्य ज्ञाने भवति । मातापितरौ स्वर्ग लोके महीयेते ।
यह अक्षरसमाम्नाय वाग्वेद है जो फूल और फल कर चन्द्रतारकवत् विस्तार ले कर ब्रह्मराशि बनता है । इस के जानने पर सभी वेदों के पाठ के पुण्यफल की प्राप्ति होती है और इसे जानने वाले के माता-पिता स्वर्गलोक में पूजा पाते हैं । वैयाकरण-लघु-मज्जूषा (पृ. १५४०) में नन्दिकेश्वर का उद्धरण आया है - |
३ अकार& सर्ववर्णग्रय8 प्रकाश३ परमेश्वर४- | आय्यमन्त्येन संयोगादहमित्येव जायते । ।
सभी वर्णो में प्रथण अकार प्रकाशस्वरूप परमेश्वर कहा गया है | इस आदिम अकार का अन्तिम हकार से संयोग होने पर ' अहम् ' की निष्पत्ति होती है । तात्पर्य यह कि अ से ह तक की वर्णमाला व्यक्तित्वों की निर्मात्री है जिस से अहन्ता का स्वरूप बनता है | यही आगम-वचन अन्यत्र इस प्रकार आया है -
४ . अतोड5कारहकाराभ्यामहमित्यप्रथक्तया । प्रपज्च४ शिवशक्तिभ्यां क्रोडीकृत्य प्रकाशतें । | (शिवसूत्रवार्तिक २.४६ )
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पाणिनीयशिक्षा / ६६
है।
है -
अकारादिक्षकारान्त-पज्चाशद्वर्णविग्रहः । शिवादिक्षितिपर्यन्त-तत्त्वग्राम उदाहतः ।। (शिवसूत्रवार्तिक १.२६-२७)
अर्थात् अकार से क्षकारपर्यन्त पचास वर्णो के स्वरूप वाला तत्त्वसमूह है जो शिव से ले कर क्षितिपर्यन्त आता है । इस वर्णमाला में सोलह स्वर आते हैं- अ, आ ,इ ,ई-उ- ऊ ,ऋ , ऋ,ल , लू , ए, ऐ , ओ, औ , अं , अ॥ | इन के अतिरिक्त पदच्चीस वर्गीय व्यञज्जन, चार अन्तस्थ और चार ऊष्म मिला कर उनचास बनते हैं, इस में क्षकार और मिलाने से पचास हो जाते हैं (यही अक्षमाला है ) ।
६ समस्त प्रपज्च इसी वर्णमाला से नाम प्राप्त करता है । ये पृथक् - पृथक वर्ण नादरूप होते हैं जो वायु के आघात से बनते हैं परन्तु अनाहतनाद इन सबसे ऊपर है -
एको नादात्मको वर्णः सर्वनादाविभागवान् । सो5नस्तमितरूपत्वादनाहत इति स्मृतः । | (तन््त्रालोक )
सभी आहत नादों के विभाजन से रहित एक नादरूप वर्ण होता है जिसे अनाहत कहते हैं। उस का स्वरूप कभी अस्त नहीं होता । तात्पर्य यह है कि सभी आहत वर्ण उत्पत्ति और विनाश पाते हैं परन्तु अनाहतनाद ऐसा वर्ण है जो न उत्पन्न होता है और न अस्त होता है । यही तथ्य उपनिषद् में आया है -
एको वर्णो बहुधा शक्तियोगादृ वर्णाननेकान् निहितार्थो दधाति । | (शवेताश्वतर ४.१)
अर्थात् एक (अनाहत ) वर्ण होता है जो विभिन्न वाच्यवाचकशक्तियों के योग से अपने में अर्थ धारण करता हुआ अनेक वर्णों को अपने में निहित रखता है ।
यहाँ जिस वर्णमाला का उल्लेख हुआ है उस में जिह्ामूलीय और उपध्मानीय को जोड़ लेना चाहिए जिनका समावेश विसर्ग में हो जाता है ।
७ तैत्तिरीयप्रातिशाख्य (१.१. ७-१४) में इन में से व्यज्जनों का विभाग किया गया है
इस प्रकार अकार और हकार से अपृथग्भाव ले कर जिस ' अहम् ' की निष्पत्ति होती है उसमें समग्र प्रपञ्च समाविष्ट होता है और अकाररूप शिव तथा हकाररूप शक्ति के साथ प्रकाश में आता
इस वर्णमाला को अक्षमाला भी कहते हैं जिस में शिव से क्षितिपर्यन्त तत्त्वसमूह आता
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पाणिनीयशिक्षा / ६७
आया पजञ्यविशतिः स्पर्शाः । पराश्वस्रो5न्तःस्था: | परे षडृष्माणः ( हक शेष सह प)। स्पर्शानामानुपूरव्येण पज्व-पञ्च वर्गाः। प्रथमद्वितीयतृतीयचतुर्थोत्तमाः | ऊष्मविसर्जनीयप्रथमद्वितीया अधोषा४ । न हकारः । व्यज्जनशेषों घोषवान् |
अर्थात् व्यज्जनों में प्रथम प्नीस स्पर्श कहे जाते हैं , तदनन्तर चार (यरलव ) अन्तशभ्स्थ हैं , उस के बाद छह ( हक #ऑें श॒ ष स ह ) ऊष्म हैं। पच्चीस स्पर्शों में क्रमश8 पाँच - पाँच वर्णों के पाँच वर्ग ( कवर्ग इत्यादि ) होते हैं । ये वर्ण प्रथम , द्वितीय, तृतीय , चतुर्थ और उत्तम या अन्तिम कहे जाते है | ऊष्म , विसर्ग तथा वर्गों के प्रथम-द्वितीय अघोष
न
होते हैं, हकार अघोष नहीं होता । इस प्रकार क्षेष व्यज्जन सघोष होते हैं ।
वर्ण-रलदीपिका में इक्कीस स्वर बताए ग५ है
ऋपर्यन्ताः स्वराखेधा छूकारों हस्व एव च | सन्ध्यक्षराण्यहस्वानि ते चैवं त्वेकविंशतिः | | ( वर्णरलदीपिका )
हस्व, दीर्घ , प्लुत भेदों से अ- इ- उ- ऋ के तीन - तीन स्वरूप होते हैं, कार हस्व ही रहता है और सन्ध्यक्षर ( ए-ऐ-ओ-औ ) हस्व न होकर दो-दो प्रकार के होते हैं | इस प्रकाः स्वर इक्कीस हैं , यहाँ प्लुत छूकार नहीं लिया गया है , उसे लेने पर बाईस संख्या होगी | ऊपर जिन पचास वर्णों की गणना की गयी है उन में प्लुतों का ग्रहण नहीं है परन्तु रूकाः को दीर्घ मान लिया गया है । पाणिनि ने जिन चौंसट वर्णों की ब्रह्मराशि बताई है, उस में दुष्स्पृष् और यम आते हैं ।
दुश्स्पृष्ट के स्थान पर द्िंश्स्पृषट भी कहा जाता है -
द्विध्स्पृष्टा च विज्ञेया डढयो$ स्वरमध्ययोः । पदकाले वियुज्यन्ते द्विश्स्पृष्टो न भवेत् तदा । | ( वर्णएलदीपिका )
अर्थात् स्वरों के मध्य आने वाले डकार और ढकार िध्स्पृष्ट हो जाते हैं और जब पदपाठ
में वे स्व॒रों से वियुक्त होते हैं तब द्विश्स्पृषट नहीं होते । द्विश्स्पृष्ठा का कारण आश्वलायनप्रातिशाख्य से स्पष्ट होता है -
जिह्मामूलं तालु चाचार्य आह स्थानं डकारस्य तु वेदमित्र३ .। स एव चास्य ढकारः सन्नृष्मणा सम्प्रयुक्तः | | द्योश्वास्य स्वस्योर्मध्यमेत्य सम्पययते स डकारों छकार३ ।
( माध्यन्दिनवाजसनेयाहिकम् पृ. 9०० परे उद्धृत )
प् 'ऐणनीयशिक्षा / ६८
अर्थात् आचार्य वेदमित्र के मत से डकार और ढकार जब दो स्वरों के मध्य आते हैं तो वे क्रमश8 छकार एवं छहकार हो जाते हैं और उन का उच्चारण स्थान जिह्बामूल एवं तालु होता है । इस प्रकार दो स्थानों पर स्पर्श पाने से उन्हें द्विधस्पृष्ट कहा गया है ।
यहाँ छ, छूह और जुड़ जाते हैं | इन के अतिरिक्त चार यम होते हैं ।
१० औददब्रजि के उल्लेख से पाणिनीयशिक्षा के पज्जिकाभाष्य में आया है-
औददब्रजि के अनुसार स्पर्शों के अन्त्य वर्ण के संयोग में यदि वर्गीय प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ आए तो मध्य में पूर्व वर्ण के गुण वाला यम होता है । (इस विषय में परिशिष्ट ' क द्रष्टट्य है ) अन्य शिक्षाग्रन्थों का विवरण भी द्रश्व्य है -
2हणणणांधााााााााणाण 3
अनन्त्यश्च भवेत् पूर्वो5नत्यश्व परतो यदि । तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत् सवर्ण३ पूर्ववर्णयो8। । (नारदीयशिक्षा २.१.८ )
वर्गीय अनन्त्य वर्ण पहले हो और परवर्ण वर्गीय अन्त्य हो तो मध्य में यम रहता है जो पूर्व वर्ण का सवर्ण होता है ।
चतुर्णा पज्वमैयोंगे उत्पद्यन्ते यमाश्च ये ।
द क् अनन्त्या अन्त्यसंयोगे मध्ये यम पूर्वगुणः । इत्यौद्रजि३ । कुँ- खुँ- गुँ- घुँ इति च ते चत्वारों नात्र पञज्चम४ । | (वर्णरलप्रदीपिकाशिक्षा १७ )
अर्थात वर्गीय चार वर्णों का पञ्चम वर्ण से योग होने पर जो यम होते हैं वे कुँ- खुँ- गुँ- घुँ इस रूप में चार ही होते हैं, पाँचवाँ नहीं ।
॥ | वर्गान्ता यत्र दृश्यन्ते शबघसैः सह संयुता४ । | यमास्तत्र निवर्तन्ते श्मशानादिव बान्धवा8 | । (माण्डूकीशिक्षा ११८)
0 क-न्ममक... के... बा । छा ए॒एंजांध जी मा
अर्थात् वर्गों के अन्तिम वर्ण यदि श ष स से संयुक्त हों तो वहाँ यम इस प्रकार निवृत्त हो जाते हैं जैसे श्मशान से सम्बन्धी लोग लौट आते हैं । तात्पर्य यह कि यमों के उच्चारण की व्यवस्था केवल वर्गीय व्यज्जनों के संयोग से होती है ।
११ ययमों के उच्चारण के विषय में आता है -
+ # ७ ७ अलामानमा+नाक,
यमानुस्वारनासिक्या